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मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष नहीं बना पा रहा है चुनावी मुद्दा, यही है 2024 लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत

देश की सत्ता हासिल करने के लिए होने वाले सियासी जंग में अब महज 10 महीने का ही वक्त बचा है. ऐसे में सत्ताधारी दल बीजेपी के साथ ही कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल भी अपनी-अपनी रणनीति बनाने और उसे वास्तविक आकार देने में जुटे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कद और बीजेपी की देशव्यापी ताकत को देखते हुए विपक्षी दलों के बीच एकजुटता का प्रयास भी जारी है.

इन सबके बीच अलग-अलग राज्यों में बीच-बीच में सियासी हलचल भी देखने को मिल रहा है. अभी महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा भूचाल आया हुआ है. पिछले कई महीनों से विपक्षी दलों को एकजुट करने में जुटे एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार को अपने भतीजे अजित पवार की बगावत के बाद खुद अपनी पार्टी को बचाने की जद्दोजहद से जूझना पड़ रहा है.

उधर नौकरी के बदले जमीन केस में सीबीआई की ओर से तेजस्वी यादव को आरोपी बनाए जाने के बाद विपक्षी एकजुटता की मुहिम को धार देने में जुटे बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू नेता नीतीश कुमार और आरजेडी के बीच सबकुछ ठीक नहीं होने की अटकलें भी लगाई जाने लगी है. नीतीश कुमार और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के बीच 3 जुलाई को हुई बैठक के बाद इन अटकलों को और हवा मिली है.

वहीं कांग्रेस की ओर से भी 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों की लामबंदी को लेकर कोई ज्यादा सक्रियता नहीं दिख रही है. इस मसले पर आगे बढ़कर अलग-अलग विपक्षी दलों को भरोसे में लेने को लेकर कांग्रेस में गंभीरता का साफ अभाव झलक रहा है.

आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत विपक्षी गठबंधन बने या न बने ..ये तो भविष्य में तय होगा, लेकिन एक बात जरूर है कि चुनावी मुद्दों को लेकर कांग्रेस के साथ ही विपक्षी दलों के हाथ तंग नज़र आ रहे हैं. कोई भी चुनाव मुद्दों और उन मुद्दों के जरिए बने माहौल के आधार पर जीता जाता है. उसमें भी जब बात लोकसभा चुनाव की हो तो इस नजरिए से देशव्यापी चुनावी मुद्दों का महत्व बेहद बढ़ जाता है. ये वो बिन्दु है, जहां कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल फिलहाल बीजेपी से काफी पीछे नज़र आ रहे हैं.

सीधे शब्दों में कहें तो विपक्ष नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ वैसा चुनावी मुद्दा नहीं बना पा रहा है, जिसको हथियार बनाकर बीजेपी को मात दे सके और यही पहलू 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत साबित होने वाला है.

ऐसा नहीं है कि विपक्षी दलों के लिए मुद्दों की कमी है, लेकिन उन मुद्दों को लेकर लगातार संघर्ष करने की क्षमता और उसे जनता के बीच पहुंचाने की रणनीति का अभाव जरूर विपक्षी दलों में दिखता है. बीजेपी मुद्दों को गढ़ने और जनता के बीच उनको पहुंचाने में विपक्ष से कोसों आगे नज़र आती है.

ये शायद ही कोई भूला होगा कि 2014 लोकसभा चुनाव से पहले कैसे बीजेपी ने महंगाई और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया. इनको आधार बनाकर बीजेपी ने कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार 2014 के लोकसभा चुनाव में मात दी थी. भ्रष्टाचार और बढ़ती महंगाई के जरिए उस वक्त बीजेपी ने जो माहौल तैयार किया था, उस माहौल का बहुत बड़ा हाथ था, जिसकी वजह से  नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित कर 2014 में बीजेपी पहली बार अपनी बदौलत लोकसभा में बहुमत हासिल करने में कामयाब रही थी. उसके बाद बीजेपी की राजनीतिक किताब में लगातार नए-नए अध्याय जुड़ते गए. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी विपक्ष नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ चुनावी मुद्दा और उसके जरिए माहौल बनाने में नाकामयाब रहा था, जिसके कारण उस चुनाव में बीजेपी को 2014 से भी बड़ी जीत हासिल हुई थी.

अब जब 2024 का लोकसभा चुनाव सामने है, तो उस नजरिए से भी न तो कांग्रेस और न ही कोई और विपक्षी दल महंगाई या फिर भ्रष्टाचार को ही लंबे वक्त के लिए जनता के बीच मुद्दा बनाने में कामयाब हो पा रहे हैं. मुद्दा बनाने के लिए जिस तरह का संघर्ष चाहिए, उसमें भी संजीदगी की कमी को महसूस किया जा सकता है.

ऐसा भी नहीं है कि अब महंगाई और भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रहा है. हम देख ही रहे हैं कि कैसे रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े सामानों की कीमतों में आग लगी हुई है. पेट्रोल-डीजल के दामों को पिछले कुछ सालों में नई ही ऊंचाई मिली है. घर की रसोई के लिए आम आदमी को 8-9 साल पहले जितना खर्च करना पड़ता था, अब उसके लिए ही दोगुना से लेकर तिगुना खर्च करना पड़ रहा है, जबकि गरीब और मिडिल क्लास के लोगों के बीच प्रति व्यक्ति आय में उस रफ्तार से वृद्धि नहीं हुई है. भ्रष्टाचार भी अलग-अलग तरीकों और स्वरूप में मौजूद है.

कहने का मतलब है कि अभी भी महंगाई और भ्रष्टाचार है बहुत बड़ा मुद्दा, लेकिन राजनीतिक और मीडिया विमर्श में उसको ज्यादा समय और महत्व नहीं मिल पा रहा है. इसका एक बहुत बड़ा कारण है कि विपक्ष जनता तक इन मुद्दों को पहुंचाने में सफल नहीं हो पा रहा है और ऐसा करने के लिए लगातार संघर्ष करता नज़र भी नहीं आ रहा है.

मुद्दों की कमी नहीं है. महंगाई, भ्रष्टाचार के अलावा बेरोजगारी का मुद्दा भी मौजूद है. आलम ये है कि जून के महीने में बेरोजगारी दर 8.45% तक पहुंच गया है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के मुताबिक मई में ये आंकड़ा 7.68% था. ये तीसरी बार है जब इस साल बेरोजगारी दर 8% से ऊपर चली गई. शहरों के मुकाबले गांवों में बेरोजगारी दर ज्यादा देखी गई. गांवों में बेरोजगारी दर दो साल में सबसे अधिक देखी गई है. ये तो आंकड़े हैं, वास्तविकता में भारत में लोगों को बेरोजगारी का दंश इससे कहीं ज्यादा झेलना पड़ रहा है. पिछले कुछ सालों से बेरोजगारी के मोर्चे पर देश में भयावह स्थिति है, इस बात से शायद ही कोई भी आर्थिक मामलों का जानकार इनकार कर सकता है. ये ऐसा मुद्दा है, जिससे देश के गरीब और मिडिल क्लास के लोगों का सबसे ज्यादा सामना हो रहा है.

उसी तरह गरीबी, आर्थिक असमानता के तहत अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई, ग्रामीण से लेकर शहरी इलाकों में आम लोगों के लिए बेहतर चिकित्सा सुविधा का अभाव या फिर उसके लिए बड़ी राशि का बोझ, बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लगातार महंगा होते जाना, धार्मिक आधार पर लोगों के बीच नफरत का बढ़ना..ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनसे देश के ज्यादातर नागरिकों का सामना अक्सर होते रहता है.

हालांकि इनमें से कोई भी एक ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसको लेकर कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों के नेता लगातार जनता के बीच संवाद करते रहे हों. अलग-अलग मुद्दों को भले ही चंद दिनों के लिए विपक्षी दल उठाकर नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करते तो हैं, लेकिन उनको देशव्यापी चुनावी मुद्दा बनाने के लिए गांव-देहात से लेकर सड़कों पर विपक्ष का निरंतर संघर्ष या कहें महीनों तक चलने वाला संघर्ष नहीं दिखता है.

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, अडाणी समूह पर हिंडनबर्ग के खुलासे को लेकर जरूर पिछले कुछ महीनों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने का प्रयास करते रहे हैं. हालांकि ये एक ऐसा मुद्दा है, जिसको समझने के लिए अर्थशास्त्र और बाजार का गणित समझने की जरूरत पड़ती है. शायद यही वजह है कि ये मुद्दा उन लोगों के बीच देशव्यापी मुद्दा के तौर पर तब्दील नहीं हो पाया, जिनकी संख्या मतदान केंद्रों पर जाने की ज्यादा होती है.

उसी तरह से विपक्षी दल सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का मुद्दा उठाते रहे हैं. इन दलों का ये भी आरोप रहा है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों का भय दिखाकर बीजेपी विपक्षी दलों में तोड़-फोड़ की गतिविधियों को भी अंजाम देने का काम करती है. लेकिन ये मुद्दा भी आम लोगों के बीच उस तरह से हावी नहीं हो पाया है क्योंकि जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का मसला कोई नया नहीं है. जिस दल की भी केंद्र में सरकार रही है, उस पर इस तरह के आरोप लगते रहे हैं और देश की जनता के लिए ये कोई बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा नहीं रहा है. ऐसे भी जब नेताओं पर जांच एजेंसी की ओर से किसी भी तरह की कार्रवाई होती है, तो जिस तरह की अवधारणा पहले से बनी हुई है, उसके तहत आम लोगों में उन कार्रवाई को लेकर एक तरह का सकारात्मक रुख ही देखने को मिलता है.

कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल ये लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार और बीजेपी अपने हिसाब से मीडिया की मुख्यधारा को प्रभावित करती है. हालांकि विपक्ष को ये नहीं भूलना चाहिए कि आज का दौर सोशल मीडिया का दौर है और इसमें आप अगर लगातार मुद्दों की लड़ाई सड़क पर लड़ते हैं, तो उसे आम लोगों तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता है, बशर्ते आपका संघर्ष निरंतर हो.

एक सच्चाई ये भी है कि ज्यादातर विपक्षी दल और उसके शीर्ष नेतृत्व का ज्यादातर वक्त नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ घेराबंदी करने से ज्यादा पार्टी की अंदरूनी झमेलों से निपटने में खर्च होता है. ये भी एक बड़ा कारण है कि विपक्षी दल किसी भी मुद्दे को लंबे वक्त तक के लिए देशव्यापी मुद्दा बनाए रखने में सफल नहीं हो पा रहे हैं. कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों के बड़े-बड़े नेताओं की ओर से जन सरोकार से जुड़े मुद्दों के लिए लगातार आंदोलन और संघर्ष करने की उत्कंठा भी नहीं दिखती है.

विपक्ष के विपरीत बीजेपी मुद्दों को बढ़ाने में काफी आगे है. हमने देखा है कि चाहे हिंदुत्व के तहत अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा हो या फिर अनुच्छेद 370 का, बीजेपी ने किस तरह से धीरे-धीरे इसे देशव्यापी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाकर अपने पक्ष में माहौल बनाने में कामयाबी हासिल की है. अभी यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा इसी तरह का है. जिस तरह का माहौल बनते दिख रहा है, यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक का बन गया है. तमाम राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव की तारीखें नजदीक आते जाएंगी, यूनिफॉर्म सिविल कोड और बड़ा चुनावी मुद्दा बनते जाएगा और इससे वोटों के ध्रुवीकरण में मदद मिलेगी. अगर ऐसा हुआ तो ये सबको पता है कि इसका सबसे ज्यादा लाभ किस पार्टी को मिलेगा.

उसी तरह से 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले बीजेपी के पास एक और तगड़ा मुद्दा होगा, जिसकी बदौलत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने पार्टी के दावे को काफी बल मिल सकता है. ये ऐसा मुद्दा है, जिसके सामने विपक्ष के सारे आरोप और मुद्दे बौने साबित हो सकते हैं. हम सब जानते हैं कि अगले साल जनवरी में अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मंदिर का उद्घाटन करेंगे. बीजेपी इस पल को ऐतिहासिक और स्वर्णिम बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी, ये भी तय है.

ये वो वक्त होगा, जब पूरे देश में लोकसभा चुनाव का माहौल छाया रहेगा क्योंकि अगला लोकसभा चुनाव अप्रैल-मई 2024 में ही होना है. ये भी किसी से छिपा नहीं है कि ऐसा होने के बाद देश में किस तरह का चुनावी माहौल बनेगा और बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड के लिहाज से ये एक नई ऊंचाई होगी और इसका काट खोजना विपक्ष के काफी मुश्किल काम होगा. कह सकते हैं कि इसके बरअक्स कोई और मुद्दा खड़ा करना विपक्ष के लिए दिन में तारे देखने जैसा दुरूह कार्य होगा.

आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी के पास एक और मुद्दा है, जिसकी काट खोजना विपक्ष के लिए नाकों चने चबाना जैसा साबित हो रहा है. बीजेपी के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा चेहरा है, जिससे पार्टी को पिछले दो लोकसभा चुनाव में भारी जीत हासिल हुई थी और 2024 में भी पार्टी इसे अपना सबसे मजबूत पक्ष मान रही है. वहीं न तो कांग्रेस और न ही विपक्षी गठबंधन की संभावनाओं को देखते हुए विपक्ष का कोई चेहरा अब तक सामने आया है. कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों का जो रवैया है, उसको देखते हुए ये भी कहा जा सकता है कि चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष की ओर से  किसी सर्वमान्य चेहरे की घोषणा होने की संभावना का दूर-दूर तक आसार नहीं है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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