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ईरान में चुनाव: भारत के साथ रिश्तों पर कितना पड़ेगा असर ?

नई दिल्ली: ईरान मे शुक्रवार यानी 18 जून को राष्ट्रपति पद का चुनाव है जिस पर भारत समेत दुनिया के कई ताकतवर मुल्कों की निगाह लगी है.  अमरीकी प्रतिबंधों व गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा ईरान शिया इस्लामिक देश है और भारत में भी ईरान के बाद सबसे ज़्यादा शिया मुसलमानों की आबादी है.अगर भारत का विभाजन न हुआ होता यानी पाकिस्तान नहीं बनता तो ईरान से भारत की सीमा लगती.

बताया जा रहा है कि इस चुनाव में कट्टरपंथी विचारधारा रखने वाले उम्मीदवार इब्राहिम रईसी की जीत होना लगभग तय है क्योंकि तमाम सुधारवादी विचारधारा वाले लोगों को चुनावी रेस से बाहर कर दिया गया है.

ईरान से रहे हैं भारत के गहरे संबंध
ईरान का मतलब होता है लैंड ऑफ आर्यन. भारत का भी एक प्राचीन नाम आर्यावर्त है. ईरान इस्लामिक देश बनने से पहले पारसी था. लेकिन अब वहां पारसी गिने-चुने ही बचे हैं. इस्लाम के उभार के साथ ही ईरान से पारसियों को बेदख़ल कर दिया गया. तब ज़्यादातर पारसी या तो भारत के गुजरात राज्य में आ बसे या फिर पश्चिमी देशों में चले गए. ईरान में जब पारसी थे, तब भी भारत के साथ उसके सांस्कृतिक संबंध थे और जब इस्लामिक देश बना,तब भी गहरे संबंध रहे.

हर चार साल के अंतराल में होने वाले इस चुनाव में इस बार करीब 600 लोगों ने पर्चा भरा था लेकिन अब सिर्फ पांच उम्मीदवार ही मैदान में हैं.इनमें कट्टरपंथी नेता और ईरान के मुख्य न्यायधीश इब्राहिम रईसी को सबसे आगे बताया जा रहा है. इन सबकी उम्मीदवारी को देश की ताक़तवर गार्ज़ीयन काउंसिल ने मंज़ूरी दी है.

भारत के साथ ईरान के रिश्ते अच्छे बने रहें,उसी लिहाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल सितंबर में चार दिनों के भीतर ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर को ईरान दौरे पर भेजा था. तब दोनों मंत्रियों के तेहरान दौरे को पाकिस्तान, ईरान, रूस, चीन और तुर्की के बीच बनते गठजोड़ के आईने में देखा गया था.  भारत की चीन, तुर्की और पाकिस्तान से कभी दोस्ती नहीं रही लेकिन रूस तो भारत का दोस्त रहा है और ईरान से भी अच्छे संबंध रहे हैं.

ईरान ने किया था 370 हटाने का विरोध
ऐसे में भारत की यह चिंता लाजिमी है कि ईरान और रूस से वह अपने संबंधों को ख़राब न होने दे. लद्दाख में सरहद पर भारत और चीन की सेना आमने-सामने है. पूरे विवाद में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का हटाया जाना भी एक कारण रहा है. चीन, पाकिस्तान, तुर्की और यहां तक कि ईरान ने भी भारत के इस क़दम का खुलकर विरोध किया था. हालांकि रूस ने भारत का विरोध नहीं किया था. लेकिन चिंता इस बात की है कि अगर रूस के साथ चीन पाकिस्तान को लाने में कामयाब होता है तो यह भारत के लिए बड़ा झटका होगा.

देखने वाली बात ये भी है कि एक तरफ़ जिस तरह से  ईरान और चीन की क़रीबी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ़ भारत ईरान में जिस चाबहार प्रोजेक्ट को अंजाम तक पहुंचाना चाहता था ,वो लटकता दिख रहा है. मध्य-पूर्व के देशों में ईरान और तुर्की ही कश्मीर के मसले पर खुलकर सामने आए थे. चीन से तनाव के बीच भारत के लिए यह बहुत ही अहम है कि वो किन देशों के साथ आए. मध्य-पूर्व में भारत के लिए चीन से मुक़ाबला करना धीरे-धीरे और मुश्किल होता जा रहा है.

ऐसे होता है ईरान में राष्ट्रपति चुनाव
दरअसल,ईरान के इस्लामी गणराज्य की नियति का सर्वेसर्वा वहां का धर्मगुरु होता है, जिसे रहबर, पथप्रदर्शक या सर्वोच्च नेता की उपाधि से संबोधित किया जाता है. राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया का दायरा बहुत सीमित है. ईरान में जो लोग राष्ट्रपति चुनाव में उतरना चाहते हैं, उन्हें पहले आवेदन करना होता है. फिर ईरान में गार्जियन काउंसिल नाम की एक संस्था ये तय करती है कि कौन से उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे. गार्जियन काउंसिल की असल बागडोर भी सर्वोच्च नेता के हाथों में होती है. ईरान में राष्ट्रपति चुनाव जीतनेवाले उम्मीदवार की नियुक्ति पर सर्वोच्च नेता के भी दस्तख़त होते हैं. राष्ट्रपति गार्जियन काउंसिल की अध्यक्षता तो करता है, लेकिन उसे नियंत्रित नहीं करता है. ईरान की तमाम नीतियां बनाने में गार्जियन काउंसिल का दख़ल होता है.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति-कूटनीति के जानकार और मध्य पूर्व के मामलों पर विशेष पकड़ रखनेवाले क़मर आग़ा कहते हैं, "ईरान की सियासत ने एक मोड़ लिया है. यहां का लोकतंत्र भारत-ब्रिटेन जैसा तो है नहीं. वोटिंग भी कम होती है. अभी तक हर चार-आठ साल में कट्टरपंथियों और उदारवादियों के बीच कुर्सी की अदला-बदली होती दिखती थी, लेकिन इस बार एक कट्टरपंथी उम्मीदवार का जीतना तय लग रहा है."

बता दें कि रईसी मौलवियों के उस छोटे से समूह का हिस्सा हैं, जिसने 1988 में तत्कालीन सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी के आदेश पर ईरान-इराक़ युद्ध के बाद बंदी बनाए गए हज़ारों राजनीतिक क़ैदियों को मारने के आदेश पर दस्तख़त कर दिए थे. तब वो तेहरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशन कोर्ट में एक प्रॉसिक्यूटर के ओहदे पर थे. इसके बाद अमेरिका ने रईसी पर प्रतिबंध लगा दिए थे. बताते हैं कि रईसी के कट्टरपन के बारे में ईरान में प्रचलित है कि उनकी कलम सिर्फ़ फांसी लिखना जानती है.

हालांकि इस बार चुनाव के बहिष्कार की आवाज़ें भी ख़ूब उठ रही हैं. कमज़ोर अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और देश पर लगी कई पाबंदियों की वजह से कई वोटर्स का चुनाव से मोहभंग हुआ है. पिछले चुनावों में भी कम वोटिंग का फ़ायदा कट्टरपंथियों और रूढ़िवादियों को मिला था.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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