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कर्ज पर मंगलवार को मंगलकारी खबर की आस

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नई दिल्ली: रघुराम गोविंद राजन मंगलवार यानी 5 अप्रैल को कारोबारी साल 2016-17 के लिए रिजर्व बैंक की मौद्रिक व कर्ज नीति की पहली समीक्षा सार्वजनिक करेंगे. उम्मीद है कि राजन नीतिगत ब्याज दर में कम से कम चौथाई फीसदी की कटौती तो कर सकते हैं. वैसे कुछ अर्थशास्त्री और बाजार से जुड़े लोग आधे फीसदी तक की कमी की उम्मीद कर रहे हैं. नीतिगत ब्याज दर का लोकप्रिय नाम रेपो रेट (Repo Rate or Repossession Rate) है. ये वो दर है जिसपर बहुत ही थोड़े समय के लिए रिजर्व बैंक, व्यावसायिक बैंकों को कर्ज मुहैया कराता है. हालांकि बैंकों की कुल नकदी में इस तरह की कर्ज की हिस्सेदारी कम होती है, फिर भी इससे बैंकिंग व्यवस्था में नकदी की स्थिति पर असर पड़ता है और अंत में ब्याज दर पर. सीधे शब्दों में कहें तो व्यवस्था में नकदी ज्यादा होगी, ब्याज दर में कमी का रास्ता खुलेगा और नकदी कम होने पर ब्याज दर में बढ़ोतरी का दवाब बनेगा. नीतिगत ब्याज दर में कमी हुई तो बैंको के लिए आधार दर (Base Rate) में घटाने का दवाब बढ़ेगा. इससे कर्ज सस्ता होगा. आम तौर पर ये कमी नये कर्ज पर लागू होती है. लेकिन ये नहीं भूलें कि इससे आपको अपनी जमा पर भी कम ब्याज दर मिलेगा. यानी एक जगह यदि फायदा है तो दूसरे जगह नुकसान भी. नीतिगत ब्याज दर में कमी के लिए कई संकेत इशारा कर रहे हैं . आइए नजर डालते हैं ऐसे संकेतों पर: 1. सरकारी खजाने का घाटा या राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) – 1 अप्रैल को वित्त मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि शुरुआती अनुमानों के मुताबिक 2015-16 में राजकोषीय घाटा, बजटीय लक्ष्य के मुताबिक यानी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 3.9 फीसदी के बराबर रहने के आसार हैं. रिजर्व बैंक कई मौकों पर कहता रहा है कि ब्याज दर में कमी के लिए जरूरी है कि सरकारी वित्तीय व्यवस्था में अनुशासन बना रहे. मतलब ये कि राजकोषीय घाटा काबू में बना रहे. वित्त मंत्रालय का ताजा बयान इस बात की ओर ताकीद करता है, यानी राजन के लिए नीतिगत ब्याज दर में कमी का रास्ता बन सकता है. 2. छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर – 1 अप्रैल से पब्लिक प्रॉविडेंट फंड और नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट जैसी सरकारी छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर में कमी लागू हो गयी है. इस कमी के लिए राजन कई मौकों पर सरकार से आग्रह कर चुके थे. बैंकों का भी कहना था कि छोटी बजत योजनाओं के आकर्षक होने की वजह से वो ब्याज दर नहीं घटा पाते. क्योंकि ब्याज दर घटाने से उनकी जमा के बजाए लोग छोटी जमा योजनाओं में ज्यादा पैसा लगाएंगे. नतीजतन बैंक के पास कर्ज देने के लिए पैसे कम होगे. बहरहाल, सरकार के ताजा फैसले के बाद अभी भी छोटी जमा योजनाएं, बैंक जमा के मुकाबले बेहतर है. मसलन, 5 साल की मियाद वाले नेशनल सेविग्स सर्टिफिकेट पर सालाना ब्याज दर 8.1 फीसदी है. इसके अलावा इसमें लगाए पैसे पर टैक्स छूट भी मिलती है. वहीं बैंकों में 1 साल से ज्यादा की जमा पर औसत ब्याज दर 7 से 7.9 फीसदी है. साथ ही एक को छोड़कर किसी भी बैंक की मियादी जमा पर टैक्स छूट नहीं मिलती. 3. खुदरा महंगाई दर – सरकार और रिजर्व बैंक के बीच हुए समझौते के मुताबिक, जनवरी 2016 तक खुदरा महंगाई दर को छह फीसदी तक सीमित किया जाना था, जबकि 2016-17 और उसके बाद के कारोबारी सालों में ये 2 से 6 फीसदी के बीच होना चाहिए. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जनवरी में खुदरा महंगाई दर 5.37 फीसदी रही जबकि फरवरी में 5.69 फीसदी. मार्च के आंकड़े अभी आने है, लेकिन अनुमान है कि य़ह छह फीसदी से ज्यादा नहीं होगा. कुल मिलाकर खुदरा महंगाई दर लक्ष्य के भीतर है, लिहाजा ब्याज दर घटाने का रास्ता खुल सकता है. गौर करने की बात ये है कि पहले नीतिगत ब्याज दर की समीक्षा का आधार थोक बाजार की महंगाई दर (Wholesale Price Index or WPI) हुआ करती थी, लेकिन अब ये खुदरा महंगाई दर (CPI or Consumer Price Index) है) 4. औद्योगिक उत्पादन दर – उद्योग की हालत खस्ता है. सरकार के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जनवरी में विनिर्माण (Manufacturing) की विकास दर (-) 2.8 फीसदी रही जबकि पूरे उद्योग की विकास दर (-) 1.5 फीसदी रही. अब इस स्थिति से उबरने के लिए जरूरी है कि उद्योग को सस्ता कर्ज मिले. ये मुमकिन हो सकेगा नीतिगत ब्याज दर में कटौती के जरिए. वैसे एक बड़ी शिकायत ये रही है कि नीतिगत ब्याज दर में जितनी कटौती रिजर्व बैंक करता है, बैंक ठीक उतना ही कर्ज पर ब्याज दर नहीं घटाते. मसलन, 2015 के बीच चार चरणों में रिजर्व बैंक ने नीतिगत ब्याज दर में सवा फीसदी की कटौती की, लेकिन बैंकों ने कर्ज के लिए आधार ब्याज दर में औसतन 63 बेसिस प्वाइंट्स (100 बेसिस प्वाइंटस = 1 परसेंटेज प्वाइंट या 1 फीसदी) की ही कटौती है. दूसरी ओर जमा पर औसतन ब्याज दर 93 बेसिस प्वाइंट्स घटा. दूसरे शब्दों में कहे तो जमा करने वालों को ज्यादा कमी झेलनी पड़ी जबकि कर्ज लेने वालों को उस अनुपात में फायदा नहीं हुआ. फिलहाल, बैंकों के लिए कर्ज पर ब्याज दर के आकलन का एक नया तरीका 1 अप्रैल से लागू किया गया है. पहले फंड की औसत लागत के आधार पर ब्याज दर का आकलन होता था, लेकिन अब जिस मियाद की ब्याज दर की जितनी लागत है, उसी के बराबर कर्ज पर ब्याज दर होगी. यही नहीं जब-जब जमा पर ब्याज दर की समीक्षा होगी, तब-तब कर्ज पर भी ब्याज दर में फेरबदल किया जा सकता है. तकनीकी भाषा में इस व्यवस्था को MARGINAL COST OF FUNDS BASED LENDING RATE (MCLR) कहते हैं. कुल मिलाकर ब्याज दर घटाने का माहौल बन रहा है. वित्त मंत्री अरूण जेटली भी कह चुके हैं, “जो सभी चाहते हैं, मैं भी वही चाहता हूं.” उम्मीद की जानी चाहिए कि राजन कम से कम जेटली को निराश नहीं करेंगे.
Published at : 02 Apr 2016 10:24 AM (IST) Tags: repo rate Raghuram Rajan RBI
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