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भाजपा ने चुनावी रणनीति के तहत चार राज्यों में प्रदेश नेतृत्व में किया है बदलाव, जानिए क्या हैं इसके सियासी मायने

भारतीय जनता पार्टी ने जिन चार प्रदेशों में अपने अध्यक्षों को बदला है, उन चारों की जो सांगठनिक चुनौतियां हैं वो बिल्कुल सामने दिख रही हैं. बिहार में नीतीश कुमार के हटने के बाद ये देखा गया था कि भारतीय जनता पार्टी की नीतीश के साथ रहने में जो नाराजगी थी वो साफ तौर पर उपचुनाव में दिखाई दिया था. उप-चुनाव के परिणाम उसके पक्ष में आए लेकिन ये साफ दिख रहा था कि प्रदेश स्तर पर कोई एक ऐसा चेहरा उस तरह से आक्रामक नहीं है जोकि एक साथ तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार को दोनों के व्यक्तित्व को चुनौती दे सके. हालांकि विधानसभा में जो विपक्ष के नेता हैं विजय कुमार सिन्हा उन्होंने मोर्चा संभाला था और उनका प्रदर्शन भी बेहतर था.

लेकिन भाजपा में दो बातें थी एक तो कि एक पद और एक व्यक्ति का सिद्धांत है और दूसरा ये है कि पिछड़े वर्ग से कोई ऐसा चेहरा नहीं था जिसका की वोट आधार हो और उसका कोई एक बड़ा नेता भी हो. सम्राट चौधरी जिस वर्ग से आते हैं उसी वर्ग से नीतीश कुमार की पार्टी में विद्रोह भी हुआ और टूट भी हो गई और उपाध्यक्ष रहते हुए सम्राट चौधरी ने अपना ठीक-ठाक प्रदर्शन किया था. हालांकि जिसे कोर बीजेपी बोलते हैं, जो परंपरागत नेतृत्व है वो कितना उनके साथ तालमेल बिठा पाएगा चूंकि ये भाजपा की जो मूल चरित्र है उससे नहीं आते हैं. पहले ये आरजेडी में थे, फिर जनता दल यू में रहे और फिर भाजपा में आए.

बिहार भाजपा में ये पहला प्रयोग हुआ है कि किसी दूसरे विचारधारा और संगठन से आए हुए व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया गया है. इस वक्त चूंकि सामने 2024 का चुनाव है और गठबंधन जदयू से टूटी है और नए गठबंधन होने हैं और बीजेपी की जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में चुनाव के लिए जो आक्रामक राजनीति है उसे बनाए रखने के लिए ये परिवर्तन है. चूंकि वे ऐसे कास्ट से आते हैं जिसमें उनका वोट बैंक भी है और प्रभावी भी हैं, जोकि नीतीश कुमार के साथ लंबे समय तक रहा है. ये बहुत आवश्यक भी है क्योंकि बिहार में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद क्षेत्रीय संकीर्णता के कारण पूरी तरह से सफल नहीं हुई है और भाजपा के हक में भी ये जाता है कि वहां पर राष्ट्रवाद की भावना किसी न किसी रूप में प्रबल रहे तो नेतृत्व अब इन्हें कहां तक लेकर जाता है ये तो देखना होगा लेकिन तात्कालिक रूप से ये परिवर्तन नीतीश कुमार और तेजस्वी के व्यक्तित्व को सीधे तौर पर चुनौती देने की दृष्टि से हुआ है और ये बताता है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की दृष्टि में उसकी जो कोर लीडरशिप है उसमें से कोई चेहरा शायद अभी नहीं दिखा है.

सीपी जोशी ब्राह्मण जाति से आते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने जो एससी और एसटी कानून में थोड़ा सा व्यावहारिक सुधार किया था चूंकि उसका दुरुपयोग हो रहा था. भाजपा ने बाकी विपक्षी दलों के दबाव में आकर उस निर्णय को पलट कर पुराने कानून को रहने दिया था जिसके खिलाफ कई राज्यों में विद्रोह हुआ जिसमें कि राजस्थान भी है. उंची जाति और पीछड़ी जाति दोनों ने ही इसके खिलाफ विद्रोह किया था. जिस कारण से भाजपा में छोटे स्तर पर टूट भी हुई थी. राजस्थान में भाजपा के हारने का एक बड़ा कारण था कि जगह-जगह उसके अपने ही लोग उसे हराने में लगे हुए थे...तो इसमें जो एक बड़ा वोट बैंक था ब्राह्मणों का वो हमारे साथ रहे. इसका एक उद्देश्य ये है और साथ ही साथ सीपी जोशी के दोनों पक्षों से यानी वसुंधरा राजे से भी बहुत अच्छे रिश्ते रहे हैं और कभी तनाव नहीं आया और एक तो कटारिया जी जोकि राज्यपाल बनकर चले गए हैं..तो वो दोनों पक्षों से रहे हैं. कभी भी इनका किसी से टकराव की स्थिति नहीं रही है और वे एक संतुलित व्यक्तित्व हैं और भाजपा के विचारधारा से आते हैं.

हालांकि, बहुत लंबा समय लगा चूंकि ये परिवर्तन मेरे हिसाब से चार महीने पहले ही हो जाना चाहिए था. चूंकि कर्नाटक के बाद तो राजस्थान में ही चुनाव होने हैं. समय कम है लेकिन यह बताता है कि राजस्थान में तमाम कोशिशों के बावजूद केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश के आंतरिक कलह को उसको टालने और वसुंधरा राजे को संतुलित करने में सफल नहीं रहा है. इसलिए अध्यक्ष बदलने की नौबत आई है. देखिये, कोई भी अध्यक्ष एक तो सामान्य कार्यकाल पर बदले जाते हैं क्योंकि भाजपा में ये कानून है कि कोई भी व्यक्ति लगातार दो बार अध्यक्ष रह सकता है. लेकिन जब तीन साल का कार्यकाल पूरा हुए बिना ही बदलाव करते हैं तो इसका अर्थ यही है कि आंतरिक राजनीति सामान्य नहीं है. जनता का आकर्षण भाजपा की ओर है. कांग्रेस के आंतरिक विवाद के कारण भी ये झुकाव भाजपा की ओर हो रहा है. जिस तरह के मुद्दे देश में उभरे हैं चाहे वो पीएफआई का मामला हो या राम जन्म भूमि का मामला हो या फिर हिंदुत्व और राष्ट्रीयता की बात हो लेकिन अगर नेतृत्व के स्तर पर एक जुटता नहीं होगी और जो मुख्यमंत्री का चेहरा है जनता के बीच संगठन एक होकर कार्य नहीं करेगा तो फिर कठिनाई होगी.

अब उसी तरह से अगर आप ओडिशा में देखें तो पहले भी सामल साहब अध्यक्ष रहे हैं और उनका कार्यकाल ठीक-ठाक रहा है. ओडिशा में भाजपा की कोशिश है कि चूंकि अब कांग्रेस का वहां पर बहुत बड़ा वोट बैंक नहीं है लेकिन जो कुछ भी बचा-खुचा है वो अपनी ओर आए और जो वहां पर आदिवासियों का जो बड़ा चंक है वो भाजपा की ओर आ जाए. उसमें उनकी भाषा में समझाने वाला व्यक्ति चाहिए और ओडिशा में कई कारणों से जो आरएसएस से जुड़े संगठन हैं जैसे वीएचपी, बजरंग दल हैं का कुछ कारणों से वहां के लीडरशिप से कुछ विवाद भी हो गया था और उस रूप में कुछ राज्यों में भाजपा के लिए कुछ चीजें अनुकूल होते हुए भी वहां पर उसे पर्याप्त वोट नहीं मिल पा रही है. उसमें एक ओडिशा भी है और ये एक बड़ा प्रश्न है. चूंकि वहां भाजपा के विरोध का वातावरण नहीं है. वहां की जो बिजू जनता दल है उसका भी कोई भाजपा के साथ सेक्यूलरिज्म और राष्ट्रवाद को लेकर विरोध नहीं है, वहां पर इतनी भारी संख्या में मुसलमान नहीं है लेकिन उस रूप में वहां चुनावी सफलता नहीं मिल पा रही है.

अब ये भी लगता है कि नवीन पटनायक की एक उम्र हो गई है और कोई दूसरा नेता बिजू जनता दल में उस रूप में खड़ा नहीं हुआ है...वहां एक ऐसा व्यक्ति चाहिए जो वहां की जमीनी राजनीति से जुड़ा हुआ हो और हमारी विचारधारा का हो, वहां की भाषा ठीक से बोलता हो और उसकी पहुंच ब्यूरोक्रेसी और नेताओं में भी हो तो इसी को देखते हुए सामल जी को ये जिम्मेदारी भाजपा ने दी है और आरएसएस उनको बहुत पसंद भी करती है. आप जानते ही हैं कि ओडिशा के विधानसभा चुनाव और लोकसभा के चुनाव में बहुत ज्यादा अंतर नहीं रहता है. लेकिन अभी जो बदलाव किये जा रहे हैं वो चुनाव के दृष्टिकोण से ही हो रहे हैं.

सच ये है कि भाजपा दिल्ली में केजरीवाल को चुनौती देने वाला या कहें कि उन्हें ठीक से चुनौती देने वाला कोई चेहरा ढूंढ नहीं पाई है. ये भाजपा की बहुत बड़ी विफलता है. केजरीवाल की जो प्रशासनिक विफलता है और यहां तक की आप सड़कों की जो हालत देखेंगे आउटर एरिया में उस पर 8 सालों में पेंट तक नही चढ़ा है, डिवाइडर जो हैं दोनों ओर वो जगह-जगह टूटे हुए हैं तो बहुत सारी विफलताए हैं. और सचदेवा जी से पहले जो दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष थे वो भी अच्छा ही काम कर रहे थे. लेकिन जिस तरह की राजनीति केजरीवाल की है उसका ठीक ढंग से सामना करने के लिए आप देखिये ने पहले विजय गोयल, फिर सतीश उपाध्याय, फिर मोनोज तिवारी और उसके बाद आदेश गुप्ता और अब विजेंद्र सचदेवा तो ये स्पष्ट है कि पिछले 9 वर्षों में अपने 4 अध्यक्षों को बदल दिया तो ये बता रहा है कि वहां पार्टी ठीक से सामना नहीं कर पर रही है और किसी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का मतलब यही था कि आप उतने दिनों में किसी चेहरे की तलाश कर लेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ...भाजपा के पास अभी भी केजरीवाल की जो राजनीतिक शैली है, उनका जो हाव-भाव है उसका सामना करने वाला व्यक्तित्व नहीं मिल पाया है. जिसे कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था उसे अब अध्यक्ष बना दिया है. उम्मीद करनी चाहिए कि दिल्ली कि जो राजनीति है वो एक पक्षीय नहीं रहेगी.

ये पंजाबी समुदाय से आते हैं और माना जाता है कि मदन लाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा और ओम प्रकाश कोहली के रहते भारतीय जनता पार्टी यहां सशक्त रही है या फिर जो दिल्ली के परंपरागत लोग हैं, उनका वोट बैंक लेने की कोशिश होगी. ये भी देखना होगा लेकिन केजरीवाल को चुनौती देने के लिए भाजपा के नेतृत्व को काफी गंभीर विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है. मेरा अपना मानना है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह जब तक स्वयं जैसे रिफ्रेशर कोर्स होता है न उसी तरह किसी को ट्रेनिंग देकर तैयार नहीं करेंगे तब तक दिल्ली में भाजपा की कठिनाई बड़ी रहेगी. 

[ये आर्टिकल वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार के निजी विचार पर आधारित है.]

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