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UP Assembly Election: जेल में बंद माफिया डॉन क्या इस बार भी जीत लेगा चुनाव?

हिंदी फिल्मों में हम सबने कई बार ये  देखा होगा कि एक माफिया जेल में रहते हुए भी बाहर के इलाकों को अपने गुर्गों की मार्फत कंट्रोल करते हुए कैसे ज़ुर्म को अंजाम देता है. लेकिन ये कोई फ़िल्म का सीन नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति का वो सच है जिसे कोई झुठला नहीं सकता. प्रदेश का सबसे बड़ा माफिया डॉन तो अब तक मुख्तार अंसारी को ही माना जाता रहा है जो पिछले 18 साल से जेल में कैद है लेकिन फिर भी वो हर बार विधानसभा का चुनाव लड़ता है और जीत भी जाता है.

अब इसे हमारे देश के लोकतंत्र की खूबी नहीं तो और क्या कहा जायेगा कि एक बाहुबली को जेल में रहते हुए भी इलाके के लोग उसे चुनाव जीताकर विधायक बना देते हैं. देश के राजनीतिक इतिहास में ये एकमात्र ऐसी अनूठी मिसाल है कि एक माफिया डॉन लगातार तीन बार से जेल की दीवारों के पीछे रहते हुए ही विधानसभा का चुनाव जीता हो. वहीं मुख्तार अंसारी इस बार यानी छठी बार फिर से यूपी की उसी मऊ विधानसभा सीट से चुनाव-मैदान में हैं जहां उसका अब तक जलजला रहा है.

उत्तर प्रदेश में जुर्म की दुनिया से सियासत में उतरा मुख्तार अंसारी हत्या, अपहरण, फिरौती जैसे 40 से ज्यादा नामजद अपराधों का कुख्यात अभियुक्त बन चुका है. उसका नाता ऐसे खानदान से है जिसके पुरखों ने आज़ादी से पहले और उसके बाद इस देश की सेवा करते हुए अपना नाम कमाया है. लेकिन कहते हैं कि जुर्म की दुनिया को फतह करने की ख्वाहिश रखने वाला इंसान न तो अपने खानदान की इज़्ज़त की परवाह करता है और न ही कानून से डरता है क्योंकि उसके दिमाग़ में एक ही कीड़ा रहता है कि यहां पैसे से हर एक चीज खरीदी जा सकती है. फिर भले ही वो खाकी वर्दी हो या कानून का कटघरा. मुख्तार अंसारी को हम इसकी जीती-जागती मिसाल मान सकते हैं.

अगली तीन जून को अपनी उम्र के 59 बरस पूरा करने वाला मुख्तार यूपी में जुर्म का पर्याय बन चुका है. लेकिन उसके खानदान का इतिहास खंगालने पर हैरानी होती है कि आखिर उसने ये रास्ता क्यों चुना? क्योंकि न तो उसके सामने ऐसी कोई मजबूरी थी और न ही मुफलिसी? दरअसल, बाहुबली से नेता बनने का सफर तय करने वाले मुख्तार अंसारी के दादा डॉ मुख्तार अहमद अंसारी स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान यानी 1926-27 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष थे. तब उनकी गिनती महात्मा गांधी के बेहद करीबी लोगों में इसलिये की जाती थी कि वे उनके सबसे विश्वासपात्र थे. शायद यही वजह रही होगी कि उनके इंतकाल के बाद उनकी याद को जिंदा रखने के लिये दिल्ली के दरियागंज इलाके की एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया जो आज भी अंसारी रोड के नाम से मशहूर है.

मुख्तार के नाना ने इस देश के लिए जो किया उसे सुनकर सबको ताज्जुब ही होगा कि मुख्तार की रगों में दौड़ने वाले खून में देशभक्ति की बजाय जुर्म ने इतनी मजबूत जगह आखिर कैसे बना ली. ब्रिगेडियर उस्मान, मुख्तार अंसारी के नाना थे. बंटवारे के तत्काल बाद सन 47 में उन्होंने न सिर्फ भारतीय सेना की तरफ से नवशेरा की लड़ाई लड़ी बल्कि हिंदुस्तान को जीत भी दिलाई. हालांकि वो खुद इस जंग में शहीद हो गए थे. उन्हे महावीर चक्र से नवाजा गया था और वे पहले व इकलौते ऐसे मुस्लिम सैन्य अफसर थे जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना बलिदान देकर इस सम्मान को हासिल किया.

मुख़्तार के पिता सुब्हानउल्लाह अंसारी अब इस दुनिया में नहीं हैं और अगर जिंदा होते भी तो अपने बेटे के जुर्म की करतूतों को देखकर सिवा ज़लालत भरे आंसू बहाने के अलावा और क्या करते. उन्होंने खानदान की विरासत को न सिर्फ आगे बढ़ाया बल्कि कम्यूनिस्ट नेता होने के बावजूद शहर में साफ सुथरी छवि रखने वाले ऐसे नेता बन गए कि 1971 में हुए नगर पालिका चुनाव में उन्हें निर्विरोध चुना गया था. इससे पता चलता है कि जुर्म का खिलाड़ी बनने वाले मुख्तार अंसारी के बाप-दादा-नाना ने देश की सेवा करने या फिर राजनीति में आने के लिए कोई गलत जरिया नहीं अपनाया. हालांकि देश के उप राष्ट्रपति रह चुके हामिद अंसारी भी रिश्ते में मुख्तार के चाचा लगते हैं. लेकिन हमारा मकसद उनकी या किसी और की भी शान में गुस्ताखी करना नहीं है, बल्कि ये बताना है कि जिसे विरासत में ही सियासत मिल गई हो उसने फिर अपराध की दुनिया को ही अपना सियासी अखाड़ा क्यों बना लिया?

जेल में रहते हुए यूपी की मऊ सीट से चुनावी अखाड़े में उतरे मुख्तार अंसारी की निजी जिंदगी का एक और रोचक पहलू भी है. उनके बेटे का नाम है अब्बास अंसारी है जिसका राजनीति से कोई वास्ता नहीं है. वो अपनी अलग दुनिया में मस्त है. अब्बास शॉट गन शूटिंग के इंटरनेशनल खिलाड़ी हैं और वे अपनी काबिलियत के दम पर दुनिया के टॉप टेन शूटरों में अपना नाम शुमार करवा चुके हैं. वह नेशनल चैंपियन रहने के अलावा दुनियाभर में कई पदक जीतकर देश का नाम रौशन कर चुके हैं. लिहाज़ा,चर्चा हो रही रही है कि इस विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी वो क्या इसी बार  संभालेंगे या अगली बार. हालांकि पिछले कुछ मौकों पर जब उनसे सवाल पूछा गया था, तो उनका यही जवाब था कि "भाड़ में जाये ऐसी राजनीति और न ही इसमें आने का मुझे कोई शौक है."

वैसे पूर्वांचल की सबसे हॉट सीट मऊ सदर बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के नाम से हमेशा चर्चा में बनी रहती है. दो दशकों से भी ज्यादा समय से इस सीट पर कब्जा जमाए मुख्तार को उसके गढ़ में तमाम राजनीतिक दलों को चुनौती दे पाना काफी मुश्किल रहा है. जेल से जीतते आ रहे बाहुबली को हरा पाना हर पार्टी के लिए कड़ी चुनौती बनता आया है. कहते हैं कि मऊ की सदर सीट गवाह है उस मिथक के टूटने का जिसमें यह कहा जाता था कि यहां से कोई भी विधायक दोबारा नहीं चुना जाता और इस मिथक को तोड़ा पूर्वांचल में गाजीपुर के रहने वाले बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी ने. साल 1996 में मऊ सदर सीट से पहली बार विधायक चुने गए मुख्तार अंसारी ने लगातार दो दशकों से अधिक समय तक इस सदर सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा है. बताते हैं कि इस सदर सीट पर मुख्तार के तिलिस्म का जादू इस कदर है कि सभी पार्टियां अभी तक उसे तोड़ने में नाकाम रही हैं. दावा तो ये भी किया जा रहा है कि इस सीट पर मुख्तार का प्रभाव कुछ ऐसा है कि अगर वह निर्दलीय भी लड़ जाएं तब भी उनकी जीत सुनिश्चित मानी जाती है.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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