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पुण्यतिथि: जानिए कौन थे फील्ड मार्शल मानेकशॉ, जिन्हें गोरखा सैनिक सैम बहादुर के नाम से पुकारते थे

1962 के चीन युद्ध के दौरान वे कोर कमांडर थे और अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया था. सेना-निवृत्त होने के बाद उन्होनें एक इंटरव्यू में चीन से हुए युद्ध में हार के कारणों में सेना के राजनैतिक-करण और काबिल सैन्य कमांडर्स को दरकिनार करना बताया था.

नई दिल्ली: “अगर कोई ये कहता है कि वो मौत से नहीं डरता है, तो वो या तो झूठ बोल रहा है या फिर गोरखा है.” इतना अटूट विश्वास था भारत के सबसे बड़े मिलिट्री-कमांडर में से एक, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का‌ गोरखा रेजीमेंट के सैनिकों पर. आज मानेकशॉ की 12वीं पुण्यतिथि है और ऐसे समय में है, जब भारत और नेपाल के संबंध बेहद नाजुक मोड़ पर हैं और नेपाल में ऐसी आवाजें उठने लगी हैं कि नेपाल के गोरखा नागरिकों को भारतीय सेना में शामिल नहीं होना चाहिए.

दरअसल, नेपाल की कुछ जातियों और जनजातियों के लिए भारतीय सेना की गोरखा रेजीमेंट में भर्ती की इजाज़त है. ऐसे में भारतीय सेना में बड़ी तादाद में नेपाली मूल के गोरखा सैनिक हैं. इस गोरखा रेजीमेंट में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दार्जिलिंग और असम के रहने वाले गोरखा नागरिकों की भी भर्ती होती है. माना जाता है कि गोरखा सैनिक अपनी बहादुरी, कर्तव्य-परायणता और अनुशासन के लिए पूरी भारतीय सेना में जाने जाते हैं.

ऐसे ही गोरखा रेजीमेंट के अफसर थे फील्ड मार्शल मानेकशॉ जो आजादी से पहले सेना में शामिल हुए थे. हालांकि, ब्रिटिश रॉयल इंडियन आर्मी में वे फ्रंटियर रेजीमेंट में शामिल हुए थे. लेकिन देश के बंटवारें के बाद ये रेजीमेंट पाकिस्तान में चली गई थी. इसलिए मानेकशॉ गोरखा रेजीमेंट में आ गए. यहीं पर गोरखा सैनिक उन्हें सैम बहादुर के नाम से पुकारने लगे.

इस वक्त भारतीय सेना की गोरखा रेजीमेंट में एक अनुमान के मुताबिक, करीब 25-30 हजार सैनिक नेपाली मूल के हैं. लेकिन हालिया भारत-चीन-नेपाल विवाद के कारण नेपाल के कुछ प्रतिबंधित संगठनों ने नेपाली नागरिकों से गोरखा रेजीमेंट में शामिल ना होने का आहवान किया है. लेकिन जानकार मानते हैं कि जो अटूट बंधन मानेकशॉ जैसे उच्च श्रेणी के सैन्य कमांडर ने गोरखा रेजीमेंट के भारतीय सेना से स्थापित किए हैं, वे इतनी आसानी से नहीं टूटने वाले. आपको बता दें कि मौजूदा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस), जनरल बिपिन रावत भी गोरखा रेजीमेंट के अधिकारी हैं.

पुण्यतिथि: जानिए कौन थे फील्ड मार्शल मानेकशॉ, जिन्हें गोरखा सैनिक सैम बहादुर के नाम से पुकारते थे

पंजाब के अमृतसर में जन्में मानेकशॉ का पूरा नाम सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ था. द्वितीय‌ विश्वयुद्ध के दौरान म्यांमार में एक युवा कैप्टन मानेकशॉ ने बेहद ही बहादुरी का परिचय दिया था और बुरी तरह घायल हो गए थे. इस युद्ध में उन्हें बहादुरी के लिए मिलिट्री-क्रॉस से नवाजा गया था. 1947-48 के पाकिस्तान युद्ध के दौरान वे मिलिट्री-ऑपरेशन्स डायेरेक्टरेट में तैनात थे और युद्ध की प्लानिंग से जुड़े थे.

1962 के चीन युद्ध के दौरान वे कोर कमांडर थे और अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया था. सेना-निवृत्त होने के बाद उन्होनें एक इंटरव्यू में चीन से हुए युद्ध में हार के कारणों में सेना के राजनैतिक-करण और काबिल सैन्य कमांडर्स को दरकिनार करना बताया था.‌ उन्होनें सैन्य कमांडर्स को ‘यस-बॉस’ मानसिकता से बचने की नसीहत दी थी.

यही वजह है कि 1971 के युद्ध के दौरान जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैम मानेकशॉ से पाकिस्तान से युद्ध करने के लिए कहा था तो उन्होनें साफ कर दिया कि सेना को युद्ध के लिए तैयार होने में छह महीने का वक्त चाहिए. लेकिन ये उनके कुशल नेतृत्व का ही नतीजा था कि भारत ने ना केवल ’71 का युद्ध जीता बल्कि पाकिस्तान के दो टुकड़े भी हो गए (टूटकर नया देश बांग्लादेश बना). इस युद्ध के बाद ही उन्हें फील्ड मार्शल (फाइव स्टार जनरल) की पदवी से नवाजा गया-सेना प्रमुख फॉर स्टार यानी चार सितारा जनरल होते हैं.

पुण्यतिथि: जानिए कौन थे फील्ड मार्शल मानेकशॉ, जिन्हें गोरखा सैनिक सैम बहादुर के नाम से पुकारते थे

सेना से रिटायरमेंट के बाद सैम मानेकशॉ तमिलनाडु के छोटे से हिल-स्टेशन, वेलिंगटन में रहने लगे थे. वेलिंगटन में सेना का डिफेंस स्टाफ कॉलेज है, जहां से भी सेना में अपनी सेवाएं देने के दौरान जुड़े हुए थे. इ‌सलिए उनका जुड़ाव वेलिंगटन से था. वर्ष 2008 में आज ही के दिन वेलिंगटन में उन्होंने आखिरी सांस ली थी. आज वेंलिंगटन में तीनों सेनाओं की तरफ से उनके मेमोरियल पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई.

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नीरज राजपूत देश के जाने-माने डिफेंस-जर्नलिस्ट और वॉर-लेखक हैं. पत्रकारिता में करीब ढाई दशक का अनुभव रखते हैं और प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल मीडिया तीनों में गहरी पकड़ है.

वर्तमान में वे ABP नेटवर्क से जुड़े हैं, जहाँ युद्ध, रक्षा, नेशनल सिक्योरिटी और जियो-पॉलिटिक्स से संबंधित विषयों को कवर करते हैं. ABP लाइव पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘गेम-चेंजर’ के प्रस्तुतकर्ता भी हैं.

रूस-यूक्रेन युद्ध पर उन्होंने पहली हिंदी पुस्तक "ऑपरेशन Z लाइव" लिखी, जो बेस्टसेलर सूची में भी शामिल हुई और पाठकों द्वारा खूब सराही गई.

रिपोर्टिंग का दायरा
- दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन से लेकर आतंकवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर और चीन सीमा पर तिब्बत के पठार तक
- पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर-स्ट्राइक से लेकर पनडुब्बी के जरिए समुद्र के भीतर तक
- ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनके एक्सक्लूसिव खुलासे और सटीक विश्लेषणों की व्यापक सराहना हुई
- यूक्रेन-रूस युद्ध क्षेत्र में मारियुपोल, डोनेत्स्क और लुहांस्क जैसे एक्टिव वॉर-जोन से रिपोर्टिंग. इसी अनुभव पर आधारित उनकी पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई
- दुनिया की सबसे संवेदनशील सीमाओं में से एक उत्तर-दक्षिण कोरिया की DMZ
- ⁠अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य अड्डों में से एक JBLM, और शीत युद्ध के दौरान "गैर-मौजूद" माने जाने वाले रूसी सैन्य अड्डों से भी ग्राउंड रिपोर्टिंग. 
- ⁠वे उन चुनिंदा रक्षा जुड़े पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के पहले स्वदेशी अटैक हेलिकॉप्टर LCH-प्रचंड के कॉकपिट में उड़ान भरी है. इसके अलावा फ्रांस में राफेल लड़ाकू विमान निर्माण सुविधा से भी उन्होंने विशेष रिपोर्टिंग की.

भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित 'Defence Correspondent Course' के Alumni हैं.

पूर्व कार्य अनुभव
- STAR NEWS में लगभग 6 वर्षों तक चीफ रिपोर्टर (क्राइम) के तौर पर कार्य किया और लोकप्रिय क्राइम शो 'सनसनी' से जुड़े रहे
- पत्रकारिता की शुरुआत अंग्रेजी दैनिक नेशनल हेराल्ड से की
- इसके बाद B.A.G. Films के साथ जुड़कर STAR NEWS के लिए क्राइम शो बनाए
- SAHARA TV में भी लगभग 2 वर्षों तक कार्यरत रहे

रक्षा और सुरक्षा के मामलों पर उनकी पकड़, ग्राउंड-जीरो रिपोर्टिंग और गहन विश्लेषण उन्हें देश के सबसे भरोसेमंद डिफेंस जर्नलिस्ट्स में स्थापित करती है.

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