इंसानी दिमाग में होते हैं 86 अरब न्यूरॉन्स, फिर कंप्यूटर से तेज क्यों नहीं चलता?
Human Brain: इंसान के दिमाग में 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं. लेकिन इसके बावजूद भी यह किसी कंप्यूटर से तेज नहीं काम करता. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.

- दिमाग कम ऊर्जा में असाधारण जानकारी संसाधित करता है, कंप्यूटर को अधिक चाहिए।
Human Brain: इंसानी दिमाग में लगभग 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं जो आधुनिक कंप्यूटर सिस्टम में मौजूद ट्रांजिस्टर की भारी संख्या के बराबर लगते हैं. लेकिन इसके बावजूद भी एक साधारण कंप्यूटर भी इंसानों की तुलना में काफी ज्यादा तेजी से मुश्किल गणितीय गणना कर सकता है. इसी के साथ वह काफी सारा डेटा भी प्रोसेस कर सकता है.
लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर इतने ज्यादा न्यूरॉन्स होने के बावजूद भी हमारा दिमाग कंप्यूटर की तरह काम क्यों नहीं कर सकता. आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
कंप्यूटर की प्रोसेसिंग स्पीड काफी ज्यादा होती है
एक बड़ा अंतर सिग्नल प्रोसेस करने की स्पीड का है. आधुनिक कंप्यूटर प्रोसेसर गीगाहर्ट्ज़ की स्पीड पर काम करते हैं. इससे वे हर सेकंड अरबों साइकिल या फिर ऑपरेशन पूरे कर सकते हैं. कंप्यूटर हार्डवेयर में इलेक्ट्रिकल सिग्नल भी काफी तेजी से चल सकते हैं.
इसके उलट न्यूरॉन्स इलेक्ट्रोकेमिकल सिग्नल के जरिए बातचीत करते हैं. इन सिग्नल के ट्रांसमिशन की स्पीड काफी धीमी होती है. यह आमतौर पर सबसे तेज नर्व फाइबर में लगभग 100 से 120 मीटर प्रति सेकंड तक होती है.
इसका मतलब है कि दिमाग में आधुनिक प्रोसेसर द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली काफी ज्यादा क्लॉक स्पीड जैसा कुछ नहीं होता. हालांकि रॉ स्पीड सिर्फ एक हिस्सा है कि दिमाग जानकारी कैसे प्रोसेस करता है.

दिमाग बड़े पैमाने पर पैरेलल प्रोसेसिंग के जरिए काम करता है
कंप्यूटर तेजी से एक के बाद एक साफ तौर पर तय किए गए ऑपरेशन करने में काफी ज्यादा अच्छे होते हैं. लेकिन दिमाग को बड़े पैमाने पर पैरेलल प्रोसेसिंग के लिए डिजाइन किया गया है.
सोचिए क्या होता है जब कोई व्यक्ति भीड़भाड़ वाली सड़क पार करता है. दिमाग एक ही समय में विजुअल जानकारी प्रोसेस करता है, आवाज सुनता है, संतुलन बनाए रखता है, गाड़ियों की छाल का अंदाजा लगाता है, पुराने अनुभवों को याद करता है और सांस लेने और दिल की धड़कन को कंट्रोल करने में मदद करता है.
इस वजह से लाखों न्यूरल प्रोसेस एक ही समय में हो सकते हैं. दिमाग को हर जानकारी को एक ही सेंट्रल रास्ते से प्रोसेस करने की जरूरत नहीं होती. यह पैरेलल बनावट इंसानों को मुश्किल और लगातार बदलते माहौल में प्रतिक्रिया करने की क्षमता देती है. भले ही अलग-अलग न्यूरल सिग्नल अपेक्षाकृत धीमे हों.

न्यूरॉन्स के काफी सारे कनेक्शन होते हैं
सिर्फ न्यूरॉन्स की संख्या से दिमाग की क्षमताओं का पता नहीं चलता. उनके कनेक्शन भी उतने ही जरूरी हैं. एक अकेला न्यूरॉन सिनेप्स नाम के स्ट्रक्चर के जरिए हजारों दूसरे न्यूरॉन्स के साथ कलेक्शन बना सकता है.
लगभग 86 अरब न्यूरॉन्स के साथ दिमाग में न्यूरल कनेक्शन का एक बड़ा नेटवर्क होता है. इसका अनुमान अक्सर लगभग 100 ट्रिलियन सिनेप्टिक कनेक्शन लगाया जाता है. ये कनेक्शन जानकारी को एक असाधारण स्टेप बाय स्टेप क्रम के बजाय जनरल नेटवर्क के जरिए आगे बढ़ने देते हैं. यह सीखने, याद रखने, भावनाओं को पहचानने और नए विचार बनाने जैसी क्षमताओं में भी मदद करते हैं. कंप्यूटर को इन कामों को करने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है लेकिन दिमाग अनुभव और सीखने के जरिए अपने कनेक्शन विकसित और पुनर्गठित करता है.
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दिमाग काफी ज्यादा ऊर्जा कुशल होता है
एक और बड़ा अंतर ऊर्जा की खपत का है. इंसानी दिमाग लगभग 20 वॉट बिजली का इस्तेमाल करके काम करता है. इसी के साथ यह लगातार शरीर को कंट्रोल करता है और बड़ी मात्रा में सेंसरी जानकारी को प्रोसेस करता है.
इसके उलट हाई परफॉरमेंस कंप्यूटिंग सिस्टम का सुपरकंप्यूटर को काफी ज्यादा बिजली की जरूरत हो सकती है. यह कभी-कभी मेगावाट तक पहुंच जाती है. इस वजह से दिमाग को काफी कम ऊर्जा के साथ असाधारण मात्रा में जानकारी प्रोसेस करता है. इसकी बायोलॉजिकल बनावट पारंपरिक कंप्यूटर में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से काफी अलग है.
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