By: एबीपी न्यूज़, वेब डेस्क | Updated at : 12 Aug 2016 04:53 PM (IST)
नई दिल्ली: अस्सी साल के डॉक्टर गोकाणी 19 जनवरी 1990 को पुणे के आश्रम में ही मौजूद थे जब आश्रम के लाओत्से हाउस के नए बेडरुम मे ओशो ने देह त्याग दिया था. अब ओशो की मौत के 25 साल बाद डॉक्टर गोकाणी ने अदालत में एक हलफनामा दाखिल किया है. उनका कहना है कि दोपहर 1 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक ओशो के आश्रम में जो कुछ घटा वो रहस्यमयी था जिसके वो अहम गवाह है.
डॉक्टर गोकाणी ने हलफनामे में कहा है कि 19 जनवरी 1990 के दिन दोपहर 1 बजे जब वो ओशो आश्रम के पास अपने घर में आराम कर रहे थे तब उन्हें आश्रम से ओशो के करीबी स्वामी जयेश उर्फ माइकल ओब्रायन के निजी सचिव स्वामी चितिन लेने आए थे. चितिन ने कहा कि आपके लेटरहेड के साथ अपनी इमरजेंसी मेडिकल बैग ले लीजिए. आपको स्वामी जयेश ने बुलाया है. करीब दोपहर डेढ़ बजे चितिन मुझे आश्रम में कृष्णा हाउस के जयेश के रुम में ले गए.
तब जयेश ने मुझे कहा कि डॉक्टर अमृतो ऊर्फ डॉक्टर जॉन एड्रंयू ऊर्फ डॉक्टर डॉर्ज मेरीडिथ आपके पास आएंगे और आपको बात समझाएंगे. पांच मिनट बाद अमितो आए और बिना प्रस्तावना बांधे ही मुझसे कहा कि वो मर रहे हैं. मैंने उनसे पूछा कौन, उन्होंने कहा ओशो. और मुझे गले से लगा लिया. मैं रो पड़ा. उन्होंने कहा कि क्या आप इस तरह से अपने गुरु को विदाई दोगे. आप अपने आपको संभालो औऱ अपने आश्रम की जिम्मेदारियों को निभाओ.
डॉक्टर गोकाणी के हलफनामें के मुताबिक शाम पांच बजे उन्हें अपने मेडिकल बैग समेत ओशो के कमरे में बुलाया गया. कमरे में जयेश और डॉक्टर अमृतों दोनों मौजूद थे. अमृतो ने कहा उन्होंने कुछ देर पहले देह त्याग दिया है और आपको डेथ सर्टिफिकेट लिखना है ताकि उनका अंतिम संस्कार किया जाए. तो मैंने मौत की वजह पूछी क्योंकि मैंने उन्हें मरते हुए नहीं देखा था.
डॉक्टर गोकाणी आगे कहते हैं कि मेरे मन में ये विचार भी आया कि मैं तो आश्रम में ही था फिर मुझे उनकी मौत से पहले क्यों नहीं बुलाया. उनके मरने का इंतजार क्यों किया गया. डॉक्टर गोकाणी ने कहा, "मुझे ये भी समझ नहीं आया कि अमृतो और जयेश से परिचित बहुत सारे भारतीय औऱ पश्चिमी डॉक्टर मौजूद थे तो फिर मुझे ही क्यों बुलाया."
फिर डॉक्टर गोकाणी ने कहा कि, "मैंने अमृतो से कहा कि डेथ सर्टिफिकेट बनाने के लिए मुझे ओशो का पासपोर्ट चाहिए ताकि मैं पासपोर्ट के मुताबिक उनका नाम लिख सकूं. उन्होंने कहा कि पासपोर्ट एक्सपायर हो चुका है. तब मैंने कहा कोई बात नहीं पुराने से भी काम चल जाएगा. पासपोर्ट को देखकर मैने डिटेल भरी. और फिर मैने आग्रह किया कि डेथ सर्टिफिकेट के लिए ओशो के शरीर पर पहचान के तीन निशान चाहिए. जिसके लिए मुझे उनका शरीर देखना पड़ेगा. फिर मैंने ओशो के शरीर पर तीन निशान पहचाने."
डॉक्टर गोकाणी की तरह ही मां नीलम भी ओशो की मौत के दिन आश्रम में ही मौजूद थी. मां नीलम भारत में ओशो की निजी सचिव थीं और करीब 35 साल तक ओशों के साथ रही हैं. मां नीलम (ओशो की अनुयायी) ने कहा, "मैं आश्रम में थी, पांच बजे बताया गया कि ओशो नहीं रहे." खास बात ये है कि मां नीलम उन 21 लोगों में शामिल रहीं है जो ओशो के इनर सर्किल में शामिल थे. ओशो का इनर सर्किल ही ओशो के आश्रम का मैनेजमेंट संभालता था.
ओशो की मौत के दिन स्वामी तथागत और स्वामी चैतन्य कीर्ति भी आश्रम में ही मौजूद थे. स्वामी कीर्ति आश्रम के एक प्रवक्ता थे उनका कहना है कि शाम साढे पांच बजे उन्हें बताया गया कि वो प्रवक्ता की हैसियत से प्रेस को बता दें कि ओशो नहीं रहे. डॉक्टर गोकुल गोकाणी के हलफनामें से पहले ओशो की अनुयायी और विवादों में रहीं मां आनंद शीला ने अपने मेमॉयर “डोन्ट किल हिम” में ओशो की मौत को लेकर सवाल खड़े किए थे.मां आनंद शीला का कहना है कि, "ओशो की मौत को लेकर जो शक मुझे हमेशा से रहा वो डॉक्टर गोकाणी के हलफनामे के बाद अब यकीन में बदल गया है कि उनकी मौत कुदरती नहीं थी उन्हें मारा गया था. डॉक्टर गोकाणी ने अपने हलफनामे में ओशो की मौत के दिन का जो घटनाक्रम बयान किया है उसके बाद से ओशो की मौत को लेकर रहस्य गहरा गया है."
डॉक्टर गोकाणी ने हलफनामे में लिखा है कि, "मैंने हाथ से लिखा हुआ डेथ सर्टिफिकेट जयेश को दिया, जिसे जयेश मेरे ही लेटर हेड पर टाइप करा कर लाया था. जिसमें गलतिया थीं और मैंने कहा कि इसको दोबारा टाइप करना पडेगा तो उन्होंने कहा कि इसको आप हाथ से सुधार दो. और मैंने देखा कि डेथ सर्टिफिकेट पर छपे मेरे पते का हिस्सा जयेश ने हाथों से फाड़ दिया."
डॉक्टर गोकाणी अदालत को दिए हलफनामें में आगे कहते हैं कि, "उसके बाद जयेश ने पुणे के सासोन सरकारी अस्पताल में जाकर सरकारी कार्यवाही कर के अंतिम संस्कार के लिए कानूनी पेपर बनाकर लाने का मुझे आदेश दिया. मेरे साथ स्वामी ध्यानेश उर्फ धनेश जोशी को भेजा गया था. फिर मैंने पूछा कि क्या मैं अपनी पत्नी और बेटी को लाने घर जा सकता हूं. क्योंकि मैं अपने गुरु की मौत के जश्न में उनको शामिल करवाना चाहता था. तो जयेश ने कहा वो किसी और को उन्हें लाने भेजेंगे. और ओशो की मौत की बातें किसी को ना बताने का आग्रह मुझसे बार-बार किया गया."
अपने हलफनामें में डॉक्टर गोकाणी का कहना है कि, "ओशो की मौत के विवाद को दबाए रखने के लिए मैंने ये बात बाहर नहीं लाई थी. लेकिन पिछले कुछ सालों में अमृतो और जयेश ने ओशो की मौत पर जो बयान दिए उनमें कई संगीन विसंगतियां है. जैसे कि ओशो की मौत का समय, मैं ओशो की मौत की बात किसी को ना बताउं इसलिए कमरे में मुझे कैद रखा गया. मुझे सिर्फ डेथ सर्टिफिकेट देने के लिए ही बुलाया गया. और मुझे मौत की असली वजह भी नहीं बताई गई. 19 जनवरी 1990 के दिन आश्रम में कई डॉक्टर मौजूद थे. फिर भी अमृतो और जयेश ने किसी की मदद लेना या उन्हें अस्पताल ले जाना जरुरी नहीं समझा. और सबसे अचरज की बात तो ये है कि ओशो की मौत के पब्लिक अनाउंसमेंट के 60 मिनट बाद ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया. ये सारी बातें संदेह के घेरे में आती हैं."
डॉक्टर गोकुल गोकाणी का कहना है कि वो अपने गुरु की मौत के रहस्य को अपने सीने में दबाकर मरना नहीं चाहते हैं. उन्होंने कहा, "मैं उम्र दराज हूं, बीमार हूं. जीवन का कोई भरोसा नहीं है तो मेरे जीवन का ये सबसे गहरा सच. अदालत के सामने लाना चाहता हूं."
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