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दक्षिण भारत बीजेपी की कमज़ोर कड़ी, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी लेकिन पैन इंडिया जनाधार नहीं, आंकड़े देते हैं गवाही

दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए दक्षिण भारत कमज़ोर कड़ी है. इस कमज़ोर कड़ी की वज्ह से ही सियासी पकड़ के लिहाज़ से हम कह सकते हैं कि बीजेपी पैन इंडिया जनाधार वाली पार्टी नहीं है. दक्षिण भारत में स्थित सभी राज्यों के राजनीतिक माहौल और सियासी पकड़ के विश्लेषण से इस बात की पुष्टि की जा सकती है.

पूरे प्रकरण को समझने से पहले इस साल हुई दो घटनाओं को संक्षेप में जान लेते हैं, जिनसे पता चलता है कि दिन-ब-दिन बीजेपी के लिए 'मिशन साउथ' से जुड़ी चुनौती व्यापक होती जा रही है. एक घटना तमिलनाडु से जुड़ी है और दूसरी घटना कर्नाटक से.

एआईएडीएमके ने बीजेपी से तोड़ा नाता

दक्षिण भारत में स्थित तमिलनाडु में बीजेपी का कोई ख़ास जनाधार नहीं है, लेकिन वहां की प्रमुख पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम या'नी एआईएडीएमके से उसका गठबंधन था. एआईएडीएमके की ओर  25 सितंबर को बीजेपी से नाता तोड़ने का औपचारिक तौर से एलान कर दिया गया. एआईएडीएमके के इस फ़ैसले के पीछे की वज्ह बीजेपी की राजनीति का तरीक़ा है. तमिलनाडु में बीजेपी के नेता जिस तरह से लगातार बयान-बाज़ी कर रहे थे, उससे एआईएडीएमके काफ़ी दिनों से नाराज़ चल रही थी.

पार्टी के उप महासचिव केपी मुनुस्वामी का कहना है कि बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई समेत अन्य नेता एआईएडीएमके के आदर्शों पर तो लगातार हमला बोल ही रहे थे, साथ ही जे. जयललिता और राज्य के पहले मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादुराई जैसे नेताओं को लेकर भी टिप्पणी कर रहे थे. इससे एआईएडीएमके के नेता और कार्यकर्ता ख़ुद को अपमानित महसूस कर रहे थे.

एआईएडीएमके को है नुक़्सान का डर

हालांकि एआईएडीएमके ने बीजेपी से नाता तोड़ने के लिए औपचारिक तौर से जो भी वज्ह बताई है, उसके अलावा तमिलनाडु की राजनीति में पार्टी का घटता कद एक प्रमुख कारण है. अगले साल लोकसभा चुनाव होना है. उसके साथ ही अप्रैल 2026 में प्रदेश में विधान सभा चुनाव भी होना है. इस दोनों चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन को ध्यान में रखकर एआईएडीएमके ने बीजेपी से अलग होने का फ़ैसला किया है.

2016 को छोड़ दें, 1989 से तमिलनाडु में सरकार बदलने की परंपरा रही है. पिछली बार 2021 के विधान सभा चुनाव में एआईएडीएमके को हरा कर डीएमके सत्ता में आई थी. जे. जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु में यह पहला विधान सभा चुनाव हुआ था, जिसमें एआईएडीएमके को हार का सामना करना पड़ा था. ऐसे भी जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके में भारी उथल-पुथल देखने को मिला था. पार्टी लगातार कमज़ोर भी होते गई.  2019 के लोक सभा चुनाव में एआईएडीएमके को सिर्फ़ एक सीट थेनी (Theni) पर ही जीत मिल पाई थी. उसे बाद 2021 के विधान सभा चुनाव में प्रदेश की सत्ता भी चली गई.

तमिलनाडु में बीजेपी के साथ से हानि!

अब जब लोक सभा चुनाव दहलीज़ पर है तो पार्टी के ज्यादातर नेताओं और कार्यकर्ताओं का मानना है कि बीजेपी से संबंध जोड़ने का नुक़्सान एआईएडीएमके को तमिलनाडु में उठाना पड़ रहा है. तमिलनाडु की राजनीति कुछ अलग तरह की है. वहां की जनता बारी-बारी से डीएमके और एआईएडीएमके को मौक़ा देते रहती है. बीजेपी की राजनीति में जिस तरह से हिंदुत्व का मुद्दा केंद्र बिंदु में है, एआईएडीएमके के नेताओं को आभास हो रहा था कि बीजेपी से गठजोड़ रखने पर 2024 के लोक सभा और 2026 के विधान सभा चुनावों में इससे हानि हो सकती है. परंपरागत प्रतिद्वंद्वी डीएमके को हमलावर होने का ज़ियादा मौक़ा भी मिल जा रहा था. आगामी चुनावों में नुक़्सान की आशँका के मद्देनज़र ही एआईएडीएमके ने बीजेपी से सारे रिश्ते ख़त्म करने का फ़ैसला किया है.

मई में कर्नाटक की सत्ता भी चली गई थी

दक्षिण भारत में पकड़ के नज़रिया से देखें तो एक महत्वपूर्ण घटना मई में कर्नाटक में देखने को मिली थी. दक्षिण भारत में कर्नाटक ही एकमात्र राज्य रहा है, जहां अपनी बदौलत बीजेपी सरकार बनाने में सफल रही है. लेकिन इस साल मई में हुए चुनाव में बीजेपी को कांग्रेस से करारी हार का सामना करना पड़ा और प्रदेश की सत्ता से बाहर होना पड़ा. इसके साथ ही यह तय हो गया कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी, दो बार से लोक सभा में बड़ी जीत हासिल करने वाली पार्टी का अब दक्षिण भारत के 5 बड़े राज्यों में से किसी में सरकार नहीं है.

बीजेपी के पैन इंडिया जनाधार से जुड़ा मसला

अब बात करते हैं कि कैसे दक्षिण भारत बीजेपी के लिए दुःस्वप्न के समान हो गया है. पुडुचेरी को छोड़ दें, तो दक्षिण भारत में राजनीतिक तौर से 5 बड़े राज्य हैं. तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना. इनमें तमिलनाडु लोक सभा और विधान सभा सीटों के लिहाज़ से सबसे बड़ा राज्य है, वहीं तेलंगाना सबसे छोटा राज्य. पुडुचेरी विधान सभा के साथ एक केंद्र शासित प्रदेश है, इसमें महज़ 30 विधान सभा और एक लोक सभा सीट है. दक्षिण भारत के इन 5 बड़े राज्यों में बीजेपी के राजनीतिक सफ़र और जनाधार पर ग़ौर फ़रमाएं, तो यो समझना आसान हो जाएगा कि बीजेपी भले ही दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करती हो, लेकिन उसका पैन इंडिया जनाधार नहीं है.

तमिलनाडु में बीजेपी की राजनीतिक स्थिति

तमिलनाडु दक्षिण भारत के सबसे बड़े राज्यों में आता है. यहां कुल 234 विधान सभा और 39 लोक सभा सीटें हैं. 2021 में हुए विधान सभा चुनाव में बीजेपी का एआईएडीएमके के साथ गठबंधन था. एआईएडीएमके के सहयोग की वज्ह से 20 सीटों पर चुनाव लड़कर बीजेपी 4 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही थी. बीजेपी को इस चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 2.62% रहा था.

वहीं 2016 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी न तो एआईएडीएमके के साथ थी और न ही डीएमके के साथ. उस चुनाव में बीजेपी 188 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन किसी सीट पर जीत नहीं मिली थी. यहां तक कि उसके 180 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी. बीजेपी का वोट शेयर 2.84% रहा था. उसी तरह से 2011 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी 204 सीटों पर लड़ती है, लेकिन उसका खाता तक नहीं खुलता है. उसके 198 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो जाती है. बीजेपी का वोट शेयर 2.2% रहता है. 2006 के तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में कमोबेश बीजेपी का वहीं हाल था. 225 सीटों पर लड़ने के बावजूद एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी और 221 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी.

2001 के तमिलनाडु विधान सभा चुनाव के व़क्त डीएमके एनडीए का हिस्सा था. इसलिए विधान सभा चुनाव में डीएमके के साथ गठबंधन के तहत बीजेपी 21 सीटों पर चुनाव लड़ी. उसे 3.2% वोट शेयर के साथ 4 सीटों पर जीत मिली. बीजेपी 1996 के चुनाव में 143 सीटों पर उम्मीदवार उतारी थी, जिसमें से सिर्फ़ एक सीट पर उसे जीत मिली थी. बीजेपी का वोट शेयर 1.8% रहा था.1991 में भी 99 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद बीजेपी का खाता नहीं खुलता है. 1989 में 31 सीट पर और 1984 में 15 सीट पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी को निराशा ही हाथ लगी थी. उन दोनों चुनाव में भी उसका खाता नहीं खुला था.

तमिलनाडु की लोक सभा सीटों पर बीजेपी का प्रदर्शन तो और भी ख़राब रहा है. 2019 के लोकसभा चुनाव में एआईएडीएमके के साथ होने के बावजूद बीजेपी को किसी सीट पर जीत नहीं मिली थी. इस चुनाव में बीजेपी ने 5 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे.उस वक़्त यह भी कहा गया था कि बीजेपी को साथ रखने का ख़म्याज़ा एआईएडीएमके को भगतना पड़ा था. एआईएडीएमके को सिर्फ़ एक ही सीट पर जीत मिली थी. उसे 36 सीटों का नुक़्सान उठाना पड़ा था.

2014 के लोक सभा चुनाव में बीजेपी को डीएमडीके, एमडीएमके और पट्टाली मक्कल काची से गठबंधन का लाभ मिला था. वहां बीजेपी 7 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें से उसे एक सीट पर जीत मिल गई थी. बीजेपी का वोट शेयर 5.5% रहा था. 2009 में बीजेपी खाली हाथ रही थी. 2004 के आम चुनाव में भी तमिलनाडु में बीजेपी खाता नहीं खोल पाई थी.

1999 के आम चुनाव में बीजेपी तमिलनाडु में डीएमके के साथ गठबंधन में थी. 6 लोक सभा सीटों पर चुनाव लड़कर बीजेपी को 4 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं 1998 के लोक सभा चुनाव में बीजेपी तमिलनाडु में एआईएडीएमके के साथ थी. वहां 5 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी को क़रीब 7 फ़ीसदी वोट शेयर के साथ 3 सीटों पर जीत मिली थी. तमिलनाडु में 1998 के पहले किसी भी आम चुनाव में  बीजेपी खाता खोलने में कामयाब नहीं रही थी.

तमिलनाडु में विधान सभा और लोक सभा चुनाव में बीजेपी के अब तक के प्रदर्शन पर नज़र डालने से यह स्पष्ट है कि वो ख़ुद की बदौलत कोई भी सीट जीतने में अभी तक सक्षम नहीं हो पाई है. विधान सभा में सबसे ज़ियादा बीजेपी 4 सीट जीतने में कामयाब रही है, वो भी एक बार डीएमके की मदद से और एक बार एआईएडीएमके की मदद से. उसी तरह से यहां बीजेपी सबसे ज़ियादा 1999 के लोक सभा चुनाव में 4 सीटें जीतने में कामयाब रही है, वो भी डीएमके के साथ गठबंधन में. अधिकांश बार बीजेपी का खाता भी नहीं खुल पाता है. अकेले चुनाव लड़ने पर तो कभी नहीं. इन तथ्यों से समझा जा सकता है कि तमाम प्रयासों के बावजूद तमिलनाडु में बीजेपी अपनी सियासी ज़मीन अब तक तैयार नहीं कर पाई है.

कर्नाटक में बीजेपी की राजनीतिक स्थिति

तमिलनाडु के बाद दक्षिण भारत में सीट के लिहाज़ से सबसे बड़ा राज्य कर्नाटक है. यहां विधान सभा में  224 सीट और लोक सभा की 28 सीटें हैं.दक्षिण भारत में यही एक राज्य है, जिसको लेकर बीजेपी दावा कर सकती है कि उसकी सियासी ज़मीन कुछ हद तक मज़बूत है. हालांकि मई में प्रदेश की सत्ता खोने के बाद यह कहा जा सकता है कि कर्नाटक में भी बीजेपी की राह भविष्य में आसान नहीं रहने वाली है. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि कर्नाटक में बीजेपी की सियासी ज़मीन जिस एक शख्सियत की वज्ह से इतनी मज़बूत हुई थी, वो नेता अब सक्रिय राजनीति से अलग हो चुके हैं. हम बात कर रहे हैं 80 साल के बीएस येदियुरप्पा की.

बीएस येदियुरप्पा का ही कमाल था कि 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कर्नाटक में शानदार प्रदर्शन किया था. 110 सीटें जीतकर बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और पहली बार अपने दम पर दक्षिण भारत के किसी राज्य में सरकार बनाने में भी कामयाब हुई थी. लेकिन इसके अगले चुनाव में येदियुरप्पा बीजेपी के साथ नहीं थे, तो पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इसका नुक़्सान उठाना पड़ा. बीजेपी को 72 सीटों और 14 फ़ीसदी वोट का नुकसान हुआ था. बीजेपी सूबे की सत्ता से हाथ धो बैठी.

एक बार फिर से 2018 विधान सभा चुनाव में बीएस येदियुरप्पा बीजेपी में होते हैं और उसी का नतीजा था कि बीजेपी 104 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनती है. हालांकि इस साल कर्नाटक विधान सभा चुनाव में बीएस येदियुरप्पा पार्टी का चेहरा नहीं रहते हैं और हम सबने देखा कि बीजेपी की सत्ता छीन जाती है. 2013 विधानसभा चुनाव छोड़ दें तो पिछले 6 विधानसभा चुनावों में बीजेपी का कर्नाटक में जो भी प्रदर्शन रहा था, उसमें पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. इस आधार पर यह कहना ग़लत नहीं होगा कि कर्नाटक में अब तक बीजेपी की जो राजनीतिक हैसियत बनी, उसमें सबसे बड़ा हाथ बीएस येदियुरप्पा का रहा है.

पिछले तीन दशक से बीएस येदियुरप्पा के कद और जी-तोड़ मेहनत का ही नतीजा था कि लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी कर्नाटक में बेहतर प्रदर्शन कर रही थी. 2019 के आम चुनाव में बीजेपी कर्नाटक में 25 सीटें, वहीं 2014 में 17 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. 2009 के लोकसभा चुनाव में 19 सीटों पर और 2004 में 18 लोक सभा सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी.  बीजेपी को कर्नाटक में  1999 में 7 और 1998 में 13 सीटों पर जीत मिली थी. 1996 के आम चुनाव में बीजेपी कर्नाटक में 6 सीटें ही जीत पाई थी. जबकि 1991 में ये आंकड़ा 4 सीटों का था.

अब बीएस येदियुरप्पा के सक्रिय तौर से पार्टी का चेहरा नहीं रहने के बाद बीजेपी के लिए कर्नाटक की डगर भी सरल-सहज नहीं रहने वाली है. आगामी लोक सभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी क्षेत्रीय पार्टी एचडी कुमारस्वामी की जेडीएस को अपने पाले में लाने में कामयाब हो गई है. लेकिन इसका बीजेपी को कितना लाभ होगा, यह तो 2024 के चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा.

इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि जेडीएस कर्नाटक में लगातार कमज़ोर होते जा रही है. उसके प्रभाव का दायरा भी सिकुड़ते जा रहा है. पहले भी जेडीएस का प्रभाव पूरे कर्नाटक में कभी नहीं रहा है.  जेडीएस का प्रभाव अब ओल्ड मैसूर रीजन के चंद इलाकों तक ही सिमट कर रह गया है. ऐसे में गठजोड़ का ज़ियादा लाभ बीजेपी को नहीं मिलने वाला, बल्कि इससे बीजेपी के जनाधार का समर्थन पाकर जेडीएस को ही अधिक लाभ होगा, इसकी संभावना ज़रूर बन सकती है.

आंध्र प्रदेश में बीजेपी की राजनीतिक स्थिति

तमिलनाडु और कर्नाटक के बाद आंध्र प्रदेश सीटों के लिहाज़ से सबसे बड़ा राज्य है. आंध्र प्रदेश में 175 विधान सभा सीटें हैं, वहीं लोक सभा सीटों की संख्या 25 है. आंध्र प्रदेश दक्षिण भारत के उन राज्यों में शामिल है, जहां पर अब तक चुनावी जीत के लिहाज़ से बीजेपी की उपस्थिति बेहद कम रही है. पूरे देश में केरल में पार्टी की पकड़ सबसे कमजोर है. उसके बाद आंध्र प्रदेश का नंबर आता है. आंध्र प्रदेश की राजनीति में वाईआरएस कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी का कद काफ़ी बड़ा हो चुका है. इतना बड़ा कि पहले से प्रभाव रखने वाली टीडीपी और कांग्रेस प्रदेश में अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में हैं. ऐसे में निकट भविष्य में यहां बीजेपी के राजनीतिक मंसूबों के पूरे होने की संभावना बेहद क्षीण नज़र आ रही है.

आंध्र प्रदेश में बीजेपी का कभी भी कोई ख़ास जनाधार नहीं रहा है. हालांकि 2014 में जब तेलंगाना अलग राज्य नहीं बना था, तब टीडीपी के साथ गठबंधन की वजह से बीजेपी कुछ सीटों पर जीत हासिल कर पाई थी. 2019 विधान सभा चुनाव में बीजेपी को 173 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद किसी सीट पर जीत नहीं मिली थी. उसका वोट शेयर भी एक फीसदी से कम रहा था. उसके सभी प्रत्याशियों की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी. 2019 में लोक सभा के साथ ही आंध्र प्रदेश विधानसभा का चुनाव हुआ था. 2019 के लोक सभा चुनाव में बीजेपी ने देशव्यापी स्तर पर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था, लेकिन आंध्र प्रदेश में सभी 25 सीट पर चुनाव लड़ने के बावजूद उसका खाता भी नहीं खुला था. लोक सभा चुनाव में भी बीजेपी का वोट शेयर एक फीसदी से कम रहा था.

2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बीजेपी चंद्रबाबू नायडू की पार्टी के साथ थी. बीजेपी को आंध्र प्रदेश में इसका फायदा भी मिला था और वो अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रही थी. तेलंगाना के अलग होने से पहले हुए इस विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने टीडीपी के सहयोगी के तौर पर 58 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारी. टीडीपी के साथ का ही असर था कि बीजेपी 9 सीटों पर जीत गई और उसका वोट शयर 4.13% रहा. इसी तर्ज पर 2014 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी को टीडीपी के सहयोग से आंध्र प्रदेश में 3 सीटों पर जीत मिली.

2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का आंध्र प्रदेश में खाता भी नहीं खुला था.  हालांकि 1999 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यहां 7 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. लेकिन इस प्रदर्शन के पीछे भी टीडीपी के साथ गठबंधन ही कारण रहा था. 1998 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 18%  वोट के साथ 4 सीट पर जीत मिली थी. इस चुनाव में बीजेपी को टीडीपी के एनटीआर गुट के साथ का लाभ मिला था. 1996 में बीजेपी कोई सीट नहीं जीत पाई थी.  वहीं 1991 में एक लोकसभा सीट पर जीत पाई थी. 1989 में किसी सीट पर कमल नहीं खिला था. 1984 के लोकसभा चुनाव में  बीजेपी ने पहली बार केंद्र की राजनीति में कदम रखा था. उसे इस चुनाव में सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली थी, उनमें से एक सीट आंध्र प्रदेश का हनुमकोंडा था, जो अब तेलंगाना राज्य में पड़ता है.

जहां तक विधानसभा में ताकत की बात है तो आंध्र प्रदेश में बीजेपी कभी प्रभावकारी भूमिका में नहीं रही है. विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो बीजेपी को 2009 और 2004 में दो-दो सीटों पर जीत मिली थी. वहीं 1999 में टीडीपी के साथ से 12 सीटों पर जीत मिली थी. 1994 में 3 सीटों पर और 1989 में 5 सीटों पर जीत मिली थी. जबकि 1985 में 8 सीटों पर जीत मिली थी. पार्टी गठन के बाद पहली बार आंध्र प्रदेश विधान सभा का चुनाव बीजेपी 1983 में लड़ी. इस चुनाव में 81 सीटों पर प्रत्याशी उतारी, जिनमें से बीजेपी को 3 सीटों पर जीत मिली.

केरल में बीजेपी की राजनीतिक स्थिति

दक्षिण भारत में केरल ऐसा राज्य है, जहां बीजेपी की पकड़ को सबसे कमज़ोर कहा जा सकता है. चुनावी जीत को ही मानक मान लें, तो यह भी कह सकते हैं कि केरल में बीजेपी का कोई अस्तित्व अब तक बना ही नहीं है. केरल में 1989 से बीजेपी लोक सभा चुनाव में हाथ-पांव मार रही है, लेकिन उसे अब तक केरल में किसी लोक सभा सीट पर जीत नसीब नहीं हुई है. वहीं विधान सभा चुनाव में सिर्फ 2016 में बीजेपी किसी तरह से एक सीट जीतने में कामयाब हो पाई थी.

बीजेपी के पास केरल में ऐसे नेताओं की भारी कमी है, जिनके नाम पर वहां की लोग चुनाव में समर्थन दें. इस कमी को पाटने के लिए बीजेपी प्रयास में जुटी है. कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ए के एंटनी के बेटे अनिल एंटनी इस साल अप्रैल में बीजेपी में शामिल हुए थे. यह उसी रणनीति का हिस्सा है. केरल की राजनीति में शुरू से कांग्रेस और सीपीएम का आधिपत्य रहा है, जो अभी तक क़ायम है. केरल में जिस तरह की राजनीति है, केरल के लोग जिस तरह से राजनीति को लेकर विचार रखते हैं, उसे देखते हुए निकट भविष्य में कांग्रेस-सीपीएम के आधिपत्य को थोड़ी सी भी चुनौती देना बीजेपी के लिए संभव नहीं दिख रहा है.

तेलंगाना में बीजेपी की राजनीतिक स्थिति

पुडुचेरी को छोड़ दें, तो दक्षिण भारत में तेलंगाना में सबसे कम सीटें हैं. तेलंगाना में 119 विधान सभा सीट हैं, वहीं लोक सभा सीटों की संख्या 17 है. आंध्र प्रदेश से अलग होकर राज्य बनने के बाद से ही तेलंगाना की राजनीति पर बीआरएस प्रमुख के. चंद्रशेखर राव का एकछत्र क़ब्ज़ा ब-दस्तूर जारी है.

तेलंगाना में 2018 के विधान सभा चुनाव में  बीजेपी 7 फ़ीसदी वोट के साथ सिर्फ़ एक ही विधान सभा सीट जीत पाई थी. लेकिन उसके कुछ महीने बाद ही अप्रैल-मई 2019 में हुए लोक सभा चुनाव में बीजेपी 4 सीटों पर जीतने में कामयाब रही. बीजेपी का वोट शेयर भी 19.45% तक पहुंच गया. ऐसा कर उस वक़्त बीजेपी ने केसीआर को भविष्य में चुनौती देने की हुँकार ज़रूर भर दी थी. लेकिन अब पिछले डेढ़-दो साल में केसीआर ने फिर से प्रदेश की जनता की नब्ज़ को पकड़ते हुए अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है. केसीआर ने तेलंगाना की अस्मिता को आधार बनाकर बीजेपी को बाहरी घोषित करने से जुड़ी रणनीति पर काम करना शुरू किया. केसीआर की लोकप्रियता तेलंगाना में अभी भी इतनी ज़ियादा है कि किसी भी पार्टी के लिए, चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस, वहां अपनी राजनीतिक पकड़ को बढ़ाना दुरूह कार्य है.

बीजेपी विधान सभा चुनाव के दहलीज़ पर होने के नाज़ुक मौक़े पर तेलंगाना में अंदरूनी कलह से जूझती दिख रही है. चुनाव से कुछ महीने पहले इस साल जुलाई में पार्टी..बंदी संजय कुमार को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा देती है. उनकी जगह केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी को प्रदेश में पार्टी की कमान सौंपी जाती है. जबकि माना यह जा रहा था कि बंदी संजय कुमार की पिछले 3-4 साल में कड़ी मेहनत की वज्ह से ही तेलंगाना में बीजेपी थोड़ा बहुत जनाधार तैयार करने में कामयाब रही थी. ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल जनवरी में दिल्ली में हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बंदी संजय कुमार के सांगठनिक कौशल की तारीफ़ कर चुके थे.

दक्षिण भारत में बीजेपी का नहीं हो रहा असर

दक्षिण भारत के इन राज्यों के राजनीतिक हालात और चुनावी विश्लेषण से कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी 2014 से केंद्र में सत्ता में है. उस वक्त से पार्टी का देशव्यापी जनाधार भी काफी बढ़ा है. दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का भी तमग़ा बीजेपी के साथ इस दौरान जुड़ा है. लेकिन बीजेपी को इस बात की कसक जरूर होगी कि वो देश के दक्षिण राज्यों में अपनी पकड़ नहीं बढ़ा पाई है.

बीजेपी 2014 से केंद्र की राजनीति में छाई हुई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और अपने विशाल संगठन की वज्ह से बीजेपी लोक सभा चुनावों के साथ ही उत्तर भारत के भी कई राज्यों में जीत का परचम लहराते आई है. लेकिन जैसे ही दक्षिण भारतीय राज्यों की बात आती है, बीजेपी का ये असर गुम सा होता दिखता है. बीजेपी चाहती है कि धीरे-धीरे दक्षिण भारत के हर राज्य में सियासी ज़मीन मज़बूत करे, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उसकी राह कठिन ही होती जा रही है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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