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Herbal Farming: इस मानसून में लौंग के बाग लगायें, 150 साल तक मोटी आमदनी पायें, यहां जानें पूरी प्रोसेस

Clove Cultivation: इसकी खेती के लिये मानसून का समय सबसे उपयुक्त रहता है, क्योंकि इस समय मौसम में आर्द्रता रहती है, जिससे बीजों में अंकुरण और पौधों का तेजी से विकास होता है.

Clove Cultivation for Herbs & Spices: भारत में कई सदियों से मसालों की खेती (Spices Cultivation)  का चलन चला आ रहा है. यहां उगने वाले मसालों का जायका पूरी दुनिया की जुबान पर चढ़ चुकी है. यही कारण है कि आज भारत मसालों का बड़ा निर्यातक बन चुका है. दूसरे देशों में भारतीय मसालों की काफी डिमांड रहती है. यही कारण है कि मसालों के किसान हर संभव तिकड़म लगाकर बेहतर क्वालिटी के मसालों को उपजाते हैं. इनमें से कई मसाले ऐसे भी हैं, जिनकी सिर्फ एक बार बुवाई-रोपाई करने के बाद दशकों तक किसानों को लाभान्वित करते हैं.

इन्हीं में शामिल है लौंग (Clove), जिसे मसाले और औषधी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. भारत के कोंकण में लौंग की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. इसका इस्तेमालव आयुर्वेद दवा (Clove in Ayurveda)  बनाने के साथ कीटनाशक (Clove Persticide) और दर्दनाशक (Clove Pain Killer) दवायें बनाने में किया जाता है.


Herbal Farming: इस मानसून में लौंग के बाग लगायें, 150 साल तक मोटी आमदनी पायें, यहां जानें पूरी प्रोसेस
 
लौंग की खासियत (Specialities of Clove) 
लौंग मसाला और जड़ी-बूटी (Clove Uses) के तौर पर काम करती है. इसकी तासीर गर्म होती है, जिसके चलते सर्दी, जुकाम और बुखार जैसी समस्याओं का ये आसानी से इलाज कर देती है. आयुर्वेदिक दवाओं के साथ-साथ काढ़ा बनाने में भी लौंग का इस्तेमाल किया जाता है. खासकर पूजा-हवन में भी लौंग का प्रयोग करने पर इसके धुंये से वातावरण साफ हो जाता है. बाजार में लौंग के तेल से लेकर टूथ पेस्ट, दांत के दर्द की दवा, पेट और मुंह के रोग की दवा के साथ-साथ सौंदर्य प्रसाधनों में लौंग का बहुतायत से इस्तेमाल किया जा रहा है. लौंग का पौधा सहाबहार फसलों में शामिल है जो 150 साल तक जीवित रहकर बातावरण को साफ और सुगंधित रखता है. किसानों को भी इसकी खेती करने पर कई सालों तक मोटी पैदावार मिलती रहती है.

ऐसे करें लौंग की खेती (Clove Cultivation Process) 
उष्ण कटिबंधीय और गर्म इलाकों में ही लौंग की खेती करना फायदेमंद रहता है. दरअसल लौंग की खेती के लिये बारिश के साथ-साथ गर्मी और धूप की जरूरत होती है. ज्यादा सर्दी, ज्यादा गर्मी, तेज बारिश, जल भराव और पाला पड़ने से इसकी फसल पर बुरा असर पड़ता है. सिर्फ मध्यम तापमान में ही इसके पौधे तेजी से विकास करते हैं. कृषि विशेषज्ञों की मानें तो जैविक विधि से लौंग की खेती करने के अलग ही फायदे होते हैं.

  • इसकी फसल में कीड़े और बीमारियों का खतरा नहीं होता, सिर्फ मौसम संबंधी जोखिमों से ही लौंग की फसल को खतरा होता है.
  • किसान चाहें तो जलनिकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी से लौंग की अच्छी पैदावार ले सकते हैं.
  • छायादार इलाकों में इसकी खेती करने पर पौधों का विकास तेजी से होता है.

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लौंग की नर्सरी
बता दें कि लौंग की खेती के लिये इसके फलों से निकले बीजों का इस्तेमाल किया जाता है. कई किसान इसके बीजों से सीधी बिजाई और कुछ नर्सरी में पौधे तैयार करके ही इसकी खेती करना पसंद करते हैं. 

  • दरअसल तैयार पौधों से खेती करना ज्यादा आसान होता है, क्योंकि खेत में रोपाई के बाद पौधे मौसम के अनुकूल विकसित हो जाते हैं.
  • वहीं बीजों से पौधे तैयार करने के लिये लौंग के बीजों को एक दिन के लिये पानी में छोड़ देना चाहिये, इससे अंकुरण में आसानी होती है.

लौंग की बुवाई
लौंग की खेती से अच्छी पैदावार लेने के लिये बुवाई से पहले जमीन को जैविक विधि से तैयार करना चाहिये, जिससे फसल को मिट्टी में पोषण कायम रहे.

  • बुवाई - रोपाई से पहले गड्ढों में भी प्राकृतिक खाद, थोड़ी रासायनिक खाद और नीम की खलियां डाली जाती हैं.
  • इस तरह बीजों या पौधों की रोपाई के बाद गहरी सिंचाई करके जड़ों तक पोषण पहुंचाया जाता है.
  • इसकी खेती के लिये मानसून का समय सबसे उपयुक्त रहता है, क्योंकि इस समय मौसम में आर्द्रता रहती है, जिससे बीजों में अंकुरण और पौधों का तेजी से विकास होता है.
  • लौंग की खेती के लिये भरपूर सिंचाई की जरूरत होती है, लेकिन जल भराव की समस्या से भी फसल को बचाना जरूरी है.
  • बारिश के मौसम में फसल को अधित पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन गर्मी में 15 से 20 दिन के अंतराल पर पानी देकर जमीन में नमी बनी रहनी चाहिये.

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लौंग की खेती से पैदावार और कमाई (Production & Income from Clove Cultivation) 

लौंग के पुराने बागों से तो जल्दी-जल्दी उत्पादन मिल जाता है, लेकिन नये बाग लगाने पर लौंग के पौधों से 4 से 5 साल बाद पहली उपज मिल जाती है. 

  • लौंग के छोटे पौधों से अधिक पैदावार नहीं मिल पाती, लेकिन पौधा परिपक्व होने पर 2 से 3 किलग्राम की बंपर उत्पादन देता है, जिससे फलों को सुखाकर बाजार में बेचा जाता है.  
  • करीब एक एकड़ खेत में लौंग के 100 पौधे लगाकर हर सीजन में मोटी उपज (Clove Production) मिल जाती है, जिसे बाजार में 800 से 1000 रुपये किलो के भाव पर बेचा जाता है.
  • लौंग की व्यावसायिक (Commercial Farming of Clove) या कांट्रेक्ट फार्मिंग (Contract Farming of Clove) करने पर किसानों को ज्याद मुनाफा होता है.


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Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और जानकारियों पर आधारित है. ABPLive.com किसी भी तरह की जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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