By: एबीपी न्यूज, वेब डेस्क | Updated at : 15 Oct 2016 09:56 PM (IST)
मुंबईः भारत पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा तो चर्चा शुरू हो गई कि अगर परमाणु युद्ध हुआ तो क्या होगा? विनाश की आशंका के बीच सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि 20 साल के भीतर देश के 197 परमाणु वैज्ञानिकों की रहस्यमत मौत हो गई जबकि पिछले कुछ सालों में 10 वैज्ञानिकों की हत्या की जा चुकी है. दावा चौंकाने वाला है मौतों का रहस्य आखिर है क्या?
आंकड़े बताते हैं कि सीधे तौर पर 2 करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत होगी. दो अरब लोग भूख से मरने की कगार पर पहुंच जाएंगे दुनिया की आधी ओजोन परत खत्म हो जाएगी और खेती तक बर्बाद हो जाएगी.
आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जो ताकत इतना विनाश कर सकती है. उससे जुड़े लोग किसी भी देश के लिए कितने जरूरी हो सकते हैं फिर चाहे वो पाकिस्तान हो या फिर हिंदुस्तान.
आज परमाणु वैज्ञानिकों की बात इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि 20 साल के भीतर भारत के 197 परमाणु वैज्ञानिकों की रहस्यमय मौत हो गई. 7 साल के भीतर देश के 10 बड़े परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या कर दी गई.

क्या लिखा है मैसेज में?
फेसबुक या फिर वॉट्सऐप किसी ना किसी तरीके से शायद ये मैसेज आप तक भी पहुंचा हो. दावा है कि भारत की जनसंख्या सवा अरब है देश की सेना में 13 लाख 25 हजार सैनिक हैं.इस देश में 2 सैनिकों की हत्या होने की कीमत 2 हजार लोगों पर खतरा होने के बराबर है तो जरा सोचिए देश के एक परमाणु वैज्ञानिक की हत्या की क्या कीमत चुकानी पड़ेगी? लेकिन हम चुका रहे हैं देश में हर व्यक्ति इस बात से अंजान है.
मैसेज में आगे लिखा है 2009 से 2016 के बीच देश के 10 बड़े परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या कर दी गई. ये वो वैज्ञानिक थे जो देश के कई प्रोजेक्ट के साथ जुड़े थे.जबकि 1995 से लेकर 2015 तक यानि 20 साल के भीतर देश के 197 परमाणु वैज्ञानिकों की रहस्यमय मौत हो गई और हमें पता ही नहीं.
ये दावा और ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं. मैसेज में सिर्फ आंकड़े पेश नहीं किए गए बल्कि तीन परमाणु वैज्ञानिकों के नाम के साथ ये बताया गया है कि उनकी लाश किन हालात में मिली थी.
पहला नाम 48 साल के BARC के वैज्ञानिक एम पद्मनाभन की लाश उनके फ्लैट पर मिली.
दूसरा नाम एक हफ्ते तक लापता रहे कैग परमाणु संयंत्र से जुड़े सीनियर इंजीनियर एल एन महालिंगम की लाश काली नदी में तैरती पाई गई थी.
तीसरा नाम 2013 में विशाखापत्तनम में रेलवे ट्रैक के किनारे केके जोश और अभीष शिवम की लाश मिली. ये दोनों वैज्ञानिक देश की पहली स्वदेशी पनडुब्बी अरिहंत के निर्माण से जुड़े थे.
दावा है कि ये हत्याएं उन तरीकों से हुई जो तरीका दुनिया की कुछ खुफिया एजेंसी ही अपनाती हैं ये मैसेज टीएस सुब्रमण्यम के हवाले से वायरल किया जा रहा है जिन्हें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी विभाग का रिटायर्ड अध्यक्ष बताया जा रहा है.
ये दावे हमारे देश की सुरक्षा के साथ जुड़े हुए हैं. सच सामने लाने के लिए एबीपी न्यूज ने वायरल मैसेज की पड़ताल की.

एबीपी न्यूज ने की मैसेज की पड़ताल
एबीपी न्यूज संवाददाताओं ने तीन मोर्चों पर पड़ताल की. हमने बैंगलोर और विशाखापत्तनम में ये पता लगाने की कोशिश की क्या जिन मौतों का दावा किया जा रहा है वो सच हैं. हमने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान यानि इसरो से संपर्क करके ये जानने की कोशिश की क्या वहां कोई टीएस सुब्रमण्यम नाम के विभाग अध्यक्ष रहे हैं? और तीसरा मोर्चा यानि मुंबई में हमने पता लगाने की कोशिश की बार्क यानि भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक एम पद्मनाभन के साथ क्या हुआ था?
एबीपी न्यूज की पड़ताल में क्या मिला ये हम आपको बताएंगे लेकिन सवाल ये है कि क्या देश के परमाणु वैज्ञानिकों की जानकारी सबके पास होती है?
परमाणु वैज्ञानिकों की जानकारी किसी के पास नहीं होती ऐसे में उनकी हत्या और उनकी संदिग्ध मौतों का ये दावा चौंकाने वाला है. मुंबई में एबीपी न्यूज संवाददाता मयूर परीख मुंबई में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र यानि बार्क के वैज्ञानिकों की कॉलोनी पहुंचे.
साल 2010 में बेहद सुरक्षा वाली ये कॉलोनी अचानक चर्चा में आ गई जब इसके एक फ्लैट में 48 साल के बार्क के वैज्ञानिक एम पद्मनाभन का शव पाया गया. उनकी लाश के पास नायलोन की रस्सी और कुछ कंडोम मिले थे. पुलिस ने शुरुआती जांच में इसे अप्राकृतिक सेक्स से जुड़ी हत्या का मामला बताया. लेकिन जब जांच आगे बढ़ी तो पुलिस अपनी बात साबित नहीं कर पाई.
2012 में पुलिस ने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी. इसमें पद्मनाभन की हत्या की बात तो उसने मानी लेकिन कहा कि इस मामले की जांच आगे बढ़ाने के लिए उसके पास पर्याप्त सबूत नहीं है. ये मामला इस रिपोर्ट के बाद खत्म हो गया.
सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों शुरुआती जांच की थ्योरी पुलिस साबित नहीं कर पाई?लाश के पास कंडोम मिले थे कहीं ये हनीट्रैप जैसा कोई मामला तो नहीं था? पुलिस ने हत्या की बात को मानी फिर सबूत क्यों नहीं मिल पाए?
इसके बाद एबीपी न्यूज पहुंचा विशाखापत्तनम जहां कैगा परमाणु संयंत्र से जुड़े सीनियर इंजीनियर एलएन महालिंगम की मौत का दावा किया गया है.
14 जून, 2009 में कर्नाटक स्थित कैगा परमाणु रिएक्टर से जुड़े एक सीनियर इंजीनियर लोकनाथन महालिंगम की लाश काली नदी में पाई गई थी. महालिंगम एक हफ्ते पहले रहस्यमय तरीके से गायब हो गए थे. पुलिस के मुताबिक ये मामला आत्महत्या का था.
महालिंगम का परिवार इसे आत्हत्या मानने के लिए तैयार नहीं था. परिवार का कहना था कि महालिंगम का अपहरण कर उनकी हत्या की गई है. पुलिस इस केस को भी बंद कर चुकी है.
सवाल ये उठता है कि पुलिस ने केस बंद क्यों किया? परिवार क्यों नहीं मान रहा था ये सुसाइड है? आखिर क्यों महालिंगम की हत्या से पर्दा नहीं उठा?
विशाखापत्तनम में रेलवे ट्रैक पर केके जोश और अभीश शिवम की लाश मिली थी. दोनों इंजीनियर देश की पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी अरिहंत के निर्माण से जुड़े थे. लेकिन पुलिस ने इस मामले को भी दुर्घटना मानकर बंद कर दिया था.
जबकि इन इंजीनियरों की हत्या को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट में जो जनहित याचिका लगाई गई है उसमें कहा गया है कि केके जोश और अभीष शिवम को किसी ट्रेन ने टक्कर नहीं मारी थी लेकिन उनकी मौत हो गई. याचिका के मुताबिक उन्हें जहर दिया गया था और रेलवे ट्रैक के पास फेंक दिया गया ताकि मौत दुर्घटना या आत्महत्या लगे.
साल 2015 में वैज्ञानिकों की हत्या के मामले ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी थीं बॉम्बे हाईकोर्ट में एक पीआईएल दायर करके ये मांग की गई कि इन मामलों की जांच के लिए एसआईटी बनाई जाए. पीआईएल दायर करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता चेतन कोठारी थे.
2010 में चेतन कोठारी ने परमाणु ऊर्जा विभाग से आरटीआई के जरिए ये जानकारी मांगी थी कि 1995 से लेकर 2010 के बीच विभाग के कितने लोगों की असामान्य मौत हुई है आरटीआई के जवाब में कहा गया था कि परमाण ऊर्जा विभाग के कुल 32 केंद्रों में 197 संदिग्ध मौतों के मामले सामने आए. एबीपी न्यूज ने चेतन कोठारी से इस बारे में बात की.
हमने इसरो के जन संपर्क अधिकारी से फोन पर बात की उन्होंने हमें बताया कि वहां टीएस सुब्रमण्यम का कोई विभाग अध्यक्ष नहीं है.
एबीपी न्यूज ने और पड़ताल की तो पता चला टीएस सुब्रमण्यम कोई वैज्ञानिक नहीं बल्कि चेन्नई शहर में एक पत्रकार हैं. जो "द हिन्दू की फ्रंटलाइन मैगजीन में वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर विज्ञान के क्षेत्र में लिखते रहे हैं उन्हें इंडियन न्यूक्लियर सोसायटी की तरफ से सम्मानित भी किया जा चुका है. टीएस सुब्रमण्यम ने हमें बताया कि ये जरूरी नहीं कि इन मौतों के पीछे कोई साजिश हो ये मामले व्यक्तिगत भी हो सकते हैं
एबीपी न्यूज की पड़ताल में सामने आया है कि परमाणु वैज्ञानिकों की मौत को लेकर जो आंकड़े पेश किए जा रहे हैं वो सच हैं. लेकिन ये मौतें हत्या ही थीं या इन मौतों के पीछे इनका परमाणु वैज्ञानिक होना वजह है ये नहीं कहा जा सकता है
दूसरी बात ये सामने आई है कि जिनके नाम से मैसेज वायरल हो रहा है वो गलत हैं टीएस सुब्रमण्यम कोई वैज्ञानिक नहीं बल्कि एक पत्रकार हैं.
इसलिए हमारी पड़ताल में वायरल कहानी आधा सच साबित हुआ है.
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