हीरबाई नाम की जैनाबाद की नृतकी से औरंगजेब को बेइंतहा प्यार हो गया था. हीराबाई औरंगबेज की मौसी की दासी थीं.



एक बार औरंगजेब बुरहानपुर में जैनाबाद के बाग में सैर कर रहे थे, तभी उन्होंने हीराबाई को देखा, जो धीमे स्वर में गा रही थीं. औरंगजेब पहली नजर में ही हीराबाई को देखकर बेहोश हो गए थे.



यदुनाथ सरकार अपनी किताब मे लिखते हैं कि हीराबाई एक कश्मीरी हिंदू थीं, जिन्हें उनके माता-पिता ने बेच दिया था और वे गायिकी और नृत्य करने में निपुण थीं.



औरंगजेब ने जब अपनी मौसी को हीराबाई के बारे में बताया तो वह नााराज हो गई थीं.



मासर-अल-उमरा के अनुसार हीराबाई ने औरंगजेब को शराब पीने के लिए मजबूर किया, लेकिन आखिरी पल में जाम छीन लिया और कहा, 'मेरा मकसद तुम्हारे इश्क का इम्तिहान लेना था.'



रामानंद चटर्जी लिखते हैं कि औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह ने शाहजहां से शिकायत की थी कि इस पाखंडी की पारसाई देखिए, वह अपनी मौसी के घर की एक दासी के लिए बर्बाद हो रहा है.



मौलाना आजाद लिखते हैं कि हीरबाई की मृत्यु के बाद औरंगजेब काफी गमजदा हो गए थे. एक बार उन्होंने शिकार पर जाने का आदेश दिया और कहा, 'घर में रोने से तसल्ली नहीं मिली, जंगल में जी भरकर रो सकता हूं.'



निकोलाओ मनुची बताते हैं कि हीराबाई की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने कुछ समय तक नमाज पढ़ना छोड़ दिया था और संगीत व नृत्य में डूबे रहे.



हीराबाई की मौत के बाद औरंगजेब ने कसम खाई कि अब वह कभी शराब नहीं पीएंगे और न ही संगीत सुनेंगे.



औरंगजेब बाद में कहा करते थे कि खुदा ने हीरबाई को अपने पास बुला कर उनपर बाद एहसान किया है. औरंगजेब का मानना था कि अगर हीरबाई जिंदा होतीं तो उनकी हुकूमत करने की संभावनाओं को खतरा हो सकता था.