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'सेक्युलर ब्रिगेड' वाला विपक्ष आखिर क्यों नहीं रोक पाया बीजेपी के कमल को खिलने से ?

राजनीति का बेहद पुराना मंत्र है कि बिखरा हुआ विपक्ष ही सत्ताधारी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत बनता है.कुछ ऐसा ही नजारा 2 मार्च को देखने को भी मिला है.पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनाव नतीजों ने देश को एक बड़ा संदेश ये भी दिया है कि सेक्युलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाले विपक्ष की झोली में लोगों को लुभाने के लिए ऐसा एक झुनझुना तक भी नहीं था कि वे कमल को वहां दोबारा खिलने से रोक पाते. शायद इसलिये कि विपक्षी दल आज भी अहंकार में डूबे हुए हैं. वे राजनीति की इस बुनियादी, लेकिन टेढ़ी बात को समझना ही नहीं चाहते कि बीजेपी या एनडीए के किसी उम्मीदवार को आखिर कैसे परास्त किया जा सकता है.

आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अगर बराबर की टक्कर देनी है तो इसके लिये जरुरी है कि विपक्ष के हर मुखिया को ये अहम छोड़ना पड़ेगा कि वही सबसे श्रेष्ठ है.उन्हें आपस में मिलजुलकर ये तय करना होगा कि किस सीट पर किस दल का उम्मीदवार बीजेपी या एनडीए के प्रत्याशी को परास्त करने की ताकत रखता है. लिहाजा वो सीट उसके खाते में ही जानी चाहिए. हालांकि ये फार्मूला लुभाने वाला है और काफी हद तक कारगर भी साबित हो सकता है, लेकिन विपक्षी दलों के बीच आपस में ही जैसा छत्तीस का आंकड़ा बना हुआ है. उसे देखकर कोई भी ये गारंटी नहीं दे सकता कि इस पर वे आसानी से अमल कर ही लेंगे.

हालांकि त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के चुनावी नतीजों ने कांग्रेस को निराश जरुर किया है, लेकिन पूरी तरह से हैरान शायद इसलिए नहीं किया है कि वहां बीजेपी की दोबारा वापसी कराने के लिए अकेले वही कसूरवार नहीं है. खासकर,त्रिपुरा व मेघालय में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और पुराने राजघराने से उभरी नई पार्टी तिपरा मोथा में अगर गठजोड़ हो गया होता तो शायद वहां बीजेपी को दोबारा वापसी के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते. इसी बिखरे विपक्ष ने तीनों राज्यों में बीजेपी को वॉकओवर देते हुए उसकी जीत को आसान बना दिया.

अब सवाल ये उठता है कि लोकसभा चुनावों से पहले विपक्ष की एकता में राहुल गांधी का नाम ही क्या सबसे बड़ी अड़चन है?कांग्रेस ने भारत जोड़ो यात्रा के जरिए राहुल की इमेज को एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश के साथ ही ये भी संदेश दिया है कि उनमें विपक्ष का नेतृत्व करने की पूरी कुव्वत भी है. हालांकि पांच राज्यों के ऐसे दिग्गज क्षत्रप नेता हैं जिन्हें न तो ये रास आ रहा है और न ही वे राहुल की छतरी के नीचे आने को तैयार हैं. इनमें पहला और बड़ा नाम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का है.उसके बाद तेलंगाना के सीएम के.चंद्रशेखर राव और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल हैं. यूपी में विपक्ष की ताकत माने जाने वाले सपा प्रमुख अखिलेश यादव तो साफ लहजे में कह ही चुके हैं कि उन्हें राहुल का नेतृत्व मंजूर नहीं है. हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बेशक राहुल की यात्रा की तारीफ कर दी हो, लेकिन विपक्ष की तरफ से पीएम पद का उम्मीदवार बनने की उनकी महत्वकांक्षा अभी पूरी तरह से खत्म होती नहीं दिखती है.लिहाजा,कांग्रेस को इस कड़वे सच को तो मानना ही पड़ेगा कि समूचे विपक्ष को एकजुट करने नें राहुल गांधी ही सबसे बड़ी अड़चन हैं.

पूर्वोत्तर के इन तीन राज्यों के नतीजों ने ये भी जाहिर कर दिया कि बीजेपी को सांप्रदायिक करार देने में पूरी ताकत से जुटे सेक्युलर कहलाने वाले विपक्ष की मानसिकता केकड़े से ज्यादा नहीं है क्योंकि उसने अपने भीतर से किसी नेता को उस मुकाम तक पहुंचने ही नहीं दिया. मेघालय में टीएमसी की पराजय ने राहुल गांधी की टीम को खुश ही किया है.वह इसलिये कि कांग्रेस का दामन छोड़कर ममता की टीएमसी का बैनर थामने वाले मुकुल संगमा की अगुवाई में अगर पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होता तो वह कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा झटका था. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने तो उन्हें आधुनिक युग का यहूदा तक कह डाला था. ठीक ऐसे ही कांग्रेस खेमा इसलिये भी खुश है कि त्रिपुरा के पूर्व शाही घराने के वारिस प्रद्योत बिक्रम देब बर्मा की नई पार्टी तिपरा मोथा वहाँ किंगमेकर नहीं बन पाई, इसलिये कि पार्टी नेताओं का बड़ा खेमा ये नहीं चाहता था कि जो शख्स कभी पार्टी की राज्य इकाई का अध्यक्ष रहा हो वह सरकार बनाने का किंगमेकर आखिर कैसे बन जाये.

अगले साल केंद्र की सत्ता में आने का सपना पाले बैठी कांग्रेस के नेता हालांकि ये भी नहीं मानेंगे कि उन्होंने तीनों चुनावी राज्यों में सारी अहम जिम्मेदारी अनुभवहीन लोगों के हाथों में सौंप रखी थी.पार्टी के पास न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही चुनाव-प्रचार का कोई प्रभावी तरीका है. राहुल गांधी ने जितनी भी चुनावी सभाएं की,उनमें सारा फोकस बीजेपी की बजाय ममता बनर्जी पर ही रहा. प्रचार को छोड़ भी दें तो कांग्रेस का कोई भी बड़ा नेता वहां केंद्रीय पर्यवेक्षक के बतौर दिखाई तक नहीं दिया,जो ममता बनर्जी से बातचीत करके बीजेपी को शिकस्त देने की चुनावी रणनीति बनाता. जब तक पार्टी के पास अभिषेक मनु सिंघवी जैसे नेताओं का अकाल नहीं पड़ा है,जिन्हें राज्यसभा में लाने में टीएमसी ने भी अपना सहयोग दिया था और वे कोर्ट के कई मामलों में टीएमसी की पैरवी भी कर रहे हैं.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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