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केजरीवाल का धरना: संघर्ष बनाम ड्रामा की बहस के बीच कामयाब रही केजरीवाल की राजनीति

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उप-राज्यपाल कार्यालय में चल रहा अपना धरना मंलवार शाम खत्म कर दिया. केजरीवाल IAS अधिकारियों की कथित हड़ताल खत्म करवाने की मांग कर रहे थे. लगभग 9 दिन चले इस धरने ने खूब सुर्खियां बटोरी. धरने को लेकर कांग्रेस छोड़ समूचे विपक्ष ने केजरीवाल का समर्थन किया और केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोला. बीजेपी और कांग्रेस ने केजरीवाल के धरने को ड्रामा करार दिया. हालांकि कांग्रेस ने केजरीवाल के साथ-साथ बीजेपी को भी घेरने की कोशिश की. केजरीवाल के समर्थन में चार राज्यों के मुख्यमंत्री उनके घर पहुंचे लेकिन केजरीवाल को धरने के दौरान उप-राज्यपाल ने मिलने का वक्त नहीं दिया. सवाल यह उठता है कि केजरीवाल के धरने से दिल्ली की राजनीति पर क्या फर्क पड़ा? केजरीवाल ने ये धरना क्यों किया और उन्हें धरने से क्या हासिल हुआ? क्या उनकी मांगें मानी गईं? उनके मुद्दे का क्या हुआ? और वो आगे क्या करेंगे?

मांग, आरोप और असली मुद्दा केजरीवाल की मांग थी कि उप-राज्यपाल दिल्ली सरकार के अधिकारियों की हड़ताल खत्म कराएं. दूसरी मांग थी कि राशन की डोर स्टेप डिलिवरी योजना को उपराज्यपाल मंजूरी दें. रोचक यह है कि पहले दिन से अधिकारी ये कह रहे हैं कि वो हड़ताल पर नहीं हैं. हालांकि उनका ये भी कहना था कि सुरक्षा के मद्देनजर वो रूटीन बैठकों में नहीं जा रहे. सुरक्षा का सवाल इसलिए खड़ा हो गया क्योंकि 19-20 फरवरी की रात 12 बजे के मुख्यमंत्री आवास पर एक बैठक के दौरान मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मारपीट की गई. अधिकारी केजरीवाल से उस घटना पर खेद प्रकट करने की मांग को लेकर रोजाना लंच ब्रेक में 5 मिनट का मौन धारण कर विरोध जताते हैं. हालांकि केजरीवाल पिटाई की घटना से साफ इंकार करते हैं और उनका आरोप है कि ये सब उनकी सरकार के खिलाफ केंद्र की मोदी सरकार की साजिश है. इन दोनों मांगों के साथ केजरीवाल धरने के दौरान दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का मुद्दा उठाते रहे और उसे सारे झगड़े के निदान के तौर पर पेश करते रहे.

केजरीवाल का धरना: संघर्ष बनाम ड्रामा की बहस के बीच कामयाब रही केजरीवाल की राजनीति

IAS अधिकारियों के मैदान में आने से खेल बदला!

केजरीवाल का आरोप था कि उपराज्यपाल केंद्र के इशारे पर अधिकारियों की हड़ताल खत्म नहीं करवा रहे. केजरीवाल का दावा था कि इस वजह से दिल्ली में कोई काम नहीं हो रहा. शुरुआत में IAS असोसिएशन बयान जारी कर आरोपों का खंडन करता रहा लेकिन जब पानी सर के ऊपर चला गया तो उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोपों की धज्जियां उड़ा दी. IAS अधिकारियों ने प्रमाण के साथ बताया कि डोर स्टेप डिलिवरी की फाइल सरकार के पास ही है जिसमें अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं है. उन्होंने ये भी साफ किया कि मंत्रियों ने ना तो नालों की सफाई के लिए मीटिंग बुलाई ना ही चिकनगुनिया पर. अधिकारियों ने साफ किया कि मुख्यमंत्री के सामने आप विधायकों द्वारा की गई मुख्य सचिव की पिटाई के बाद से विश्वास बहाली के लिए मुख्यमंत्री की तरफ से कुछ नहीं किया गया.

धरना कैसे खत्म कर दिया?

IAS अधिकारियों की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद केजरीवाल के सुर अचानक नरम पड़ गए. उन्होंने ट्विटर पर अधिकारियों को आश्वासन देना शुरू किया. हालांकि तब भी केजरीवाल उप-राज्यपाल से मीटिंग बुलाने की मांग करते रहे. इस बीच धरने के दौरान 6 दिन से अनशन कर रहे दो मंत्री सत्येंद्र जैन और गोपाल राय रविवार और सोमवार को तबियत खराब होने के कारण अस्पताल में भर्ती हुए. दोनों ने मंगलवार से सचिवालय में काम संभाल लिया. सरकार द्वारा दावा किया गया कि अधिकारी मीटिंग में आ रहे हैं और शाम तक केजरीवाल ने धरना खत्म कर दिया.

जीत या समझौता?

आम आदमी पार्टी इसे अपनी 'जीत' बता रही है. दिलचस्प ये है कि ना तो मांगों के मुताबिक उपराज्यपाल ने अधिकारियों की कोई मीटिंग बुलाई ना ही अपने ऑफिस में धरना दे रहे केजरीवाल से मिले. यहां ये जानना जरूरी है कि केजरीवाल ने धरना सोमवार शाम LG से मीटिंग के बाद ही शुरू किया था. खैर केजरीवाल ने धरना खत्म कर दिया और फिर कार्यकर्ताओं से कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने तक लड़ाई जारी रहेगी. धरना खत्म होने के मौके पर राशन की डोर स्टेप डिलिवरी की योजना पर सब खामोश रहे जिसको लेकर पहले जमीन आसमान एक किया हुआ था. कई लोग ये भी मान रहे हैं कि जम्मू कश्मीर में BJP-PDP गठबंधन टूटने और महबूबा सरकार के गिरने की खबर के कारण केजरीवाल ने आनन-फानन में धरना खत्म कर दिया. हालांकि एक

दावा ये भी है केजरीवाल सरकार, अधिकारियों और केंद्र के बीच अंदरखाने बात बन गई और इसके बाद ही केजरीवाल ने धरना खत्म किया है. बहरहाल इस दावे में कितनी सच्चाई है ये आने वाले दिनों में खुद ही मालूम पड़ जाएगा क्योंकि अधिकारी अब भी यही कह रहे हैं कि वो हड़ताल पर नहीं थे. जहां तक मुख्य सचिव की पिटाई का मामला है, असोसिएशन ने उम्मीद व्यक्त की है कि अदालत से उन्हें न्याय मिलेगा. पहले इस पर मुख्यमंत्री से माफी की मांग की जा रही थी.

केजरीवाल का धरना: संघर्ष बनाम ड्रामा की बहस के बीच कामयाब रही केजरीवाल की राजनीति

मांगों का अब क्या होगा?

तो क्या केजरीवाल ने स्थिति को भांपते हुए अपनी मांगों पर समझौता कर लिया? दरअसल केजरीवाल को भी पता था कि उनकी मांगें धरने से पूरी नहीं होंगी. अधिकारियों में विश्वास बहाली किसी और को नहीं उन्हें खुद करना है और दूसरा राशन योजना की फाइल भी उन्हें ही सुधार कर उप-राज्यपाल को वापस भेजनी है. केजरीवाल का असली मकसद इन मुद्दों के जरिए दिल्ली सरकार के अधिकारों और दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे का मुद्दा उठाना था. हालांकि पहले जैसे संकेत थे उसके मुताबिक इसे थोड़ा और लम्बा खिंचना था लेकिन उससे पहले ही खत्म हो गया. बहरहाल इस धरने से केजरीवाल को जो हासिल करना था वो उससे ज्यादा हासिल कर चुके हैं.

मुद्दा मिल गया

इन सब के पीछे वजह आगामी लोकसभा चुनाव की लड़ाई है. केजरीवाल जानते हैं कि लोकसभा चुनाव के लिए उनके पास कोई मुद्दा नहीं है. अपनी गिरती लोकप्रियता और लोकसभा चुनाव में बीजेपी बनाम कांग्रेस के मुकाबले में उन्हें दिल्ली में तीसरे स्थान पर खिसकने का डर था. ऐसे में उन्हें मुद्दा चाहिए था जिसके जरिए वो सीधा बीजेपी को चुनौती देते हुए नजर आएं. केजरीवाल पूरी तरह इस मकसद में कामयाब रहे. आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह अपने नेता के धरने को कांग्रेस छोड़ समूचे विपक्ष का सर्मथन दिलाने में कामयाब रहे. धरने की टाइमिंग इतनी सटीक रही कि नीति आयोग की बैठक में शामिल होने आए चार मुख्यमंत्रियों ममता बनर्जी, कुमारस्वामी, चन्द्रबाबू नायडू, पिनराई विजयन ने उनके समर्थन में प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इन सब से केजरीवाल ने कांग्रेस को ना केवल पीछे छोड़ दिया बल्कि साथ ना देने के लिए विपक्षी एकता के सवाल पर कटघरे में भी खड़ा कर दिया. पूर्ण राज्य के दर्जे को केजरीवाल ना केवल बड़ा मुद्दा बनाने में कामयाब रहे बल्कि इस मुद्दे पर कांग्रेस और बीजेपी का मुंह बंद करने में भी.

कैडर जग गया 

लेकिन केजरीवाल की असली जीत ये भी नहीं है. उनकी असली जीत ये है कि धरने ने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को आंदोलन का नया मुद्दा दे दिया है. केजरीवाल अपने कैडर को जगाने में कामयाब हो गए हैं. रविवार को आम आदमी पार्टी ने शक्ति प्रदर्शन कर जाहिर कर दिया वो दिल्ली में सबसे बड़ी ताकत हैं. प्रदर्शन में संख्या के साथ साथ ऊर्जा भी नजर आ रही थी. ये अहम इसलिए है क्योंकि पहले पंजाब और फिर दिल्ली नगर निगम की हार के बाद आम आदमी पार्टी के कैडर का मनोबल टूटने लगा था. भ्रष्टाचार के आरोपों, पार्टी के आंतरिक झगड़ों, दो बाहरी लोगों को राज्यसभा भेजा जाना, कुमार विश्वास के किनारे हो जाने और केजरीवाल के नेताओं से माफी मांगने जैसी घटनाओं से आप कार्यकर्ताओं में जबरदस्त निराशा थी. लेकिन केजरीवाल के धरने और मंत्रियों के अनशन ने इन सभी नकारात्मक मुद्दों को पीछे धकेल कर कार्यकर्ता के मन में नए मुद्दे को स्थापित कर दिया है. आप के कार्यकर्ता फिर से गर्म हो चुके हैं और लोकसभा की लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं. जाहिर है, यही केजरीवाल का असली मकसद था जिसमें उन्हें कामयाबी मिली है. केजरीवाल ने एक बार फिर खुद को 'बेचारा' दिखाया. इससे जनता की सहानुभूति उन्हें मिल सकती है.

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बीजेपी-कांग्रेस ने क्या किया?

केजरीवाल के धरने के दौरान बीजेपी और कांग्रेस बुरी तरह कंफ्यूज दिखे. नेता विपक्ष विजेंद्र गुप्ता ने आप के बागी कपिल मिश्रा के साथ दिल्ली सचिवालय पर मुख्यमंत्री दफ्तर के सामने धरना और फिर अनशन शुरू किया. हालांकि उन्होंने सचिवालय से केजरीवाल पर खूब हमला बोला लेकिन उन्हें ना तो सुर्खियां मिलीं ना ही बीजेपी संगठन का समर्थन. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष को जाकर उनसे मिलने में एक हफ्ता लग गया. महत्वपूर्ण यही रहा कि कपिल मिश्रा खुल कर बीजेपी के साथ आ गए. हालांकि उन्हीं के नए- नए आईडिया की वजह से बीजेपी थोड़ी एक्शन में भी दिखी.

दूसरी तरफ कांग्रेस ने केजरीवाल के धरने को ड्रामा बताने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए उतारा लेकिन अपने सहयोगियों को यही बात नहीं समझा पाई. आखिर में कांग्रेस ने धरना पॉलिटिक्स के लिए आप और बीजेपी दोनों को कोसा और कहा कि दोनों मिले हुए हैं. इसके आगे उसके पास कोई रणनीति नहीं थी.

जनता तय करेगी संघर्ष या ड्रामा?

इन सब के बीच केजरीवाल को झटका हाई कोर्ट से भी लगा जब कोर्ट ने एक टिप्पणी में धरने पर सवाल उठा दिए. खैर अब तो मुख्यमंत्री ने धरना खत्म कर ही दिया है. आगे आम आदमी पार्टी दिल्ली को पूर्ण राज्य के मुद्दे पर हस्ताक्षर अभियान चलाएगी और उन्हें प्रधानमंत्री को भेजेगी. पिछले दस दिनों में उसने अपने संभावित लोकसभा उम्मीदवारों को लगातार सबसे आगे रखा है.

यानी भले ही केजरीवाल के LG ऑफिस के धरने के मुद्दों की हवा निकल गई लेकिन उनकी राजनीति कामयाब रही. लोकसभा चुनाव अभी दूर है लेकिन उन्होंने उसके लिए महौल और मुद्दा दोनों बना लिया है. लेकिन अंत में तय दिल्ली की जनता को करना है कि केजरीवाल उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं या उनके नाम पर कर रहे हैं ड्रामा!

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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