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BLOG: अमर रहेगा फिल्मों का 'अमर'

विनोद खन्ना एक ऐसे अभिनेता थे कि उन जैसी मिसाल फिल्मों में कम ही मिलती है. उनकी चाल- ढाल, संवाद अदायगी का तरीका तो कमाल का था ही लेकिन इस सबसे भी ख़ास था उनका अंदाज़. जब वह खलनायक और डाकू की भूमिका में आते थे तो उनकी आँखें आग उगलती नज़र आती थीं लेकिन जब वह रोमांटिक भूमिकाएं करते थे तो उनकी उन्हीं आँखों से प्रेम बरसता प्रतीत होता था. फिर यह भी कि विनोद खन्ना ने चाहे सहायक भूमिकाएं कीं,चाहे खलनायक की, चाहे नायक की और चाहे चरित्र भूमिकाएं लेकिन उनकी पहचान एक हीरो की रही. एक ऐसा हीरो जो बहुतों का आदर्श हो सकता है. बहुत से लोग उस जैसा ही बनने चाहते हैं.

कायम रहा स्टारडम

अपने करीब 48 साल के फिल्मी करियर में विनोद खन्ना ने करीब 150 फ़िल्में कीं. साल 1968 से शुरू हुई उनकी फिल्म यात्रा उनके सांस थमने के अप्रैल 2017 तक चली. अपने इस फ़िल्मी सफ़र में विनोद खन्ना ने एक से एक नायाब भूमिकाएं की. लेकिन फिल्मों में काम पाने के लिए उन्हें कभी संघर्ष नहीं करना पड़ा. चाहे उनकी पहली फिल्म ‘मन का मीत’ हो या उनकी अंतिम फिल्म ’एक थी रानी ऐसी भी’ उन्हें काम बराबर मिलता रहा. विनोद खन्ना के इस लम्बे सफ़र में कितने ही नए अभिनेता आये कितने ही उनके समकालीन रहे या कितने ही उनसे पहले के वरिष्ठ अभिनेता रहे लेकिन विनोद खन्ना का स्टारडम लगातार कायम रहा. तब भी जब वह फ़िल्में न के बराबर कर रहे थे.

स्कूल में ही जागा अभिनय का शौक

विनोद खन्ना का जन्म अविभाजित भारत के उस पेशावर में हुआ था जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है. लेकिन यही पेशावर फ़िल्मी दुनिया के दिग्गज दिलीप कुमार और राज कपूर की जन्म भूमि भी है. जिस प्रकार ये अभिनेता अपनी पठानी शान के लिए जाने जाते रहे कुछ वैसी ही पठानी शान विनोद खन्ना के व्यक्तित्व में भी झलकती थी. हालांकि उस पेशावर में विनोद एक साल भी नहीं रहे . सन 1946 की 6 अक्टूबर को विनोद खन्ना का जन्म हुआ और 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद होने के साथ विभाजित भी हो गया. तब इनके पिता किशन लाल और माँ कमला खन्ना अपने दो बेटों और तीन बेटियों सहित पेशावर से मुंबई आ गए. इनके पिता मूलतः कपड़े के व्यापारी थे काम काज अच्छा था इसलिए विनोद खन्ना और उनके भाई बहनों ने मुंबई के सेंट जेवियर्स और दिल्ली के दिल्ली पब्लिक स्कूल जैसे बड़े स्कूलों में पढाई की. स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही विनोद खन्ना को पहले नाटकों में काम करने का शौक जागा और फिर 1960 में ‘मुग़ल ए आज़म’ फिल्म देखकर मन फिल्मों में काम करने के सपने देखने लगा.

विलेन का रोल मिलने की दिलचस्प कहानी 

कुछ समय बाद विनोद खन्ना की मुलाकात अभिनेता सुनील दत्त से हुई तो उन्होंने विनोद को अपनी फिल्म ‘मन का मीत’ में खलनायक की भूमिका में ले लिया और कभी अपने शर्मीलेपन के लिए जाने जाना वाला विनोद अब अभिनेता बन गया. मेरी विनोद खन्ना से कई बार मुलाकात हुई. उनका मैंने कई बार इंटरव्यू भी किया. उनसे जब भी मुलाकात हुई उनकी जिंदादिली ने हमेशा प्रभाव छोड़ा. मैंने उनसे एक बार पूछा था कि क्या आप शुरू में खलनायक बनना चाहते थे या नायक बनने की तमन्ना आपको फिल्म में लायी. इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था,“असल में मेरे पिता नहीं चाहते थे कि मैं फिल्मों में काम करूँ. लेकिन उन्होंने मेरी इच्छा देखते हुए मुझे दो साल का समय दिया. मैं हीरो ही बनना चाहता था और दत्त साहब ने ‘मन का मीत’ में मुझे बतौर हीरो ही साइन किया था लेकिन फिल्म की पटकथा में कुछ बदलाव हुए तब उन्होंने अपने भाई को हीरो और मुझे विलेन बनने के लिए पूछा. मैंने कहा मैं तो फिल्मों में काम करने का ठान कर आया हूँ और खुद को आपके हवाले कर दिया है. आप जो ठीक समझें वही करें. बस तभी से मैं विलेन बन गया. बाद में मुझे छोटी बड़ी जो भी भूमिकाएं मिलती रहीं वह मैं करता गया.”

राजनीति में वाजपेयी जी के भाषणों से प्रभावित होकर आए

सुनील दत्त के साथ विनोद खन्ना ने बाद में रेशमा और शेरा, नहले पे दहला, क्षत्रिय, परंपरा, डाकू और जवान जैसी फिल्मों में भी काम किया. यह भी संयोग रहा कि जिस प्रकार उन्हें फिल्मों में पहला ब्रेक देने वाले सुनील दत्त फिल्मों से राजनीति में आये वैसे ही विनोद खन्ना भी फिल्मों से राजनीति में आ गए. यह भी संयोग रहा कि फिल्मों से राजनीति में आने पर जिस प्रकार सुनील दत्त केंद्र में मंत्री बने और अपने संसदीय क्षेत्र में अपने अच्छे कामों के लिए सराहे गए वैसे ही विनोद खन्ना भी केंद्र में वाजपेयी सरकार में पहले पर्यटन और संस्कृति मंत्री बने और फिर विदेश राज्य मंत्री. क्या विनोद खन्ना सुनील दत्त से प्रभावित होकर ही राजनीति में आये? यह पूछने पर विनोद खन्ना ने मुझे बताया था –“दत्त साहब की मैं जिस बात से प्रभावित था वह था उनका कमिटमेंट. वह अपनी बात के बहुत पक्के थे. लेकिन मैं राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी जी के भाषणों से प्रभावित होकर आया. वह मेरे आदर्श हैं. मेरी कामयाबी उन्हीं से प्रेरित है.”

हर रोल में हमेशा सहज

विनोद खन्ना की ख़ास बात यह थी कि उन्हें सोलो हीरो के रूप में फिल्म मिले या मल्टी हीरो के रूप में वह हमेशा सहज रहते थे. अपनी प्रतिभा, अपने काम पर उन्हें हमेशा भरोसा रहता था. यही कारण है कि उनके करियर की करीब 150 फिल्मों में से 50 फ़िल्में तो ऐसी रहीं जिसमें उनके साथ एक या दो और नायक थे. लेकिन विनोद भीड़ में भी अपनी अलग और ख़ास जगह बनाने की कला को बखूबी जानते थे. उनकी जोड़ी उन अमिताभ बच्चन के साथ भी खूब जमी जिनके साथ उनकी प्रतियोगिता भी मानी जाती थी. ज़ाहिर है लोकप्रियता में अमिताभ बच्चन विनोद खन्ना से काफी आगे रहे. इसलिए जब भी ये दोनों साथ आते थे तो कई बार लगता था कि अमिताभ फिल्म में विनोद खन्ना से आगे निकल जायेंगे. लेकिन ऐसा कभी हो नहीं सका.

अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना ने रेशमा और शेरा से लेकर हेरा फेरी, खून पसीना, अमर अकबर एंथनी, ज़मीर,परवरिश और मुकद्दर का सिकंदर जैसी जो भी फ़िल्में कीं, विनोद कहीं भी अमिताभ से उन्नीस नहीं रहे.

पहली पत्नी से अलगाव से टूट गए थे

विनोद खन्ना के काम और व्यक्तित्व की बड़ी पहचान तब भी हुई जब सन 1980 के दौर में वह शिखर पर थे लेकिन एक दिन उन्होंने ओशो रजनीश से प्रभावित होकर फिल्म और परिवार दोनों से संन्यास ले लिया. वह सब कुछ छोड़ रजनीश आश्रम अमेरिका चले गए. लेकिन जब करीब 5 साल बाद वह वापस मुंबई लौटे तब उनका अपना परिवार तो बिखर चुका था. लेकिन उनके फिल्मकार दोस्तों ने उन्हें तब भी फिल्मों में काम देने में ज्यादा देर नहीं लगायी. हालांकि अपनी पत्नी गीतांजली से अलगाव के बाद वह टूट गए थे. उनके बेटे राहुल और अक्षय भी तब अपनी माँ के साथ ज्यादा खड़े नज़र आते थे. गीतांजली से 1985 में तलाक के बाद अपने एकाकीपन से विनोद खन्ना अपना मानसिक संतुलन भी कुछ हद तक खो चुके थे. लेकिन फिल्मों में फिर से काम और सफलता मिलने और फिर 1990 में कविता दफ्तरी से अपनी दूसरी शादी करने के बाद वह फिर से मुख्यधारा में लौट आये.

इसके बाद 1997 में वह भाजपा के सदस्य बन राजनीति में भी उतरे. भाजपा ने उन्हें उसी बरस गुरदासपुर से लोकसभा सीट का उम्मीदवार बनाकर चुनाव में उतारा तो वह विजयी हुए. कुछ लोगों ने कहा विनोद खन्ना एक बार तो जीत गए लेकिन वह आगे नहीं जीत पायेंगे. लेकिन उन्होंने सभी को गलत साबित करते हुए गुरदासपुर से पांच बार चुनाव लड़ते हुए चार बार चुनाव जीता. इस दौरान उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र में हवाई अड्डा बनवाने से लेकर फ्लाई ओवर ब्रिज और स्टेडियम बनवाने के कई बड़े काम किये. वह अभी भी गुरदासपुर से लोक सभा सदस्य थे. उम्मीद तो यह थी कि मोदी मंत्रिमंडल में भी वह मंत्री बनेंगे. लेकिन उन्हें इस बार मंत्री नहीं बनाया गया. उसके कुछ समय बाद उनका स्वास्थ्य भी खराब रहने लगा. हालांकि इस दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘एक थी रानी ऐसी भी’ में महाराजा जिवाजीराव की भूमिका की.

आखिरी एक्टिंग राजनीतिक फिल्म में

ग्वालियर की महारानी विजयाराजे सिंधिया की जिंदगी पर आधारित उनकी इस फिल्म में हेमा मालिनी उनकी पत्नी यानी विजयाराजे की भूमिका में हैं. इधर एक संयोग यह भी है कि फिल्म और राजनीति दोनों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले विनोद खन्ना कि ‘एक थी रानी ऐसी भी’ एक राजनीतिक फिल्म है. पिछले सप्ताह ही मुझे दिल्ली में जब इस फिल्म का प्रीमियर देखने का मौका मिला तो विनोद खन्ना को देखते हुए उनकी कई स्मृतियाँ सामने आती रहीं. इस दौरान जब मैंने इस फिल्म की लेखिका और गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा का इंटरव्यू किया तो मैंने उनसे भी विनोद खन्ना का हाल चाल पूछा. उन्होंने बताया कि विनोद खन्ना ने करीब पांच महीने पहले ही इस फिल्म की शूटिंग पूरी की थी. उन्होंने अंत में जिस दृश्य की शूटिंग की वह था जिवाजीराव की मौत का दृश्य. यानि अपने निधन से पहले अपने फिल्म अभिनय के अंतिम पड़ाव पर विनोद खन्ना ने जो दृश्य किया वह कुछ दिन बाद एक सत्य बन गया. लेकिन बेशक आज विनोद खन्ना हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी मेरे अपने, मेरा गाँव मेरा देश, हाथ की सफाई, दयाबांन. कुर्बानी, लेकिन, चांदनी, इम्तिहान, अनोखी अदा, बंटवारा, आपकी खातिर, शक, राजपूत, जुर्म, लहू के दो रंग, दबंग और दिलवाले सहित और भी कई फ़िल्में उन्हें अमर बनाये रखेंगी.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आकड़ें लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)
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