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Ok Computer Review: अजीब रोबोट की कहानी में दम नहीं, राधिका आप्टे की वेबसीरीज करती है निराश

भविष्य में देश कैसा होगा. अगर सब कंप्यूटरों-रोबोटों के हाथ में चला गया तो क्या होगा. डिज्नी हॉटस्टार की यह वेबसीरीज कॉमिक अपराध कथा के सहारे यह बताने की कोशिश करती है. मगर लेखकों की कच्ची कल्पनाशीलता और लचर निर्देशन के कारण कहीं नहीं पहुंचती. इसे अंत तक देखना धैर्य और सहनशक्ति की मांग करता है.

अगर ओके कंप्यूटर देख कर आप भविष्य के बारे में अनुमान लगाएंगे तो निश्चित जानिए कि डिप्रेशन में चले जाएंगे. वहां इंसानों में दिमाग नहीं मिलेगा और क्रिएटिविटी ऐसा खाली डिब्बा होगी, जिसके छेद देख कर छलनी शरमा जाएगी. लेकिन यह फ्यूचर की बात है. फिलहाल तो ओके कंप्यूटर लिखने-बनाने वाले भूल गए कि वे 2031 की कहानी को 2021 के दर्शकों के लिए बना रहे हैं. सौभाग्य से यह समय विचारों की सुनामी का है और इसमें सिनेमा की रचनात्मकता शानदार दौर में है. ऐसे में डिज्नी हॉटस्टार पर आई छह कड़ियों की यह वेबसीरीज डार्क कॉमेडी के नाम पर मजाक है. डार्क की बात दूर, इसमें कॉमेडी तक नहीं मिलती. इसे देख कर लगता है कि 1970 के दशक की फ्यूचरिस्टिक कहानी वाली कोई हॉलीवुड फिल्म चल रही है. जिससे बेहतर सिनेमा आज के डिप्लोमा स्टूडेंट बनाते हैं.

करीब पौन-पौन घंटे की छह कड़ियों वाली ओके कंप्यूटर देखते हुए आपको खुद से नकली बुद्धिजीवी होने का ढोंग करते रहना पड़ेगा वर्ना आत्मा की आवाज सुन कर तो इसे बीच में ही बंद कर देंगे. वेबसीरीज में न ढंग की कहानी है, न संवाद और न कलाकारों का अभिनय. हालांकि कलाकार कम दोषी हैं. असली जिम्मेदारी लेखकों-निर्देशकों की है. 2013 में एक खास दर्शक वर्ग द्वारा खूब सराही गई फिल्म ‘शिप ऑफ थीसियस’ से आनंद गांधी ने नाम कमाया था. फिर तुंबाड (2018) जैसी सफल फिल्म से जुड़े मगर उसी साल ‘हेलीकॉप्टर एला’ जैसी बोर फिल्म भी उन्होंने दी. ओके कंप्यूटर में वह क्रिएटर प्रोड्यूसर है. इसकी कहानी उन्होंने निर्देशक जोड़ी पूजा शेट्टी-नील पागेडार के साथ मिलकर लिखी है. आनंद गांधी के रिकॉर्ड से साफ है कि उनके पास आम दर्शकों के लायक कुछ नहीं है. अध्यात्म-केंद्रित अति-बौद्धिकता उनकी रचना प्रक्रिया के केंद्र में है.

Ok Computer Review: अजीब रोबोट की कहानी में दम नहीं, राधिका आप्टे की वेबसीरीज करती है निराश

जब 2021 में सड़क-पानी-बिजली-अस्पताल-शिक्षा से जुड़ी मूलभूत समस्याएं हल नहीं हो पा रही हैं तो क्या 2031 में देश का इतना विकास हो जाएगा कि सब कंप्यूटर संभाल लेंगे. स्वचालित कारें दौड़ेंगी, रोबोटों का समानांतर संसार होगा, मानवाधिकार जैसे रोबोटाधिकार कार्यकर्ता होंगे, नेताओं-सेलेब्रिटियों की रोबोट जगह ले लेंगे और इतने लोकप्रिय होंगे कि उनकी लगभग पूजा होगी. ओके कंप्यूटर एक खराब फंसाती है. जिसकी न जमीनी जड़ें हैं और न आसमानी कल्पना शक्ति. वह सरल शब्दों और सहज दृश्यों में यह नहीं समझा पाती कि कंप्यूटरीकरण ने इंसान को इंसान से दूर कर उसकी संवेदना का कचूमर निकाल दिया है. हमें अब प्रकृति के करीब जाकर अपनी आत्मा में झांकने का समय आ गया है. ताकि भविष्य उज्ज्वल हो और आने वाली पीढ़ी ऊंच-नीच, भेद-भाव, जाति-धर्म से मुक्त एक रचनात्मक कुटुंब की तरह मिल-जुल कर रह सके.

Ok Computer Review: अजीब रोबोट की कहानी में दम नहीं, राधिका आप्टे की वेबसीरीज करती है निराश

ओके कंप्यूटर की कहानी 2031 में एक स्वचालित/रोबोटिक कार द्वारा एक्सीटेंड में एक व्यक्ति को कुचल देने के हादसे से शुरू होती है. मरने वाले का चेहरा बुरी तरह कुचल गया है और पेड़ से टकराई कार घायल है. पुलिस अधिकारी साजन कुंडु (विजय वर्मा) मौका-ए-वारदात पर पहुंचता है. वहां रोबोटाधिकार कार्यकर्ता लक्ष्मी (राधिका आप्टे) भी आती है. साजन हादसे का दोषी कार को बताता है मगर लक्ष्मी कहती है कि किसी ने कार को हैक कर लिया था, इसलिए कार बेकसूर है. सवाल उठता है कि आखिर कौन है कार हैक करके एक इंसान की हत्या कराने वाला और फिर मरने वाला भी कौन है. क्यों हुई हत्या. कहानी इन सवालों से शुरू होकर अजीब (टीन के डिब्बों, पाइपों और तारों से बना रोबोट) तक पहुंचती है. 2026 में भारत के महान वैज्ञानिकों ने यह महत्वाकांक्षी रोबोट बनाया था. उन्हें भरोसा था कि अजीब देशवासियों की सारी समस्याएं खत्म कर देगा. मगर अजीब स्टैंडअप कॉमेडियन बन गया. अजीब को आदमी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और दोषी भी पाया जाता है. लेकिन क्या यह सच है? कहानी और आगे बढ़ती है. मानव अस्तित्व, संसार और ब्रह्मांडों के सवाल-जवाब तक जाती है. जिन सवालों का जवाब पिछले हजारों बरस में मनुष्य नहीं पा सका, वे यहां भी अनसुलझे हैं.

Ok Computer Review: अजीब रोबोट की कहानी में दम नहीं, राधिका आप्टे की वेबसीरीज करती है निराश

भविष्य बताने के नाम पर जैसे कुछ लोग ठगी का धंधा करते हैं, वैसे ही ओके कंप्यूटर है. जिसमें बेसिर-पैर की बातें हैं. इसके संवादों पर भी ठीक से काम नहीं किया गया. किरदारों को हास्यास्पद तरीके से बुना गया. भरोसेमंद नाम या ब्रांड बाजार में उपभोक्ताओं को कैसे धोखा देते हैं, ओके कंप्यूटर उसका उदाहरण है. आप सोच में पड़ जाते हैं कि विजय वर्मा, राधिका आप्टे, जैकी श्रॉफ और रसिका दुग्गल जैसे ऐक्टरों के पास क्या काम की कमी है या उन्होंने आनंद गांधी और डिज्नी-हॉटस्टार के नाम पर वेबसीरीज कर ली. इन बातों के बाद भी अगर आप अपने इंटेलिजेंस को परखना चाहते हैं तो ओके कंप्यूटर आपके लिए है.

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