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इसरो ने पैराशूट एयरड्रॉप टेस्ट किया पूरा, जानिए क्यों है ये 'गगनयान' मिशन के लिए अहम?

गगनयान मिशन के तहत मानव को अंतरिक्ष में सुरक्षित भेजने की दिशा में इसरो ने अहम मकाम हासिल किया है. इसके तहत यूपी के झांसी में बबीना फील्ड फायर रेंज में पैराशूट एयरड्रॉप टेस्ट को अमलीजामा पहनाया गया.

गगनयान कार्यक्रम के जरिए भारत ने अंतरिक्ष में मानव की उड़ान को साकार करने का एक ख्वाब देखा है. इसे पूरा करने के लिए अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने अपनी कोशिशों को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है. इन्ही कोशिशों का नतीजा है कि देश अंतरिक्ष में दुनिया को अपनी स्वदेशी ताकत का सबूत देने में कामयाब हो रहा है.

इस कड़ी में गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम ने एक खास मकाम हासिल किया है. काफी वक्त बेसब्री भरे इंतजार के बाद इसरो के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के वैज्ञानिकों ने शुक्रवार (18 नवंबर) को उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में बबीना फील्ड फायर रेंज (बीएफएफआर) में पहले ‘इंटीग्रेटेड मेन पैराशूट एयरड्रॉप (आईएमएटी) का कामयाब परीक्षण किया है. आखिर ये आईएमएटी गगनयान प्रोग्राम के लिए इतना अहम क्यों है ? यहां इसी बारे में बात करेंगे.

क्या है इसरो का पैराशूट एयर ड्रॉप टेस्ट

दरअसल गगनयान कार्यक्रम का मकसद पृथ्वी की निचली कक्षा में मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन शुरू करने की स्वदेशी क्षमता को लोहा मनवाना है. इसके लिए पैराशूट सिस्टम का फुल प्रूफ होना भी बेहद जरूरी है. इसे ही इंटीग्रेटेड मेन पैराशूट एयरड्रॉप टेस्ट कहा गया है. 

इस परीक्षण का मकसद पैराशूट की ताकत और उसकी क्षमता को आंकना था, ताकि भविष्य में गगनयान के क्रू मॉड्यूल की लैंडिंग कराते वक्त किसी तरह की परेशानी न हो. इस गगनयान मिशन में 3 पैराशूट्स की अहम भूमिका होने जा रही है.

शुक्रवार को हुए इस परीक्षण के जरिए एक पैराशूट के खराब होने के हालातों में दूसरे पैराशूट के क्रू मॉड्यूल की सही और सुरक्षित लैंडिंग कराने की काबिलियत के बारे में जाना गया.  इस दिशा में शुक्रवार को आईएमएटी की कामयाबी इसरो के लिए मील का पत्थर साबित हुई है.

गगनयान क्रू मॉड्यूल का पैराशूट सिस्टम

गगनयान क्रू मॉड्यूल के पैराशूट सिस्टम में 10 पैराशूट होंगे. भविष्य में पृथ्वी की निचली कक्षा से गगनयान अंतरिक्ष यात्रियों के जमीन पर लैंडिग के लिए पहले चरण में दो खास पैराशूट यानी अपेक्स कवर सेपरेशन पैराशूट होंगे. ये पैराशूट क्रू मॉड्यूल पैराशूट सिस्टम में सुरक्षा कवर की तरह काम करेंगे.

इसके बाद पृथ्वी की निचली कक्षा से नीचे धरती की तरफ आते हुए अंतरिक्ष यात्रियों की रफ्तार को कम करने और नीचे उतरने की इस प्रक्रिया को स्थिर और सुरक्षित रखने के लिए दो ड्रोग पैराशूट (Drogue Parachutes) भी इस्तेमाल में लाए जाएंगे.

दरअसल खुले सिरों वाले एक शंक्वाकार या फ़नल के आकार के डिवाइस को ड्रोग कहा जाता है. दरअसल ये ड्रोग तेज रफ्तार वाली किसी भी वस्तु की रफ्तार को कम करने, उसे स्थिर और काबू करने का काम करते हैं.

इसरो की वेबसाइट के मुताबिक ड्रोग पैराशूट छोड़ने के बाद 3 खास पैराशूट को अलग-अलग खोलने के लिए 3 पायलट शूट का इस्तेमाल किया जाएगा. ये शूट एक झुका हुआ चैनल या रास्ता है जिसमें वस्तुओं को गुरुत्वाकर्षण के जरिए चलाया या संचालित किया  जाता है.

ये लैंडिंग से पहले गगनयान क्रू मॉड्यूल की रफ्तार को एक सुरक्षित स्तर तक कम करने में मदद देगा. धरती पर अंतरिक्ष यात्रियों की लैंडिंग लिए 3 खास या अहम पैराशूट में से 2 ही काफी होंगे और तीसरे का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. 

ऐसे परखे जाएंगे पैराशूट

रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज (आरटीआरएस) जैसे पेचीदा परख वाले तरीकों से छोटे पैराशूटों के सटीक होने का आकलन किया जाएगा. तो खास (Main Parachutes) पैराशूट्स के काम को आंकने के लिए विमानों और हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया जाएगा.

एक रॉकेट स्लेज यानी बगैर पहियों की गाड़ी जैसा टेस्ट प्लेटफॉर्म है जो रॉकेट के जरिए पटरियों के एक सेट के साथ फिसलता है. ये पेलोड, एयरक्राफ्ट और मिसाइल जैसी अन्य चीजों के लिए तेज रफ्तार के असर, हवा की रफ्तार और रफ्तार में बढ़ोतरी का परीक्षण करने के लिए एक नियंत्रित माहौल देता है.

कितना अहम है आईएमएटी

गगनयान पैराशूट सिस्टम के लिए इंटीग्रेटेड मेन पैराशूट एयरड्रॉप टेस्ट बेहद अहम है, क्योंकि इस टेस्ट को इस तरह के काल्पनिक घटना के साथ किया गया है जिसमें एक मेन पैराशूट खुलने में नाकाम रहा है. इस तरह का परिदृश्य इसलिए रचा गया कि जब वास्तव में ऐसा होगा तो क्या एहतियात के तौर पर लगाए गए पैराशूट काम करेंगे कि नहीं.

ये इस तरह का पहला टेस्ट हैं जिसमें गगनयान पैराशूट सिस्टम में भविष्य में होने वाली परेशानियों और नाकामियों की पहले ही कल्पना कर उस तरह का माहौल तैयार कर पैराशूट सिस्टम को टेस्ट किया गया है.

ये इस सीरीज का पहला टेस्ट है. अगर इस सीरीज के सभी टेस्ट इस पहले टेस्ट की तरह कामयाब साबित होंगे तो इसका मतलब है कि इस सिस्टम को पहले पहले मानव अंतरिक्ष यान मिशन में इस्तेमाल करने लायक माना जाएगा.

ऐसा किया गया परीक्षण

सीरीज के इस पहले एयरड्रॉप टेस्ट को करने के लिए 5 टन के क्रू मॉड्यूल के भार (Mass) बराबर ही डमी का इस्तेमाल किया गया है. इसे  2.5 किलोमीटर तक की ऊंचाई तक ले जाया गया. इसके बाद इस ऊंचाई से इस पैराशूट को भारतीय वायुसेना के आईएल-76 (IL-76) एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल कर नीचे की तरफ फेंका गया.

ये वैसे ही था जैसे आपात स्थिति में किसी भी विमान के पायलट पैराशूट का इस्तेमाल कर ऊंचाई से धरती की तरफ छलांग लगाते हैं. इसके बाद दो छोटे पाइरो-बेस्ड मोर्टार पायलट पैराशूट छोड़े गए. ये दोनों पैराशूट 7 सेकेंड के अंदर खुल गए. यह परीक्षण को इसरो, डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना और सेना की मदद से अंजाम दिया गया.

इसरो के मुताबिक इस टेस्ट के दौरान पूरी तरह से हवा से भरे या फूले हुए मेन पैराशूट ने पेलोड की रफ्तार को कम कर एक सुरक्षित लैंडिंग कराने वाली रफ्तार में ला दिया. इस परीक्षण को पूरा होने में महज 2 से 3 मिनट का वक्त लगा. इसके साथ ही ये एयरड्रॉप टेस्ट कामयाब रहा, क्योंकि पेलोड मास सुरक्षित तरीके से धीरे-धीरे जमीन पर उतर गया.

इससे ये पुख्ता हो गया कि आने वाले वक्त में अंतरिक्ष यात्री भी सुरक्षित पृथ्वी की कक्षा से जमीन पर उतर पाएंगे. पेलोड (Payload) उस भार या चीज को कहा जाता है जिसे एक प्रक्षेपण यान यानी लॉन्च व्हीकल अंतरिक्ष में लादकर ले जाता है.

इसरो और रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने गगनयान क्रू मॉड्यूल के लिए पैराशूट वाला डिसीलरेशन सिस्टम (Deceleration System) डिजाइन किया है. इस सिस्टम को रफ्तार में कमी लाने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है. 

बनावटी या घटना की कल्पना कर किए गए  इस टेस्ट में मेन पैराशूटों में से एक के खुलने में नाकाम होने के बावजूद भी हवा से भरे मेन पैराशूटों ने पेलोड को कामयाब तरीके से जमीन पर उतारा. इस तरह से गगनयान पैराशूट सिस्टम के प्रदर्शन को आंकने के लिए बनाए गए टेस्ट सीरीज का ये पहला टेस्ट पूरी तरह से कामयाब रहा.

इसके साथ ही भारत के पहले मानव अंतरिक्ष-उड़ान मिशन गगनयान के 2024 में लॉन्च होने की उम्मीदे और बढ़ गई हैं. साथ ही इसरो के इस पैराशूट एयरड्रॉप टेस्ट के जरिए ये भी साफ हो गया है भारत के पास अंतरिक्ष में अपने दम पर पहचान कायम करने की कुवत है.

गगनयान प्रोग्राम आखिर है क्या?

गगनयान प्रोग्राम के तहत 3 उड़ानें पृथ्वी की निचली कक्षा यानी लो अर्थ ऑरबिट (low-Earth orbit- LEO) में भेजी जाएंगी. इसमें पहली दो उड़ानें मानव रहित होंगी और तीसरी उड़ान इंसान को अंतरिक्ष में लेकर जाएगी.

नासा के मुताबिक एलईओ (LEO) में 2,000 किमी या उससे कम ऊंचाई वाली पृथ्वी-केंद्रित कक्षाएं शामिल हैं. अधिकांश उपग्रह एलईओ में ही होते हैं. एलईओ को पृथ्वी के काफी नजदीक पृथ्वी की कक्षा वाला इलाका माना जाता है.

वाणिज्यिक तौर पर इस्तेमाल के लिए एलईओ को सुविधाजनक परिवहन, संचार, निगरानी और रिसप्लाई के लिए मुफीद माना गया है.अंतरिक्ष अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) भी यहीं पर है. भविष्य के कई प्रस्तावित प्लेटफॉर्म भी यहीं होंगे.

इसरो के मुताबिक पहली दो उड़ानें बगैर इंसान के भेजने का मकसद तकनीक को प्रमाणित करने, सुरक्षा और विश्वसनीयता की परख करना है. ये दोनों मिशन स्पेसक्राफ्ट सिस्टम को बेहतर तरीके से समझने के लिए है, ताकि अंतरिक्ष में इंसान को लेकर जाने वाली स्पेसफ्लाइट में कोई कमीपेशी न रह जाए.

 गगनयान 1

गगनयान प्रोग्राम की पहली उड़ान गगनयान-1 है. इसके 2023 में लॉन्च होने की उम्मीद जताई जा रही है. ये एक बगैर क्रू की उड़ान होगी. बगैर क्रू से मतलब मानव रहित उड़ान से है. इसके जरिए  गगनयान क्रू कैप्सूल लॉन्च किया जाएगा.

गगनयान 1 के हिस्से के तौर पर अंतरिक्ष यान को 15 किलोमीटर की ऊंचाई पर लॉन्च किया जाएगा. इसके पहले अंतरिक्ष वैज्ञानिक क्रू कैप्सूल यानी चालक दल की धरती पर वापसी पुख्ता करने के लिए पैराशूट का इस्तेमाल कर फाल्ट की वजह से लैंडिंग को वक्त से पहले खत्म करने का बनावटी परिदृश्य रच कर जांच करेंगे.

गगनयान 2

गगनयान प्रोग्राम का दूसरा मानवरहित मिशन गगनयान 2 अगले साल 2024 में लॉन्च होने की संभावना जताई जा रही है. इसमें व्योम मित्र नाम के एक स्पेस फेयर ह्यूमनॉइड रोबोट को आउटर स्पेस में भेजा जाएगा.

गगनयान 2 क्रू कैप्सूल को गगनयान 1 की तुलना में अधिक ऊंचाई पर ले जाएगा.  गगनयान 2 के लिए सिस्टम की कामयाबी के लिए भी गगनयान 1 की तरह ही टेस्ट को अंजाम दिया जाएगा. 

गगनयान -3

गगनयान 3 पहला मानव वाला गगनयान होगा. इस मिशन को  2024 से पहले लॉन्च नहीं किया जाएगा.  दो कक्षीय उड़ान परीक्षणों गगनयान 1 और 2 के नतीजों का आकलन करने के बाद  इसरो एलईओ में कम से कम दो अंतरिक्ष यात्रियों को भेजेगा.

आईएएफ ने गगनयान 3 के संभावित चालक दल के तौर पर चार फाइटर पायलटों को चुना  है. ये क्रू  रूस में बुनियादी प्रशिक्षण ले चुका है. अंतरिक्ष यात्री ट्रेनीज का चुनाव परीक्षण पायलटों के एक पूल से किया जाएगा. इसके लिए उन्हें फिटनेस परीक्षण, मनोवैज्ञानिक और एयरो मेडिकल मूल्यांकन से गुजरना होगा.

यदि गगनयान 3 कामयाब होता है, तो सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद भारत खुद के बल पर अंतरिक्ष में इंसान भेजने वाले चौथे देश के तौर पर अपनी कायम करेगा. भारत का अगला फोकस अंतरिक्ष में लगातार इंसान की मौजूदगी हासिल करने की तरफ होगा. ये आने वाले मिशन देश की तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाएंगे और वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास में अहम योगदान देंगे.

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 में  स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में गगनयान मिशन शुरू करने का एलान किया था. इस मिशन को साल 2022 में देश के औपनिवेशिक शासन से आजादी के 75 साल पूरे होने के मौके पर  पूरा करने का टेंटेटिव टारगेट रखा गया था.

हालांकि कोविड महामारी की वजह से इसमें देरी हुई. अब पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों के 2024 के आखिर या 2025 की शुरुआत तक अपनी पहली अंतरिक्ष उड़ान शुरू करने की संभावना है.

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