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क्या है प्रियंका गांधी का यूपी प्लान, 2022 विधानसभा चुनाव के लिए तैयार है ये ब्लू प्रिंट, पढ़ें सब कुछ

2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले प्रियंका गांधी ने यूपी में संगठन को मजबूत करने के लिए ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है. यहां विस्तार से इसकी चर्चा है.

नई दिल्ली: सोनभद्र में आदिवासियों के नरसंहार का मामला हो, किसानों का मुद्दा हो, प्रवासी मजदूरों का मुद्दा हो या फिर हाथरस कांड हो, प्रियंका गांधी अब खुलकर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक अखाड़े में उतर गई हैं. 2022 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस संगठन को मज़बूत करने के लिए प्रियंका गांधी ने पूरा ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है. वो सभी ग्राम सभाओं तक संगठन को पहुंचाने में लग गई हैं.

क्या है प्रियंका गांधी का ब्लू प्रिंट?

एबीपी न्यूज़ को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक, प्रियंका गांधी ने कांग्रेस पार्टी के स्थापना दिवस, यानी 28 दिसंबर तक उत्तर प्रदेश के तकरीबन 60000 गांवों में ग्राम सभा कमेटी बनाने के निर्देश दे दिए हैं.

सूत्रों के मुताबिक़, प्रियंका खुद इसे लेकर यूपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ, एक-एक दिन में कई राउंड की बातचीत वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिए कर रही हैं. उन्होंने उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू समेत बाकी सीनियर पदाधिकारियों से यहां तक कह दिया है कि जब तक ये काम पूरा नहीं होते तब तक बड़े नेता किसी और चक्कर में ना पड़ें. यही नहीं, प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी जिसके पहले करीब 490 ऑफिस बियरर्स और करीब 70 इन्वाइटी सदस्य होते थे, उसे घटाकर 55 सदस्यों वाली प्रदेश कमेटी बना दी. हालांकि, इसका कुछ विरोध भी हुआ क्योंकि तीस-तीस सालों से कमेटी में बैठे कई लोग अब नई कमेटी में नहीं थे.

यूपी कांग्रेस कमेटी में जुझारू लोगों को मौका

प्रियंका ने जुझारू और संघर्षशील लोगों को मौका दिया जिसका असर सड़कों पर दिख रहा है. आज उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्यों की औसत आयु 44 साल है. यही नहीं, प्रियंका ने कमान अजय कुमार लल्लू को सौंपने के साथ ही एआईसीसी के 6 सचिवों को अलग-अलग जिले सौंपे. ज़िला अध्यक्ष और शहर अध्यक्ष चुनने के लिए ओपेन इंटरव्यू करने के निर्देश दिए.

इसके बाद सभी जिलों से भेजे गए 10-10 नामों से प्रियंका गांधी खुद मिलीं और फिर महीनों की जद्दोजहद के बाद जिला अध्यक्षों और शहर अध्यक्षों का चयन किया गया. इस पूरी प्रक्रिया में 750 नाम जिला अध्यक्ष और करीब 600 नाम हर अध्यक्षों के लिए सामने आए. इसमें से 55 ज़िला अध्यक्ष और 40 शहर अध्यक्षों की पहली सूची पिछले साल अक्टूबर में  निकाली गई और इस मार्च में ये काम पूरा कर लिया गया है. आज के समय में यूपी के सभी जिलों में नियुक्तियां की जा चुकी हैं.

संगठन में जातीय समीकरण का भी रखा गया है ध्यान

गौर करने वाली बात ये है कि प्रियंका गांधी ने नई गठित प्रदेश कमेटी में जातीय समीकरण का भी ध्यान रखा है. उनकी नई प्रदेश कमेटी में करीब 42 फीसदी ओबीसी हैं. सूत्रों की मानें तो प्रियंका का खास ध्यान दूसरी अन्य बिरादरियों के अलावा ब्राह्मणों और कुर्मियों पर भी है. यही वजह है कि प्रियंका ने नौ जिला और शहर अध्यक्ष कुर्मी समुदाय से बनाए हैं. दलित समुदाय को भी प्रियंका केन्द्र में रखना चाहती हैं. लिहाज़ा उन्होंने प्रदेश कमेटी के एससी डिपार्टमेंट का जिम्मा दलित समाज के एक युवा चेहरे और एआईसीसी इंचार्ज प्रदीप नरवाल को सौंपा. प्रदीप नरवाल हाल में हाथरस मामले में टीम प्रियंका का नेतृत्व कर रहे थे.

प्रियंका ने दिसंबर 2019 में सबसे बड़ा संपर्क अभियान ‘किसान जनजागरण अभियान’ के नाम से चलाया जिसके तहत आवारा पशुओं का मामला, बिजली बिल का मामला, किसानों की आत्महत्या,  गन्ना और धान किसानों की शिकायतों का मामला पूरे राज्य भर में उठाया गया. यही नहीं इसके बाद तहसील दिवस के दिन कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने लोगों के साथ जाकर एसडीएम और डीएम के सामने उनकी शिकायतें दर्ज़ कराईं.

गौरतलब है कि प्रियंका गांधी ने संगठन की मजबूती के लिए 10 अगस्त से संगठन सृजन अभियान चला रखा है. इसमें 28 दिसंबर तक यूपी के सभी 60000 गावों में ग्राम सभा कमेटियां बनाने के निर्देश दिए हैं. पार्टी नेताओं के मुताबिक, इस प्रक्रिया के ज़रिए जहां एक साल पहले तक प्रदेश कार्यालय में केवल 7000 लोगों के मोबाइल नंबर्स का डाटा बैंक था, वो अब बढ़कर करीब 72 लाख हो गया है.

किस घटना के बाद से प्रियंका गांधी ने संभाला मोर्चा?

सोनभद्र नरसंहार की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. प्रियंका की एसपीजी सुरक्षा तब नहीं हटाई गई थी. इसके बावजूद वो बिना किसी को बताए अचानक ही बनारस पहुंच गई थीं और जब वो बनारस-मिर्जापुर बॉर्डर तक पहुंच गईं तब प्रशासन को समझ आया कि प्रियंका तो सोनभद्र जा रही हैं. इसके बाद उन्हें रोका गया और फिर चुनार चे किले ले जाया गया.

यहां एबीपी न्यूज़ ने उनसे सवाल किया था कि आप पर फोटो की राजनीति का आरोप लगाया जा रहा है तब उन्होंने कहा था, “मैं तो यहां किसी को बता कर नहीं आई और जहां भी अन्याय होगा वहां मैं जाऊंगी, चाहे मुझे जेल में डाल दे.” सोनभद्र में आंदोलन कर रहे एक गोंड समुदाय के युवा रामराज सिंह गोंड को प्रियंका ने बाद में सोनभद्र का जिला अध्यक्ष बना दिया.

इसी के बाद प्रियंका ने ठान लिया था कि उत्तर प्रदेश कि लड़ाई संगठन के पुराने ढांचे से नहीं लड़ी जा सकती.  इसके लिए संगठन को नए सिरे से ज़मीनी स्तर से फिर से लोगों को जोड़ना होगा. नए लोगों के लिए कांग्रेस के दरवाजे खोलने होंगे.

लोकसभा चुनाव के बाद प्रियंका ने उत्तर प्रदेश के सभी प्रत्याशियों और वरिष्ठ नेताओं को बुलाकर संगठन में बदलाव के लिए राय भी ली थी. इसके बाद वो दो दिनों के लिए लखनऊ भी गई थीं और सभी ज़िला कमेटियों से 10-10 लोगों को बुलाकर उनकी शिकायतें भी सुनी थीं.

क्या प्रियंका यूपी के अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का चेहरा होंगी?

सूत्रों कि मानें तो अभी इस पर सभी विकल्प खुले हैं. इस बाबत कोई भी फैसला सही समय पर सभी की राय से लिया जाएगा. हालांकि, पार्टी के कई नेता कह रहे हैं कि प्रियंका के नेतृत्व में कांग्रेस 2022 में यूपी में एक मज़बूत विकल्प के तौर पर उभरेगी.

सूत्रों के मुताबिक, प्रियंका ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के फ्रंट लाइन संगठनों को भी पुनर्गठित किया है. युवा कांग्रेस, एनएसयूआई, दलित कांग्रेस, ओबीसी कांग्रेस, किसान कांग्रेस, सेवा दल माइनॉरिटी कांग्रेस को पुनर्गठित करने के बाद अब वे जल्द ही उत्तर प्रदेश महिला कांग्रेस का पुनर्गठन करने वाली हैं.

बेरोजगारी और युवाओं से जुड़े मुद्दे से सीधे जुड़ीं प्रियंका

प्रदेश में बेरोजगारी के मुद्दे और युवा आक्रोश से प्रियंका सीधे जुड़ी हैं. उन्होंने तमाम अटकी हुई भर्तियों के लिए युवाओं से संवाद किया है. सूत्रों की मानें तो संगठन को मज़बूती देने के लिए उठाए जा रहे तमाम कदमों के साथ साथ प्रियंका यूपी सरकार को चुनौती देती रहेंगी. बिजनौर में गोली चलने का मामला सामने आने पर प्रियंका को लखनऊ में सड़क पर रोका गया तो वो एआईसीसी सचिव धीरज गुर्जर की स्कूटी पर ही बैठ कर निकल गई थीं.

यही नहीं, प्रियंका गांधी बाद में लाख रोके जाने के बावजूद अंबेडकरवादी चिंतक एसआर दारापुरी के घर भी गई थीं. पार्टी सूत्रों के मुताबिक ये वो मुद्दे हैं जो प्रियंका गांधी नहीं बल्कि यूपी सरकार की लापरवाही की वजह से सामने आए.

सीएए/एनआरसी को लेकर विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रियंका गांधी सबसे पहले अचानक एक शाम इंडिया गेट के सामने विरोध प्रदर्शन पर बैठ गई थीं. राहुल गांधी इस आंदोलन में प्रियंका के बाद ही जुड़े थे. इसके अलावा लॉकडाउन के दौरान यूपी के प्रवासी मज़दूरों की मदद के लिए उन्होंने बसों का इंतजाम किया. इसे लेकर सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ उनका काफी वाद-विवाद भी हुआ था.

क्या है प्रियंका गांधी की चुनौती?

अब देखना दिलचस्प होगा कि प्रियंका अपने इन सभी कदमों के दम पर कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में फिर से खड़ा कर पाती हैं या नहीं? क्योंकि उनके सामने चुनौती सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि बीएसपी और एसपी भी है.

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