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जंगल, दहशत और जवानों के साथ खूनी खेल... नक्सलियों से निपटने में आखिर कहां चूक जाती हैं सरकारें

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बुधवार 26 अप्रैल को बड़ा नक्सली हमला हुआ. इसमें 10 जवान बलिदान हो गए. ड्राइवर की भी जान चली गई. नक्सलियों ने आईईडी ब्लास्ट किया था और ये धमाका इतना तेज था कि आसपास के इलाकों में भी इसकी गूंज सुनाई दी थी. नक्सलियों ने जिस बम का इस्तेमाल किया है, उसमें 50 किलो विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल बताया जा रहा है. इस घटना ने पूरे देश को दहला दिया. पिछले 10 साल की बात करें तो नक्सलियों ने ऐसे 9 बड़े हमले किए हैं और उसमें 200 लोगों की जानें गईं हैं.  

सरकार घोषणा करने में न करे जल्दबाजी

ये जो नक्सलियों ने हमला किया है 26 अप्रैल को, जिसमें 11 जवानों ने बलिदान दिया, वह दरअसल उनका अपना तरीका है, सरकार को बताने का. केंद्र सरकार ने संसद में हाल ही में घोषणा की थी कि छत्तीसगढ़ से माओवाद का खात्मा कर दिया गया है, तो नक्सलियों ने इस तरीके से अपना जवाब दिया है कि वे अभी खत्म नहीं हुए हैं. हालांकि, यह भी सत्य है कि पिछले तीन-चार वर्षों से उनका दायरा बहुत संकुचित हुआ है, इसका कारण यह भी है कि हरेक दो-तीन किलोमीटर पर कैंप बने हुए हैं, सड़कें बनी हुई हैं. इस वजह से उनको पीछे तो धकेला गया है. वैसे, यह भी एक तथ्य है कि छत्तीसगढ़ में महजा पांच-छह महीने बाद चुनाव होने जा रहे हैं तो उससे भी जोड़कर इसे देखना चाहिए. माओवादी चुनाव में भी अपनी उपस्थिति को दर्ज करा रहे हैं, जनता के पास, केंद्र और राज्य सरकार के पास. हालांकि, जो चुनाव होते हैं लोकतांत्रिक पद्धति से, उसको तो माओवादी नकारते ही आए हैं, लेकिन वह यह भी जता रहे हैं कि उनकी उपस्थिति को समाप्त न माना जाए. 

एक चीज तो ये मान लेनी चाहिए कि माओवाद की समस्या को केवल बंदूक के बल पर या हिंसा से दबाया नहीं जा सकता. ये वैचारिक और सामाजिक समस्याओं की भी देन है. इसको लड़ने के लिए कई स्तरों पर सतर्कता बरतनी होगी. केवल सड़कें या कैंप इसका समाधान नहीं है. हो सकता है कि वे पीछे हट जाएं. हो सकता है कि वे कल को आपसे सीधे हथियार से न लड़ें, मगर लड़ाई तो रहेगी. आखिर, यह जनता की ही लड़ाई है. कॉरपोरेट को जंगल, जल औऱ जमीन जो बेचने की जल्दी है सरकारों को, यह आदिवासियों का प्रतिरोद ही तो है उसके खिलाफ. तो, इसके पूरी तरह खत्म होने का दावा नहीं किया जा सकता है.

माओवादी शायद बदल रहे रणनीति 

वैसे, 26 अप्रैल की घटना के बारे में एक और बात बता दूं. ये जो इलाका है, यहां के बारे में तो 12 साल पहले यहां आइपीएस कल्लूरी ने घोषणा कर दी थी कि ये इलाका माओवाद मुक्त है. वहां हर दो किलोमीटर पर कैंप है, जिस रोड में विस्फोट हुआ, वह पक्का था, डामर का था. ये हमला नक्सलियों ने संकेत देने के लिए किया है. उनका संदेश साफ है कि उन्हें खत्म समझने की भूल न करें. वे कभी भी, कहीं भी कुछ भी करने में अब भी सक्षम है. पिछले तीन साल से हालांकि उन्होंने सरकार को भी संकेत दिए हैं कि उनकी रणनीति बदली है. आज 32 जगहों पर छत्तीसगढ़ में जन-आंदोलन चल रहे हैं. दिल्ली में किसान-आंदोलन से जो शुरू हुआ, वह आज 32 से अधिक जगहों पर लाखों की संख्या में आदिवासियों के धरना-प्रदर्शन पर बैठने में बदल चुका है. तो, यह शायद उनका तरीका है बताने का कि वे बदल रहे हैं अपना तरीका. वे यह भी शायद चाह रहे हैं कि सरकार इस रास्ते पर उनका स्वागत करे. माओवादी अगर बंदूक का रास्ता छोड़कर लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात कहना चाह रहे हैं तो सरकार को दो कदम आगे बढ़कर उनका स्वागत करना चाहिए. यह एक संकेत है.

सरकार किसी की हो, भाषा एक ही रहती है

जड़ से मिटा देंगे, बदला लेंगे, कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी, एक-एक का हिसाब होगा- इस सब तरह के बयान रटे-पिटे हैं. बहुतेरी सरकारें आईं और गईं, लेकिन माओवाद जड़ से नहीं मिटा. यह केवल बंदूक से निबटने वाली बात नहीं है. आपको लोगों के दिमाग में घुसना होगा, उनको अपना बनाना होगा. चिदंबरम के समय भी कई तरह के ऑपरेशन चले थे, ऑपरेशन ग्रीन हंट चला था, जन-जागरण अभियान चला था. उस समय केंद्र में कांग्रेस और राज्य में भाजपा की सरकार थी. अभी उसी का उल्टा है. हालांकि, भाषा किसी की भी सरकार हो, एक ही होती है. वह भाषा कॉरपोरेट की है. अगर जनता की भाषा रहती तो बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ते. चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, भाषा एक ही रहती है. इसलिए एक जैसी रहती है, क्योंकि उन्हें जंगलों पर, खानों पर कब्जा तो चाहिए, लेकिन आदिवासियों को हक देने में दिक्कत है. 

जहां तक उनके बंदूक की भाषा बोलने का सवाल है, तो मैं बताऊं कि जंगल में न तो चोरी है, न डकैती है, न बलात्कार है. आप जब जंगल में घुसकर उन्हें मारने जाते हैं तो वो अपना बचाव करते हैं. हथियार उनके पास हैं. अब वे बंदूक की भाषा इसलिए बोल रहे हैं कि बस्तर में, छत्तीसगढ़ में कोई भी लोकतांत्रिक पार्टी चाहे कांग्रेस हो, भाजपा हो या कम्युनिस्ट हो, वह उनके पक्ष से नहीं बोल रहे हैं. जनता की भी मजबूरी है. जनता तो कम्युनिस्ट नहीं है, माओवादी नहीं है, नक्सली नहीं है, उसको मार्क्स या लेनिन से भी मतलब नहीं है. आदिवासी तो सदियों से अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं. माओवादी तो पिछले 40-50 साल से आए हैं, लेकिन आदिवासी तो लगातार संघर्ष में ही हैं. अब ये उनकी मजबूरी है कि माओवादी ही उनके पक्ष से बोल रहे हैं, खड़े हैं. 

माओवाद मिटाने का मतलब हवाई हमला नहीं

यह तथ्य लगातार क्यों छिपाया जा रहा है कि पिछले तीन वर्षों में चार बार बस्तर के उन जंगलों में सरकार ने हवाई हमले किए और बम गिराए हैं. बम क्या केवल माओवादियों को चुनकर ही मारेंगे? यह तो जनता के साथ भी लड़ाई है. पहली बार 21 अप्रैल 2021 को हवाई हमला हुआ और उसके बाद ऐसे चार हमले और हुए. अभी हाल ही में सबसे ताजा हमला इसी महीने की 7 तारीख को हुआ. इसमें इजरायल के ड्रोन इस्तेमाल हो रहे हैं, बस्तर के ही कई कैंप से ये संचालित होता है. राज्य सरकार तो पूरी तरह से इससे पल्ला झाड़ लेती है. केंद्र सरकार उन लोगों, पत्रकारों को अंदर जाने से रोक देती है जो इन हमलों का असल सच पता चलाना चाहते हैं. 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब न हो, इसलिए लोगों को रोका जा रहा है वहां जाने से. यहां सवाल ये है कि ऐसा काम ही क्यों करना कि आपकी छवि के खराब होने का खतरा पैदा हो? कल की घटना को इन हवाई हमलों के प्रतिकार के तौर पर भी देखा जा सकता है कि नक्सलियों ने अपने ढंग से बदला लिया है. इस मामले में राज्य सरकार और केंद्र सरकार एकजुट हैं कि अंदर कोई जाने न पाए. सरकार अगर सचमुच इस मामले का समाधान करना चाहती है तो हमारे संविधान ने जो अधिकार दिया है, आदिवासियों को. अनुसूची 5 और अनुसूची 6 में जो विशेष अधिकार हैं, जिसे पेसा कानून कहते हैं. उसे लागू करने में आखिर सरकार को दिक्कत क्या है? वह तो संवैधानिक बात कर रहे हैं. अगर सरकार इसे लागू करने में हिचक न दिखाए और इन्हें लागू कर दे तो सारी समस्या निबट जाएगी. 

(यह आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है) 

 

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