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जाबांज सैनिकों को गंवाकर भी आखिर श्रीलंका की मदद क्यों कर रहा है भारत?

श्रीलंका हमारा बेहद छोटा-सा पड़ोसी देश है जो इस वक़्त आर्थिक बदहाली के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. वहां लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हैं और सरकारी खजाना खाली हो चुका है. वहां बनी नई सरकार को भी ये समझ नहीं आ रहा है कि वो लोगों को इस बदहाली से आखिर कैसे बाहर निकालें. सबसे नजदीकी और एक ताकतवर पड़ोसी होने के नाते श्रीलंका ने भारत से मदद करने की गुहार लगाई थी जिस पर हमारी सरकार ने सोचने का वक़्त नहीं लगाया, बल्कि संकट की इस घड़ी में उसे हर तरीके की इमदाद पहुंचा कर वहां के लोगों को ये अहसास कराया है कि उनका बड़ा भाई यानी टाइगर अभी जिंदा है. 

हालांकि श्रीलंका को सबसे पहले मदद पहुंचाना, भारत के लिए इसलिये भी ज्यादा अहम था क्योंकि सामरिक दृष्टि से ये द्विपीय राष्ट्र हमारी अंतराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद मायने रखता है. हमारा दुश्मन बन चुका चीन यहां गिद्ध की निगाहें लगा बैठा है कि श्रीलंका के बहाने वो किसी भी तरह से भारत को समुद्री सीमा से घेरने में कामयाब हो जाये. इसलिये मोदी सरकार की इस कूटनीति की तारीफ इसलिये भी की जानी चाहिए कि उसने बगैर वक़्त गंवाये श्रीलंका को ये मौका ही नहीं दिया कि वो चीन से कोई मदद मांगे. इसलिए कि वह तो पहले से ही तैयार बैठा है कि श्रीलंका उससे सिर्फ एक बार बोले और वो हमसे कई गुना ज्यादा मदद से देने के लिए बेताब है.

वैसे तो श्रीलंका पहले भी गृह युद्ध की बेहद बुरी मार झेल चुका है और उस ऑपरेशन में वहां के लोगों को आतंकवाद से बचाने के लिए भारतीय सेना के कई जांबाज़ सैनिक शहीद हो चुके हैं. उस आतंकवाद के दम पर ही भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या भी हो चुकी है. दरअसल, 1980 के दशक में श्रीलंका गृहयुद्ध की चपेट में था. तमिल राष्ट्रवादी समूह LTTE (Liberation Tigers of Tamil Eelam) ने जाफना द्वीप पर कब्जा कर रखा था. श्रीलंका की सेना LTTE का मुकाबला नहीं कर पा रही थी और उस हालात में श्रीलंका की सरकार ने भारत से मदद की गुहार लगाई थी. भारत ने 'ऑपरेशन पवन' के तहत श्रीलंका में गृहयुद्ध खत्म करने के लिए अपनी शांति सेना भेजी थी लेकिन श्रीलंका में रहने वाला तमिल समुदाय इससे बेहद नाराज था. 

बता दें कि श्रीलंका में सिन्हला समुदाय की आबादी ज्यादा है जबकि तमिल भाषी अल्पसंख्यक हैं. श्रीलंका में आखिर ये नौबत क्यों आती है उसके लिए हमें इस देश के इतिहास के कुछ खास पन्नों पर गौर करना होगा. पचास के दशक से ही वहां रहने वाले कई अल्पसंख्यक तमिलों को लग रहा था कि बहुसंख्यक सिन्हला उनकी भाषा और धर्म के प्रभाव को कम करना चाह रहे हैं. इसके चलते दोनों पक्षों के बीच रिश्ते खराब होते चले गए. वहां की सरकार ने साल 1956 में एक विवादास्पद कानून पारित करके सिन्हला को देश की एकमात्र राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया था. इसका नतीजा ये हुआ कि सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले तमिल कर्मचारी भड़क उठे क्योंकि इससे उनकी नौकरियों पर असर पड़ने लगा था.

धीर-धीरे इन्हीं तमाम वजहों से तमिलों ने एक अलग देश की मांग उठानी शुरू कर दी थी. वहां तमिलों के खिलाफ़ अनगिनत हिंसक घटनाएं भी हुईं. 1983 में एलटीटीई के हमले में 23 सैनिक मारे गए जिससे पूरे श्रीलंका में दंगे भड़क उठे. माना जाता है कि इन दंगों में करीब 3,000 तमिल मारे गए थे. इस कारण श्रीलंका की सरकार और एलटीटीई के बीच युद्ध भड़क उठा. श्रीलंका में पृथक तमिल ईलम देश की मांग को लेकर  तत्कालीन भारत सरकार इसलिए चिंतित थी क्योंकि भारत में बड़ी संख्या में तमिल रहते हैं और देश का एक राज्य ही उनके नाम पर बसा हुआ है. लेकिन उस दौर में सरकार के लिए एक बड़ी परेशानी का सबब ये भी था कि तब कई भारतीय तमिल एलटीटीई के पृथक देश की मांग के समर्थक थे. 

ऐसी सूरत में, सरकार नहीं चाहती थी कि जो आग श्रीलंका में लगी है उसकी लपटें तमिलनाडु को भी अपने आगोश में ले लें. लिहाजा, भारत और श्रीलंका के बीच सैन्य मदद का समझौता हुआ औऱ उस समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ घंटों के बाद ही भारतीय सैनिक श्रीलंका के लिए रवाना हो गए थे. ये साल 1987 की बात है. लेकिन हमारी सेना को श्रीलंका में इस समझौते का उल्टा असर देखने को मिला था क्योंकि वहां कई लोग खासकर तमिल समुदाय ही इस समझौते से नाराज़ था. उन्हें लगा कि भारत बड़ा देश होने के कारण अपने छोटे पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है. नतीजा ये हुआ कि भारतीय शांति सेना उत्तरी श्रीलंका में शांति स्थापित करने के जिस मकसद से वहां गई थी वह पूरा होना तो दूर रहा लेकिन वहां एलटीटीई के साथ हुए युद्ध में हमारी सेना के करीब 1,200 जवान मारे गए थे.

याद दिला दें कि 35 साल पहले उसी श्रीलंका की राजधानी कोलंबों में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर जानलेवा हमला हुआ था. वह भी किसी आम आदमी ने नहीं बल्कि श्रीलंका की सेना के एक जवान ने ही किया था. 30 जुलाई 1987 को कोलंबों में विजिथा रोहन विजेमुनी नाम के सैनिक ने गार्ड ऑफ ऑनर के दौरान अपनी बंदूक के पिछले हिस्से से राजीव गांधी को मारने की कोशिश की थी. हालांकि उस हमले में राजीव गांधी बाल-बाल बच गए थे.

बताया जाता है कि विजेमुनी भारत द्वारा श्रीलंका में शांति सेना भेजे जाने से नाराज था. गार्ड का मानना था कि भारत को श्रीलंका के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए था. इस घटना के बाद श्रीलंकाई सेना द्वारा विजेमुनी का कोर्ट मार्शल हुआ. उसे सेना से निकाल दिया गया और 6 साल कैद की सजा सुनाई गई. हालांकि ढाई साल बाद ही तत्कालीन राष्ट्रपति आर. प्रेमदासा ने दया याचिका स्वीकार करते हुए विजेमुनी को रिहा करने का आदेश दे दिया. बताते हैं कि इसके बाद विजेमुनी एक सफल ज्योतिषी बन गया. साल 2013 में एक भारतीय अखबार को दिए इंटरव्यू में उसने महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति चुनाव में हारने की भविष्यवाणी भी की थी, जो सच साबित हुई थी.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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