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Explained: बाला साहेब ठाकरे ने ऐसे रखी थी शिवसेना की नींव, जानें कैसे छिन गया 37 साल पुराना तीर-कमान का निशान

Shiv Sena: शिवसेना की स्थापना के 18 साल बाद पार्टी को 'तीर-कमान' वाला चुनाव चिन्ह मिला था. इससे पहले पार्टी कई चिन्हों पर चुनाव लड़ चुकी थी. आइये जानते हैं शिवसेना की स्थापना से लेकर अब तक की कहानी.

Bal Thackeray Foundation of Shiv Sena: शिवसेना के संस्थापक और दिवंगत नेता बाला साहेब ठाकरे (Bal Thackeray) ने राजनीति में उतरने से पहले बतौर कार्टूनिस्ट (Cartoonist) काम किया था. वह एक अंग्रेजी अखबार 'फ्री प्रेस जर्नल' (Free Press Journal) के लिए कार्टून (Cartoon) बनाया करते थे. कहा जाता है कि बाला साहेब के कार्टून देश के समसामयिक मुद्दों और तत्कालीन राजनीति पर तीखा व्यंग्य (Sarcasm) करते थे.

प्री प्रेस जर्नल के संपादक से उनकी नहीं बनी और उन्होंने नौकरी छोड़ दी. ठाकरे के साथ नौकरी छोड़ने वालों में नेता जॉर्ज फर्नांडिस (George Fernandes) और चार-पांच लोग और शामिल थे. इसके बाद टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) के संडे एडिशन में बाला साहेब के बनाए कार्टून छपने लगे. 

मार्मिक पत्रिका का शुरुआत

बाला साहेब ने 13 अगस्त 1960 में अपनी साप्ताहिक पत्रिका 'मार्मिक' शुरू की, जिसमें वह गैर-मराठियों के बारे में खुलकर लिखने लगे. उनके भाई श्रीकांत ठाकरे भी इसी पत्रिका के लिए काम करते थे. ऐसा कहा जाता है कि 60 के दशक में मुंबई के कारोबार में गैर-मराठियों का दबदबा था. इनमें गुजराती लोग सबसे ज्यादा थे. इसके अलावा छोटे व्यवसायों में दक्षिण भारतीय लोग और मुस्लिम सबसे ज्यादा थे.

बताया जाता है कि उस दौर में महाराष्ट्र में मराठियों की जनसंख्या करीब 43 फीसदी थी लेकिन फिल्म इंडस्ट्री से लेकर, कारोबार और नौकरियों में उनकी तादाद सबसे कम थी. गुजरातियों की आबादी 14 फीसदी होने के बावजूद कारोबार में वे सबसे ज्यादा थे. छोटे व्यवसायों में नौ फीसदी आबादी वाले दक्षिण भारतीय छाए हुए थे. बाला साहेब का कहना था कि दक्षिण भारतीय मराठियों की नौकरी पा रहे हैं. वह मराठियों को काम पर रखे जाने की मुहिम चलाने लगे. दक्षिण भारतीयों के खिलाफ बाल ठाकरे के विरोध का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने ‘पुंगी बजाओ और लुंगी हटाओ' नारे के साथ मुहिम छेड़ दी थी.

शिवसेना की स्थापना और तीर-कमान का निशान

आखिर 19 जून 1966 को बाल ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की. दो वर्ष बाद यानी 1968 में उन्होंने शिवसेना को एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर पंजीकृत करवाया. 1971 के लोकसभा चुनाव में पहली बार शिवसेना ने अपने अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन हार का सामना करना पड़ा. 1971 से लेकर 1984 तक शिवसेना के हिस्से खजूर का पेड़, ढाल-तलवार और रेल का इंजन जैसे चुनाव चिन्ह रहे. 1984 में शिवसेना एक बार बीजेपी के चिन्ह कमल के फूल पर भी चुनाव लड़ी थी. 1985 में मुंबई के नगर निकाय चुनाव में शिवसेना को पहली बार तीर-कमान का चुनाव चिन्ह मिला था. 

शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' की शुरुआत

धीरे-धीरे पार्टी ने मराठी मानुष की अस्मिता के साथ-साथ अपनी छवि कट्टर हिंदूवादी की बनानी शुरू कर दी. इसके लिए शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' ने अहम भूमिका निभानी शुरू कर दी. दरअसल, बाला साहेब ने शिवसेना के मुखपत्र सामना के मराठी संस्करण की स्थापना 23 जनवरी 1988 को की थी. इसके बाद 23 फरवरी 1993 को हिंदी में 'दोपहर का सामना' के नाम से मुखपत्र शुरू किया गया. 

बीजेपी के साथ पहली बार गठबंधन

1989 के लोकसभा चुनाव से पहली बार शिवसेना भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी और उसके चार उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंचे. वहीं, 1990 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने बीजेपी के साथ गठबंधन में 183 सीटों पर चुनाव लड़कर 52 पर जीत दर्ज की थी. बीजेपी इस चुनाव में 104 सीटों पर लड़ी थी और 42 पर जीत हासिल की थी.

इसके बाद शिवसेना ने कई चुनाव बीजेपी के साथ लड़े और सूबे की राजनीति में गहरी पैठ बनाई. 2014 में शिवसेना बीजेपी से अलग हो गई और 288 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ी. इस चुनाव में बीजेपी को 122 और शिवसेना को 63 सीटें मिली थीं. बाद में शिवसेना ने बीजेपी के साथ फिर गठबंधन कर लिया और सरकार में शामिल हो गई.

शिवसेना का पहला मुख्यमंत्री

2019 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव शिवसेना ने बीजेपी के साथ लड़ा था. बीजेपी ने 288 में से 105 सीटें जीतीं और शिवसेना ने 56 पर जीत दर्ज की लेकिन सीएम पद को लेकर दोनों पार्टियों के बीच विवाद पनपा और गठबंधन टूट गया. शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने महाविकास अघाड़ी गठबंधन बनाकर सरकार बना ली और उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र में शिवसेना के पहले मुख्यमंत्री बन गए. 

शिवसेना में बगावत

पिछले दिनों महाराष्ट्र में धार्मिक स्थलों पर लाउड स्पीकर और हनुमान चालीसा को लेकर सियासत गरमाई. इसे लेकर हिंदूवादी शिवसेना पर हिंदुओं की उपेक्षा करने के आरोप लगने लगे. इन्हीं आरोपों के साथ 20 जून को शिवसेना के 15 और 10 निर्दलीय विधायकों ने तत्कालीन उद्धव ठाकरे सरकार के खिलाफ बगावत कर दी. बागी विधायकों की संख्या बढ़ती गई. बागी विधायक पहले सूरत गए और फिर गुवाहाटी में जमा हो गए. उनका नेतृत्व एकनाथ शिंदे कर रहे थे. एकनाथ शिंदे ने 23 जून को दावा किया कि शिवसेना के 55 में से 35 विधायक उनके साथ हैं. इसके बाद उन्होंने कहा कि 39 विधायकों का समर्थन उन्हें मिल गया है. 

शिंदे मुख्यमंत्री और फडणवीस बने डिप्टी सीएम

इस दौरान बीजेपी नेता और पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल से निवेदन किया कि सरकार को सदन में बहुमत साबित करने के लिए कहा जाए. 28 जून को राज्यपाल ने उद्धव ठाकरे से बहुमत परीक्षण के लिए कहा. सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत परीक्षण पर रोक लगाने से मना कर दिया. आखिर 29 जून को उद्धव ठाकरे ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया. 30 जून को एकनाथ शिंदे ने बीजेपी के साथ मिलकर राज्य में अपनी सरकार बना ली. शिंदे सीएम बने और देवेंद्र फडणवीस ने डिप्टी सीएम की शपथ ली. 

शिंदे गुट का शिवसेना पर दावा

सरकार बनाने के बाद शिंदे गुट ने शिवसेना के नाम और निशान पर अपना दावा ठोक दिया. शिंदे गुट ने कहा कि असली शिवसेना वही है. शिंदे गुट ने चुनाव आयोग से मांग की कि उसे पार्टी का नाम और निशान दिया जाए. इसके बाद शिंदे गुट की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए उद्धव ठाकरे सुप्रीम कोर्ट चले गए. 27 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने उद्धव ठाकरे की अर्जी खारिज कर दी. इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिवसेना के नाम और निशान का फैसला निर्वाचन आयोग करेगा.

चूंकि 3 नवंबर को मुंबई की अंधेरी ईस्ट विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना है, वहीं वर्तमान में शिंदे गुट को शिवसेना के 40 विधायकों का समर्थन प्राप्त है और 18 सांसदों में से 12 एमपी भी उसके साथ हैं. ऐसे में शिंदे गुट ने चुनाव आयोग से पार्टी के नाम और निशान पर जल्द फैसला करने की गुहार लगाई.

छिन गया 37 साल पुराना तीर-कमान का निशान

शनिवार (8 अक्टूबर) को चुनाव आयोग ने मामले में अंतरिम फैसला दिया. चुनाव आयोग ने कहा कि अंधेरी ईस्ट के उपचुनाव में ठाकरे या शिंदे गुट में से कोई भी शिवसेना के लिए अधिकृत तीर-कमान वाले चुनाव चिन्ह का उपयोग नहीं करेगा. 

चुनाव आयोग ने कहा कि उपचुनावों के लिए अधिसूचित मुक्त चिन्ह की सूची से दोनों गुट अपने-अपने लिए सिंबल चुनकर 10 अक्टूबर तक बता दें. सूत्रों के मुताबिक, चुनाव आयोग की फ्री सिंबल वाली लिस्ट में जो चिन्ह मौजूद हैं, उनसे ठाकरे गुट की विचारधारा मेल नहीं खाती है. सूत्रों के मुताबिक, ठाकरे गुट चुनाव आयोग से मशाल, उगता सूरज या त्रिशूल वाला चुनाव चिन्ह मांग सकता है. 

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