उपचुनाव में सांसद-विधायक बने नेताओं को कब से मिलेगी सैलरी, जानें नियम?
MP MLA Salary: पश्चिम बंगाल उपचुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की है. इसी बीच आइए जानते हैं कि नए बने सांसद और विधायकों को कब वेतन मिलना शुरू होता है.

- विधायकों का वेतन राज्यों के कानून और नियमों के अनुसार भिन्न होता है।
MP MLA Salary: भाजपा ने पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव में बड़ी जीत हासिल की है. नंदीग्राम में पार्टी की उम्मीदवार हासिरानी रथ 1,22,753 वोटों के अंतर से जीत हासिल की है और इसी के साथ मुस्लिम बहुल रेजीनगर सीट पर बीजेपी उम्मीदवार शाखारभ सरकार ने 75,748 वोटों से जीत हासिल की है. ऐसे चुनावी मुकाबले के बाद एक बड़ा सवाल उठता है कि नए बने सांसद और विधायकों को कब वेतन मिलना शुरू होता है? आइए जानते हैं कि क्या उन्हें शपथ लेने तक इंतजार करना पड़ता है.
वेतन कब शुरू होता है?
नए बने प्रतिनिधियों के वेतन की शुरुआत लागू संसदीय या फिर राज्य कानून और उनके पारिश्रमिक में से जुड़े नियमों पर निर्भर करती है. चुनाव जीतने का मतलब यह नहीं होता कि हर भत्ता तुरंत मिलना शुरू हो जाएगा. चुनाव परिणाम, चुनाव की औपचारिक घोषणा, सदस्यता की शुरुआत और अलग-अलग भत्तों से जुड़ी शर्तों के बीच अंतर समझना काफी जरूरी है.
सांसदों के लिए वेतन और भत्ते लागू कानून और नियमों से तय होते हैं. विधायकों का पारिश्रमिक राज्य के कानून से तय होता है. इस वजह से यह मान लेना कि सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों पर एक जैसे नियम लागू होते हैं, सही नहीं है और उस सही तारीख की जांच की जानी चाहिए जिससे वेतन मिलना शुरू होता है.

क्या शपथ लेना मायने रखता है?
नए बने सदस्य के अपनी सीट संभालने और विधायी कार्यवाही में भाग लेने से पहले शपथ या फिर प्रतिज्ञा लेना एक जरूरी संवैधानिक जरूरत है. हालांकि सदस्यता से जुड़े भुगतान कानून के रूप से कब लागू होते हैं और खास भत्तों के लिए पात्रता की शर्त क्या है यह दोनों ही अलग-अलग सवाल हैं.
संसदीय बैठकों में उपस्थिति से जुड़ा दैनिक भत्ता लागू नियमों और उपस्थिति की शर्तों के अधीन होता है. इसे चुनाव परिणाम की तारीख से ही देने योग्य नहीं माना जाना चाहिए. ठीक इसी तरह निर्वाचन क्षेत्र और कार्यालय भत्तों के लिए पात्रता की अपनी शर्तें हो सकती हैं.
जब कार्यकाल छोटा हो तो क्या होता है?
उपचुनाव में चुने गए संसद या फिर विधायक आमतौर पर मौजूदा कार्यकाल की बची हुई अवधि के लिए ही काम करते हैं. उनका पारिश्रमिक उस समय के लिए लागू नियमों से तय होता है. कम वक्त के लिए कार्यकाल से ही जीवन भर पेंशन पाने का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता. पेंशन के लिए योग्यता संसद या फिर राज्य के पेंशन कानून और उनमें बताई गई शर्तों पर निर्भर करती है. कम से कम सेवा की जरूरत, पिछली सेवा और दूसरे कानूनी नियम योग्यता पर असर डाल सकते हैं. इस वजह से यह दावा गलत है कि एमपी या एमएलए के तौर पर एक दिन भी काम करने से जीवन भर पेंशन की गारंटी मिलती है.
एमपी का वेतन और भत्ते
संसद सदस्यों के लिए आमतौर पर बताई जाने वाली रकम के मुताबिक मूल वेतन ₹1,00,000 प्रति महीना है. निर्वाचन क्षेत्र भत्ता ₹70000 बताया गया है और कार्यालय भत्ता ₹60000 है. इसमें स्टाफ और स्टेशनरी या फिर डाक खर्च के लिए आवंटन शामिल है. संसद या फिर समिति की बैठक में शामिल होने पर ₹2000 का दैनिक भत्ता दिया जाता है.
लागू नियमों के मुताबिक एमपी को यात्रा में छूट, सरकारी आवास और चिकित्सा सुविधाओं जैसी अतिरिक्त सुविधाएं भी मिल सकती हैं. इन आंकड़ों और सुविधाओं को हर सदस्य को मिलने वाली रकम के तौर पर बताने से पहले मौजूदा नियमों के साथ जांच लेना चाहिए.

एमएलए कितना कमाते हैं?
एमपी के उलट पूरे भारत में एमएलए को एक जैसा वेतन नहीं दिया जाता. हर राज्य अपने कानून के तहत अपने विधायकों के वेतन और भत्तों को तय करते हैं. भुगतान में मूल वेतन, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, टेलीफोन खर्च, चिकित्सा सुविधा और विधानसभा सत्र से जुड़े भत्ते शामिल हो सकते हैं.
रिपोर्ट्स के मुताबिक तेलंगाना, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में कुल मासिक वेतन लगभग 2 लाख से 2.5 लाख है. दूसरे राज्यों में यह कुल रकम काफी कम बताई जाती है.
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