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BLOG: नेता जी, औरतों की बेरोजगारी आपकी नींद क्यों नहीं उड़ाती?

यह कुछ घबराने वाले आंकड़े हैं कि देश में खेतों से लेकर शहरों तक, औरतों के लिए नौकरियों और रोजगार का टोटा हो गया है. खेतों में काम के लिए मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है और मैनुअल वर्क यानि हाथ के काम करने वाली औरतों का रोजगार छिन रहा है. शहरों मे छोटे कारोबार ठप्प हो रहे हैं और यहां भी औरतें बेरोजगार हो गई हैं. यह भी सच है कि 90 परसेंट औरतें अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती हैं. पिछले कई सालों में आर्थिक नीतियों ने छोटे कारोबारियों के लिए जीना दूभर किया है. इसका असर सीधा औरतों के रोजगार पर पड़ा है.

भारत में रोजगार संकट की तरफ अर्थशास्त्री और विपक्ष लगातार हो-हल्ला मचा रहा है. अब थिंकटैंक सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के सर्वेक्षण का कहना है कि पिछले साल एक करोड़ के करीब नौकरियां खत्म हुई जिनमें 90 प्रतिशत नौकरियों में औरतें लगी हुई थीं. इसका मतलब यह है कि लगभग 90 लाख औरतें पिछले साल बेरोजगार हुई हैं. चुनावों के मद्देनजर क्या यह नींद उड़ाने वाला आंकड़ा नहीं है? जिस देश में श्रम शक्ति में औरतों की भागीदारी पहले से कम हो, वहां मौजूदा नौकरियां भी चले जाना, रोजगार के एक बड़े संकट की तरफ ध्यान आकर्षित करता है.

यूं श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी का निम्न स्तर भारत में कोई अकेला संकट नहीं है. यह एक ग्लोबल ट्रेंड है. सिवाय बुरुंडी और मोजाम्बीक को छोड़ दिया जाए तो ऐसा कोई देश नहीं है जहां लेबर फोर्स में औरतों की भागीदारी पुरुषों से ज्यादा हो. हां, दक्षिण एशियाई देशों में औरतें पहले से कम संख्या में लेबर फोर्स में कम हैं. यहां उनकी भागीदारी 28 परसेंट ही है, जबकि विश्व स्तर पर यह दर करीब 67.5 परसेंट है. लेकिन सीएमआईई का सर्वेक्षण कहता है कि पिछले साल मई-अगस्त के बीच औरतों की भागीदारी की दर 10.7 परसेंट पर पहुंच गई, जोकि बहुत डराने वाला डाटा है. यानि हम सिर्फ यमन जैसे देश से बेहतर स्थिति में हैं जहां औरतों की भागीदारी दर सिर्फ 6 परसेंट है.

आंकड़े कैसे चौंकाते हैं- यह समझना भी जरूरी है. इसके लिए यह पूछा जा सकता है कि लेबर फर्स में भागीदारी दर यानि एलपीआर क्या होती है? एलपीआर 15 साल से अधिक उम्र के उन लोगों का अनुपात होता है जोकि काम करने के इच्छुक होते हैं. वे या तो काम कर रहे होते हैं या काम की तलाश कर रहे होते हैं. इस लिहाज से एलपीआर बेरोजगारी दर से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह हमें बताती है कि कितने लोग काम करने की इच्छा रखते हैं. पर उनके पास काम नहीं है. अगर बहुत कम संख्या में लोग काम करने के इच्छुक हैं तो बेरोजगारी दर कितनी भी कम हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन अगर एलपीआर ऊंची है तो इसका अर्थ है लोग काम करने के इच्छुक हैं, हां तब बेरोजगारी दर ज्यादा होने से यह भी पता चलता है कि लोग काम तो करना चाहते हैं पर उनके पास काम नहीं है.

जिस परिवार में आदमी और औरत, दोनों काम करते हैं- बाहर भी और घर में भी- वह आदर्श स्थिति होती है. लेकिन यहां आदमी काम करते हैं, औरतें नहीं. यह असंतुलन बाहर के काम में है और घर के काम में इससे उलट स्थिति है. यहां औरतें काम करती हैं, आदमी नहीं. और औरतें अब सिर्फ घर में नहीं, बाहर भी काम करना चाहती हैं. यह बात और है कि हम उन्हें काम दे नहीं पा रहे- जो काम उनके पास था, उसे भी छीन रहे हैं. हमारे यहां पहले ही औरतों को पुरुषों के मुकाबले रोजगार के सीमित विकल्प मिलते हैं. फिर अक्सर शादी के बाद उन्हें काम छोड़ना पड़ता है. घर परिवार के कारण- बच्चों के लालन-पालन के कारण. पति की आमदनी अच्छी है तब तो उनका दोबारा काम करना बनता ही नहीं. वे सिर्फ तथाकथित 'होममेकर' बनकर रह जाती हैं.

जिन परिवारों में पैसे की तंगी होती है, वहां औरतें इनफॉर्मल सेक्टर में छोटे-मोटे काम करके एक्स्ट्रा अर्निंग का रास्ता चुनती हैं. पर पिछले दो सालों में नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे मोटे कारोबार पर ताले लगाए तो इसका असर सबसे ज्यादा औरतों पर ही पड़ा. अगर कारोबार मंदा हुआ तब भी सबसे पहले लो वेज वाले मजदूर हटाए गए और लो वेज पर अधिकतर औरतें ही काम करती हैं. कुछेक और कारण भी हैं कि औरतों को नौकरियां का नुकसान हो रहा है. धंधा मंदा होने पर ट्रांसपोर्ट से लेकर दूसरी सुविधाओं में कटौती हुई तो औरतों के लिए काम करना मुश्किल हुआ.

2017 में एक नॉन प्रॉफिट की रिपोर्ट में कहा गया था कि 95% ट्रेन्ड औरतों को नौकरियों का ऑफर तो मिलता है. लेकिन बहुत सी उसे मंजूर नहीं करतीं- क्योंकि काम करने की जगह काफी दूर होती है. इसकी बजाय वे लो वेज वाली, आस-पास मिलने वाली नौकरियां करती हैं. इसके अलावा छह महीने की मेटरनिटी लीव न देनी पड़े, इसलिए भी औरतों का काम पर रखने से कंपनियां कतराती हैं. टीमलीज सर्विसेज एक स्टाफिंग और ह्यूमन रिसोर्स कंपनी पिछले साल कह चुकी हैं कि नए मेटरनिटी बेनेफिट कानून के चलते 11 से 18 लाख औरतों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ेगा.

अभी हाल ही में यूके के मशहूर मैनचेस्टर विश्वविद्यालय और एसेक्स विश्वविद्यालय के एक साझा शोध में कहा गया था कि कामकाजी औरतों को दूसरी औरतों के मुकाबले 18 प्रतिशत अधिक तनाव का शिकार होना पड़ता है. तिस पर अगर उसके दो बच्चे हों तो यह तनाव बढ़कर 40 प्रतिशत हो जाता है. लेकिन यह शोध स्कैंडल से ज्यादा कुछ नहीं लगता. चूंकि ज्यादा तनाव तब पैदा होता है, जब औरतें घर में बैठकर घर काम जैसा अनपेड वर्क करती हैं और घर वाले उससे पूछते हैं- तुम सारा दिन करती ही क्या हो. या फिर तब, जब घर के बाहर दफ्तर में उन्हें पुरुषों के बराबर अवसर और सफलता नहीं मिलती. सबसे जटिल फेमिनिस्ट प्रश्न का यह सबसे सरल उत्तर है- औरतों को ज्यादा से ज्यादा विकल्प मिलने चाहिए. नौकरियां भी. पर ऐसा मुद्दा चुनावी मुद्दे में तब्दील नहीं हो पाता। औरतों की बेरोजगारी नेताओं की नींद नहीं उड़ाती- वे अपने स्वार्थ के दर्द में ही अधमरे होते रहते हैं?

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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