Explained: क्या बेहतर सड़कें, फ्लाईओवर और नए कंस्ट्रक्शन ही ट्रैफिक की जड़? सियोल ने दी बड़ी सीख
भारतीय शहरों में नए फ्लाईओवर, सड़क चौड़ीकरण और एक्सप्रेसवे का ऐलान होता है, लेकिन ट्रैफिक जाम कम कम नहीं होता है. अगर निजी वाहन बढ़ते रहेंगे तो ज्यादा सड़कें बनाने के बावजूद जाम खत्म नहीं होगा.

देश में पहली बार हुए नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे (NHTS) ने एक ऐसा आंकड़ा सामने रखा है, जो हर रोज ट्रैफिक में फंसने वाले हर शख्स की कहानी कहता है. जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच हुए इस सर्वे में देशभर के 14,274 गांवों और 10,377 शहरी ब्लॉक्स से 4,92,023 परिवारों और 20,34,371 लोगों से बात की गई. नतीजतन देश में सिर्फ 15% लोग बस, ट्रेन, मेट्रो, ऑटो जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट से काम पर जाते हैं. ऑटो और ई-रिक्शा हटा दें तो बड़े पब्लिक ट्रांसपोर्ट यानी बस, ट्रेन और मेट्रो की हिस्सेदारी सिर्फ 9% रह जाती है. वहीं दूसरी तरफ साउथ कोरिया की राजधानी सियोल है, जो भारत जैसी समस्या से गुजरा, लेकिन ऐसा रास्ता चुना जो भारत के लिए सबक है...
समस्या यह नहीं है कि लोगों को बाइक चलाना पसंद है. समस्या यह है कि उनके पास कोई और अच्छा विकल्प नहीं है. अगर बस 20 मिनट देर से आती है, मेट्रो स्टेशन 5 किलोमीटर दूर है और एक साधन से दूसरे साधन पर जाने के लिए अलग टिकट लेनी पड़े, तो आदमी अपनी बाइक ही निकालना पसंद करेगा. यही वजह है कि देश में सड़कें बढ़ने, फ्लाईओवर बनने और एक्सप्रेसवे खुलने के बाद भी जाम कम नहीं हो रहा.
अब सियोल की कहानी सुनिए...
सियोल की हालत कैसी थी?
1990 के दशक में सियोल की आबादी तेजी से बढ़ी और कारें भी. सिर्फ 1990 से 1995 के बीच सियोल में कारों की संख्या 10 लाख से 20 लाख हो गई यानी पांच साल में दोगुनी. सरकार ने सड़कें बढ़ाईं, मेट्रो लाइनें खींचीं, लेकिन जाम कम नहीं हुआ. 1996 से 2002 के बीच कारों की हिस्सेदारी 25% से बढ़कर 27% हो गई, जबकि बस की हिस्सेदारी 30.1% से गिरकर 26.9% हो गई.
मेट्रो का नेटवर्क बढ़ा, लेकिन उसमें चढ़ने वाले ज्यादातर वे लोग थे जो पहले बस से जाते थे. सियोल की 103 बस कंपनियों में से लगभग आधी बंद हो गईं. 2000 तक सियोल में सड़क घनत्व बीजिंग या शंघाई से तीन-चार गुना ज्यादा था, फिर भी जाम खत्म नहीं हुआ.
1 जुलाई 2004: एक तारीख जिसने सब बदल दिया
2002 में सियोल के मेयर ली म्युंग-बाक ने ऐलान किया कि सड़कें और नहीं बनाएंगे, बस व्यवस्था को नए सिरे से खड़ा करेंगे. दो साल की तैयारी हुई. डेटा इकट्ठा किया गया, लोगों के आने-जाने के पैटर्न का वैज्ञानिक विश्लेषण हुआ. फिर 1 जुलाई 2004 को पूरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था बदल दी गई.
- बस रूट्स का पूरा पुनर्गठन: 400 से ज्यादा बस रूट्स को तीन कैटेगरी में बांटा गया. ब्लू बसें लंबी दूरी की मुख्य सड़कों पर चलीं. ग्रीन बसें मेट्रो स्टेशनों तक फीडर का काम करने लगीं यानी छोटी दूरी की. रेड बसें एक्सप्रेस रूट्स बनीं, जो उपनगरों से सीधे शहर के बीच तक सीमित स्टॉप के साथ जाती थीं. पहले बस रूट्स इस तरह बने थे कि एक बस कई बार घूम-घूमकर आपको ऑफिस पहुंचाती थी. अब सीधा सिस्टम बना कि ग्रीन बस से मेट्रो तक, ब्लू बस से लंबी दूरी तक.
- बसों के लिए बीच की लेन: सियोल ने सड़क के बीचों-बीच बसों के लिए अलग लेन बनाईं, जिन्हें एक्सक्लूसिव मीडियन बस लेन कहा जाता है. यह लेन सिर्फ बसों के लिए थी. कोई कार, कोई ऑटो उसमें नहीं घुस सकता था. जुलाई 2004 में दोबोंग-मिया-रो, सुसेक-सियोंगसान-रो और गंगनाम-डेरो पर पहली लेन बनीं. फिर इसे हर साल औसतन 15 किलोमीटर बढ़ाया गया. 2014 तक 117.5 किलोमीटर मीडियन बस लेन तैयार थीं. जहां पहले बस की रफ्तार 11 किलोमीटर प्रति घंटा थी, वहां 20 किलोमीटर हो गई यानी 81.8% की बढ़ोतरी. पीक आवर में औसत बस स्पीड में लगभग 30% का सुधार हुआ.
- एक टिकट में पूरा सफर: 2004 से पहले बस का टिकट अलग, मेट्रो का अलग और टैक्सी का अलग था. सियोल ने 1 जुलाई 2004 को ऐसी व्यवस्था शुरू की जिसमें आप एक ही टिकट से पूरी यात्रा कर सकते थे. चाहे बस से मेट्रो पर जाएं, चाहे मेट्रो से बस पर. दूरी के आधार पर एक ही किराया लगता था. सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक 30 मिनट के भीतर ट्रांसफर करें तो दोबारा पूरा किराया नहीं देना पड़ता. रात 9 बजे से सुबह 7 बजे तक 1 घंटे तक का समय मिलता था. दिन में 4 बार तक ट्रांसफर पर छूट मिलती थी. इसके लिए T-money नाम का स्मार्ट कार्ड बनाया गया, जिसे बस, मेट्रो, टैक्सी सब जगह इस्तेमाल किया जा सकता था. दिसंबर 2004 तक स्मार्ट कार्ड का इस्तेमाल 88.9% तक पहुंच गया.
- फ्लाईओवर तोड़ना: सियोल ने 5.8 किलोमीटर लंबे चोंगग्येचोन एक्सप्रेसवे को तोड़ने का फैसला किया, जिस पर रोज 1,70,000 वाहन चलते थे. लोग डर रहे थे कि जाम बढ़ जाएगा, लेकिन उल्टा हुआ. एक्सप्रेसवे की जगह नदी बहाल की गई और उस रूट पर बस रैपिड ट्रांजिट (BRT) का नेटवर्क खड़ा किया गया. 2003 से 2008 के बीच बस यात्रियों की संख्या 15.1% और मेट्रो यात्रियों की 3.3% बढ़ी. डाउनटाउन की तरफ आने वाले ट्रैफिक में 9% की कमी आई. 2005 के पहले पांच महीनों में बस यात्रियों की संख्या रोज लगभग 10 लाख यानी 25% बढ़ गई, जबकि सेंट्रल सियोल से गुजरने वाले निजी वाहनों की संख्या 9.1% घट गई.
सियोल का आज क्या हाल है?
2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, सियोल के 91.5% लोग मेट्रो और बस का इस्तेमाल करते हैं. एक यात्रा में औसतन 1.24 बार ट्रांसफर करते हैं और 11.3 किलोमीटर का सफर 33.1 मिनट में पूरा करते हैं. 2024 में सियोल में रोज औसतन 686 लाख पब्लिक ट्रांसपोर्ट यात्राएं हुईं, यानी हर साल 34 अरब. सबसे बड़ी बात है कि सियोल में कारों की संख्या 2024 से घट रही है. अगस्त 2025 तक सियोल में 31.6 लाख रजिस्टर्ड कारें थीं, जो पिछले साल से 16,000 कम थीं.
भारत के लिए असली सबक क्या है?
भारत में महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मेट्रो और लोकल ट्रेन का इस्तेमाल शहरी कामगारों में 20.7% तक है, लेकिन राष्ट्रीय औसत सिर्फ 5% है. भारत के शहरों में कुल मिलाकर सिर्फ 47,650 बसें हैं, जिनमें से 61% सिर्फ नौ बड़े महानगरों में हैं.
दिल्ली में BRT को 2008 में शुरू किया गया था, लेकिन फीडर सर्विस, पार्किंग और दूसरी नीतियों के बिना इसे लागू किया गया, इसलिए यह कामयाब नहीं हो पाया. सियोल ने जो किया वह सिर्फ एक लेन बनाना नहीं था. उसने पूरा सिस्टम डिजाइन किया.
सियोल की सबसे बड़ी सीख यह है कि सिर्फ सड़कें बढ़ाना जाम का इलाज नहीं है. असली इलाज है तेज, सस्ता, सुविधाजनक और एकीकृत पब्लिक ट्रांसपोर्ट, जहां एक टिकट से पूरी यात्रा हो सके, बस और मेट्रो का जाल हर मोहल्ले तक पहुंचे और लोगों को यह भरोसा हो कि वे अपनी बाइक से ज्यादा आराम से और कम पैसे में ऑफिस पहुंच सकते हैं. भारत के पास यह मौका अभी है, लेकिन इसके लिए पहले यह मानना पड़ेगा कि सड़कें बनाना विकास नहीं, लोगों को बेहतर सफर देना विकास है.






















