क्या प्रधानमंत्री के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकता है चुनाव आयोग, जानें ताकत?
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर केंद्र और आयोग को नोटिस जारी किया है. आइए जानें कि क्या चुनाव आयोग प्रधानमंत्री के खिलाफ भी कोई कार्रवाई कर सकता है और उसके पास कितनी ताकत है.

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची संशोधन से जुड़े अहम फैसलों में दोनों चुनाव आयुक्तों को नजरअंदाज करने के आरोपों पर सुनवाई की. अदालत ने इस मामले में भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, अन्य चुनाव आयुक्तों और केंद्र सरकार को नोटिस जारी करके जवाब मांगा है. याचिका में आयोग के अंदरूनी काम करने के तरीके और मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों को चुनौती दी गई है. इस कानूनी जंग के बीच देश की जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या चुनाव आयोग देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ भी कोई अनुशासनात्मक या कानूनी कार्रवाई कर सकता है.
आचार संहिता उल्लंघन पर आयोग की शक्ति
भारत में चुनाव की घोषणा होते ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है. इस दौरान चुनाव आयोग के पास असीमित शक्तियां होती हैं. अगर देश के प्रधानमंत्री या कोई केंद्रीय मंत्री चुनाव प्रचार के दौरान किसी भी चुनावी कानून या आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं, तो आयोग उनके खिलाफ सख्त कदम उठा सकता है. इसमें नफरत भरे भाषण देने, धर्म या जाति के नाम पर वोट मांगने और सरकारी तंत्र के दुरुपयोग जैसे मामलों पर संज्ञान लेना शामिल है.
नोटिस जारी करने और जवाब मांगने का अधिकार
चुनाव आयोग को यदि किसी राजनीतिक दल से शिकायत मिलती है या वह खुद किसी नियम उल्लंघन को देखता है, तो वह सीधे प्रधानमंत्री या उनकी पार्टी को कारण बताओ नोटिस भेज सकता है. आयोग सरकारी खजाने के पैसों, सरकारी मंचों या संवैधानिक पदों का चुनाव प्रचार में गलत इस्तेमाल होने पर लिखित में सफाई मांग सकता है. इसके अलावा आयोग विवादित बयानों या विज्ञापनों पर तुरंत रोक लगाने का आदेश देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है.
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सुरक्षा और सरकारी यात्राओं में खास छूट
कानूनी रूप से सब बराबर होने के बावजूद व्यवहारिक स्तर पर प्रधानमंत्री को कुछ विशेष छूट और सुरक्षा प्रोटोकॉल हासिल होते हैं. चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के तहत प्रधानमंत्री की आधिकारिक यात्राओं और सुरक्षा व्यवस्था को चुनावी दौरों से अलग रखा जाता है. देश के सुरक्षा कारणों से उन्हें विशेष विमान और सुरक्षा घेरा इस्तेमाल करने की अनुमति होती है, बशर्ते इसका सीधा फायदा पार्टी के प्रचार या राजनीतिक रैलियों को पहुंचाने के लिए न उठाया गया हो.
अदालती समीक्षा और कानूनी चुनौतियां
चुनाव आयोग द्वारा लिए गए किसी भी फैसले या नोटिस को देश की अदालतों में चुनौती दी जा सकती है. जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत अगर चुनाव प्रक्रिया के दौरान किसी भी तरह की धांधली या पक्षपात का आरोप लगता है, तो चुनाव परिणाम आने के बाद हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में इलेक्शन पिटीशन दायर की जा सकती है. अदालत आयोग के हर फैसले की संवैधानिक समीक्षा करने का अधिकार रखती है.

आयोग की निष्पक्षता और नियुक्ति प्रक्रिया
हाल के दिनों में चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर देश में काफी बहस चल रही है. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बने नए चयन बोर्ड में प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं पेंडिंग हैं. विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया से आयोग की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है. यही वजह है कि आंतरिक फैसलों को लेकर अब सर्वोच्च अदालत को दखल देना पड़ रहा है.
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