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रिटायर होकर भी आखिर 'हीरो' क्यों बन गये जस्टिस एन.वी. रमना?

हमारे देश की सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एन. वी.रमना 16 महीनों तक इस पद पर रहने के बाद शुक्रवार को रिटायर तो हो गए लेकिन हम सबके लिए बहुत कुछ ऐसा कर भी गए जो वे अपने दायरे में रहकर कर सकते थे. और, जो कुछ भी करने की उनकी दिली ख्वाहिश बाकी थी लेकिन किसी भी कारण से नहीं कर पाये तो उन्होंने उसके लिए खुले मंच से देश के लोगों से माफ़ी मांगकर ईमानदारी और न्यायपालिका के प्रति अपनी निष्ठा की ऐसी मिसाल पेश की है जो हमें शायद पहली बार ही देखने को मिली है.

लेकिन मेरी इस बात से कई कानूनविद भी सहमत हैं कि देश की न्यायपालिका का इतिहास जब भी लिखा जायेगा वह चीफ जस्टिस रमना के विदाई भाषण के बगैर अधूरा ही माना जायेगा क्योंकि उन्होंने अपनी कुर्सी से नीचे उतरते हुए सरकार से कोई दूसरी कुर्सी पाने की लालसा रखना तो दूर बल्कि जाते-जाते भी उसे आईना दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. जो बातें उन्होंने कही हैं उसे सुनकर लगता है कि मौजूदा दौर में ऐसा फ़ौलादी इंसान भी है जो हर डर की परवाह किये बगैर अपने ज़मीर पर अड़ा रहता है.

अपने विदाई भाषण के दौरान जस्टिस रमना ने अमेरिका के गांधी कहे जाने वाले मार्टिन लूथर किंग को याद करते हुए कहा कि "जजों का जीवन कई चुनौतियों से भरा होता है. लोगों ने काफी कुछ कहा, लेकिन हमारा परिवार चुप रहा, क्योंकि सत्य की विजय होती है. न्यायपालिका किसी एक आदेश से संचालित नहीं होती है, सदियां उसे सिंचित करती है."

उनके इस बयान से साफ है कि सवा साल से ज्यादा वक्त तक इस सर्वोच्च पद पर रहते हुए उन्होंने कार्यपालिका के किसी अनुचित आदेश को ठुकराने में कोई गरज़ नहीं की और ऐसा करने का जज़्बा शायद किसी विरले जज में ही होता है. बता दें कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान बहुत से ऐसे फैसले सुनाये, जो सरकार को जरा भी रास आने वाले नहीं थे और कुछ तो वाकई रास आये भी नहीं. लेकिन वे सरकार की पसंदगी व नापसंदी की परवाह किये बगैर अपनी कुर्सी के पीछे लगी न्याय की देवी कहलाने वाली उस मूर्ति के आदर्श के हिसाब से ही फैसले करते रहे जो है तो सफेद लेकिन उसकी आंखों पर काली पट्टी बंधी है. वह इसलिये नहीं है कि कानून अंधा होता है बल्कि इसलिये है कि उसके लिए सब अनजान है और इंसाफ़ सिर्फ सबूतों के आधार पर ही होगा.

चीफ जस्टिस रमना ने इन 16 महीनों के दौरान हुए अपने अनुभव से निकले दर्द का इज़हार करने में भी कोई गुरेज़ नहीं किया. उन्होंने कहा कि "मैंने हमेशा अस्वीकृति को ईश्वर के निर्देश के रूप में स्वीकार किया और अपनी ईमानदारी को बरकरार रखा. कभी-कभी जीवन आपको डराता है लेकिन आपको याद रहता है कि आप एक उत्तरजीवी नहीं बल्कि एक उपलब्धि हासिल करने वाले हैं. जज के रूप में पदोन्नत होना मेरे जीवन का सम्मान रहा है. एक बार जब मैं जज बन गया तो मैंने अपना दिल और दिमाग इसे दे दिया. मैं न्यायपालिका के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. हमें जांच और मेरे परिवार के समान रहे लोगों के खिलाफ साजिश का सामना करना पड़ा और मैंने चुप्पी साध ली. अंतत: सत्य की ही जीत होगी."

न्यायपालिका के इतिहास में शायद ये पहला ऐसा मौका होगा जब किसी चीफ जस्टिस ने अपने सेवाकाल के आखिरी दिन अपने दिल की पीड़ा को कुछ इस तरह से बयान किया होगा. जजों से जरुरत से ज्यादा अपेक्षा रखने वाले लोगों को भी उन्होंने अपने अंदाज में जवाब देते हुए कहा कि जब आप एक व्यक्तिगत जज की बात करते हैं तो एक खिलाड़ी से हर गेंद को 6 रन के लिए हिट करने की उम्मीद की जाती है. हालांकि केवल खिलाड़ी ही जानता है कि पिच और फील्डिंग के खिलाड़ियों की शैली को देखते हुए हर गेंद से कैसे निपटना है और कभी-कभी कोई स्कोर नहीं भी हो सकता है. हर सप्ताह के अंत में मुझे लोगों से मिलने और बात करने का विस्तृत अनुभव हुआ.

आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के पोन्नावरम गांव में एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले औऱ बारिश-कीचड़ से भरे रास्तों से अपने स्कूल पहुंचने वाले जस्टिस रमना वकालत के पेशे में आने से पहले पत्रकार भी रहे हैं. वे राजनीति में भी जाना चाहते थे लेकिन उनकी खुद्दारी को देखते हुए नियति ने उन्हें इंसाफ़ देने-दिलाने का ऐसा रास्ता दिखाया कि वे न्यायपालिका के सर्वोच्च पद तक पहुंच गए. शायद इसीलिये उन्होंने आम लोगों को ये अहसास दिलाने में एक बड़ी कामयाबी हासिल करी कि इस देश में इंसाफ़ उनके लिए अभी जिंदा है लेकिन फिर भी वो हर तक नहीं पहुंचा है.

इसीलिए जस्टिस रमना ने अपने भाषण में खासतौर पर इसका जिक्र किया कि अब तक ये लोकप्रिय धारणा बनी हुई थी कि न्यायपालिका आम जनता से काफी दूर है. लेकिन अभी भी लाखों दबे हुए लोग हैं जिन्हें न्यायिक मदद की जरूरत है और जरूरत के समय कोर्ट से संपर्क करने के लिए वे अक्सर आशंकित रहते हैं. 

लोकतंत्र के चार स्तंभ हैं लेकिन उन्होंने पहले दो स्तंभों का जिक्र किये बगैर बाकी के दो स्तंभों की भूमिका और उनके महत्व को रेखांकित करते हुए जो कुछ भी कहा है उसे सुप्रीम कोर्ट के अगले चीफ जस्टिस बनने वाले जजों के लिए एक नजीर ही समझा जाना चाहिए. चीफ जस्टिस रमना ने कहा कि न्यायपालिका मीडिया में अपनी बातें नहीं रखती है. मीडिया न्यायपालिका की बातें आम जनता तक पहुंचाता है. चूंकि लोग संविधान के बारे में समुचित ज्ञान से वंचित हो जाते हैं. लोगों की गलत धारणाओं को दूर करना और न्यायपालिका के आसपास जागरूकता और विश्वास पैदा करने के माध्यम से संविधान को लोगों के करीब लाना मेरा संवैधानिक कर्तव्य था. मेरी कोशिश सिर्फ न्याय पहुंचाने तक ही नहीं रही बल्कि देश की जनता को जागरूक करने के लिए भी रही है. 

मैंने उनका पूरा विदाई भाषण बेहद गौर से सुना और 35 बरस की इस पत्रकारिता में पहली बार अहसास हुआ कि न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर बैठने और फिर उससे नीचे उतरने वाला एक जज इतना बेबाक व बेख़ौफ़ भी हो सकता है. इसलिये मैं तो उन्हें एक नहीं तीन सेल्यूट करता हूं. अब आप उनका मान करें या अपमान इसके लिए आप पूरी तरह से आज़ाद हैं.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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