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BMC: क्या बीजेपी-शिवसेना ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ का तराना फिर से गाएगी?

महाराष्ट्र में बृहन्नमुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) समेत अन्य 10 बड़े नगरनिगमों और 25 ज़िला परिषदों के चुनावी नतीजे राज्य की राजनीति में अवश्यंभावी बदलावों का स्पष्ट संकेत दे चुके हैं. शिवसेना ने जहां बीस सालों की घोर एंटीएनकंबेंसी के बावजूद अपने 84 पार्षद जिताकर मुंबई में अपनी ताक़त पर मुहर लगवाई, वहीं बीएमसी में उसकी सहयोगी बीजेपी अपने दम पर चुनाव लड़ने और शिवसेना से आमने-सामने की टक्कर के बावजूद पिछली बार की 31 सीटों से लगभग तीन गुना बढ़कर 82 सीटों का संख्या बल हासिल कर चुकी है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि बीजेपी ने न सिर्फ मुंबई में अपनी ताक़त बढ़ाई है बल्कि पूरे महाराष्ट्र में ज़मीनी स्तर पर अखिलराज्यीय होने का वह ओहदा हासिल कर लिया है जो कभी सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस को प्राप्त था. कांग्रेस और एनसीपी का तो यह हाल हुआ है कि सीटों के मामले में वे सपा और मनसे के अपमानजनक ब्रैकेट में शामिल हो गई हैं. शिवसेना से ‘मराठी माणूस’ का मुद्दा छीनने की कोशिश में जुटी बड़बोली मनसे ने भी अपनी मजबूती वाले छिटपुट ग्रामीण क्षेत्र समेत हर जगह बुरी तरह मुंह की खाई है.

स्पष्ट है कि जहां शहरी इलाकों में बीजेपी का ज़ोर बढ़ा है वहीं कांग्रेस व एनसीपी न केवल शहरों से उखड़ गई हैं, बल्कि पश्चिमी महाराष्ट्र के सातारा और सांगली जैसे अपने गढ़ों में भी उन्होंने जनाधार खो दिया है. 2014 में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की सरकार बनने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में विरोधी पार्टी का जो वैक्यूम तैयार हुआ था, उसे भरने का काम बीजेपी के साथ सत्ता में बैठी शिवसेना ने ही कर दिया. फिर चाहे वह कृषि उपज का सही मूल्य किसानों को न मिल पाने का सवाल हो या नोटबंदी से उपजे संकट का मुद्दा! यही वजह है कि राज्य के अन्य हिस्सों में भी शिवसेना कांग्रेस-एनसीपी का वैक्यूम भर रही है.

इसी का नतीजा है कि कांग्रेस बीएमसी में पिछली बार की 52 के मुक़ाबले इस बार 31, उल्हासनगर में 8 के मुक़ाबले सिर्फ 1, ठाणे में 11 के मुक़ाबले 3, पुणे में 28 के मुक़ाबले 11, सोलापुर में 43 के मुक़ाबले 14, नासिक में 15 के मुक़ाबले 6, नागपुर में 41 के मुक़ाबले 31 और पिंपरी चिंचवाड़ में तो पार्टी इस बार खाता तक नहीं खोल पाई जबकि पिछली बार कांग्रेस के यहां 14 पार्षद चुन कर आए थे. यानी राज्य में बीजेपी की चौतरफा बढ़त है और कांग्रेस-एनसीपी की भारी शिकस्त है. नगर निकाय और ज़िला परिषदों में बीजेपी की जीत और कांग्रेस-एनसीपी की हार का एक अर्थ यह भी है कि महाराष्ट्र में लंबे समय के लिए ज़मीनी स्तर पर मतदाताओं की गोलबंदी हो चुकी है जिसे अपने दोबारा अपने पाले में करने के लिए तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों को नाकों चने चबाने पड़ेंगे.

बीएमसी की बात करें तो यहां असल लड़ाई इस बात की थी कि मुंबई का किंग कौन? कांग्रेस वैसे भी संगठन के अभाव, गुटबाज़ी और आपसी फूट के चलते मुक़ाबले में नहीं थी लेकिन मतदाताओं ने न तो साफ तौर पर बीजेपी को किंग बनाया न ही शिवसेना को. वास्तविक मुद्दों की इस बार भी अनदेखी करते हुए मतदाताओं ने भावनात्मक रुझान जाहिर करके इतना ज़रूर स्पष्ट कर दिया है कि न तो बीजेपी का अहंकार चलेगा और न शिवसेना की आक्रामकता. देश ही नहीं एशिया महाद्वीप की सबसे अमीर महानगरपालिका (सालाना बजट 37000 करोड़ रुपए) को अगर ठीक से चलाना है तो दोनों को मिलकर काम करना होगा.

फुटपाथ से लेकर गगनचुम्बी इमारतों की समस्या सुलझानी होगी, विस्खलित ट्रैफिक सिस्टम सुधारना होगा, सड़कों को गड्ढामुक्त करना होगा, पार्किंग और झोपड़पट्टी की समस्या हल करनी होगी, सदियों पुरानी सीवर लाइन के चलते जल में मल की समस्या दूर करनी होगी, फ्लॉप हो चुकी एसआरए स्कीम को हिट कराना होगा, सार्वजनिक शौचालयों, पार्कों, बच्चों के लिए खेलने के मैदान जैसी हज़ारों शिकायतें दूर करनी होंगी आदि आदि....और सबसे अहम बात- मुंबई को उसका धर्मनिरपेक्ष एवं कॉस्मोपॉलिटन चरित्र भी लौटाना होगा!

बृहन्नमुंबई महानगरपालिका में शिवसेना और बीजेपी को मतदाताओं ने लगभग बराबरी का जनादेश दे दिया है और यहीं पेंच फंस गया है. गणित कहता है कि कुल 227 सीटों वाली बीएमसी में मेयर पद के लिए 114 पार्षदों का समर्थन चाहिए. स्पष्ट है कि बीजेपी को 32 और शिवसेना को 30 पार्षदों के समर्थन की दरकार है. बीजेपी यदि शिवसेना को दरकिनार करती है तो उसे निर्दलियों के साथ-साथ एनसीपी और एमएनएस को भी अपने पाले में लाना होगा. राजनीति को सचमुच संभावनाओं का खेल बनाते हुए अगर शिवसेना और कांग्रेस साथ आ जाएं, तब भी उनका आसानी से बीएमसी पर कब्जा हो जाएगा. अगर कांग्रेस शिवसेना के साथ नहीं आती तो उद्धव को भी निर्दलियों के साथ-साथ एमएनएस और एनसीपी के समर्थन की दरकार होगी. यानी बीएमसी में सत्ता के समीकरण मकड़जाल बन गए हैं! मनचाही जीत से वंचित रहने के बावजूद उद्धव ठाकरे की जिद है कि मुंबई का मेयर कोई शिवसैनिक ही बनेगा. जाहिर है बीजेपी के लिए गठबंधन का रास्ता शुरू से ही कांटों भरा होने वाला है. चूंकि हालिया चुनाव मोदी के नहीं बल्कि सीएम देवेंद्र फणनवीस के दम पर लड़े गए थे इसलिए वह आसानी से झुकेंगे नहीं. इस बार बीजेपी और शिवसेना दोनों को कोई सम्मानजनक हल निकालना ही होगा.

राज्य सरकार में चुनाव बाद हुए गठबंधन के बावजूद जिस तरह शिवसेना ने बीजेपी के स्थानीय और शीर्ष नेतृत्व की बार-बार हेठी की है, वह कड़वाहट को और हवा दे सकती है. लेकिन एक कयास यह भी है कि महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना के बीच तनातनी का ड्रामा वैसा ही है जैसे कि उत्तरप्रदेश में सपा व मुलायम परिवार में नूरा कुश्ती हुई और अंदर-बाहर के विभीषण निबट गए. अगर ऐसा है तो विधानसभा और लोकसभा के चुनाव की फिर देखी जाएगी, फिलहाल तो बीएमसी के लिए बीजेपी-शिवसेना थोड़ी मुद्राएं बनाने के बाद यकीनन हाथ मिलाएंगे और ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ का तराना गाएंगे.

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