बादशाह जल्लालुद्दीन अकबर की 27 साल की उम्र तक कोई संतान नहीं थी, जिसकी वजह से वह काफी परेशान रहते थे. इसके लिए अकबर ने कई दरगाहों में मन्नत मांगी थी.



बादशाह अकबर को 1564 में जुड़वां बेटे हुए, हसन और हुसैन, लेकिन वे केवल एक महीने तक जीवित रहे.



इस दुख के चलते, अकबर ने अजमेर स्थित संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर मन्नत मांगी.



अकबर ने मोइनुद्दीन चिश्ती को वचन दिया कि यदि उन्हें पुत्र प्राप्ति होगी, तो वे आगरा से अजमेर तक पैदल चलकर दरगाह पर सिर झुकाएंगे.



इसी दौरान, उनके दरबारियों ने बताया कि आगरा के पास पहाड़ी पर पीर सलीम चिश्ती रहते हैं, जो उनकी मुराद पूरी कर सकते हैं.



जहांगीर पर एक किताब 'एन इंटिमेट पोर्ट्रेट ऑफ अ ग्रेट मुगल जहांगीर' लिखने वाली पार्वती शर्मा बताती हैं कि अकबर ने सलीम चिश्ती से पूछा, 'मेरे कितने बेटे होंगे?' संत ने उत्तर दिया, 'खुदा तुम्हें तीन बेटे देगा.'



उनके आशीर्वाद से, अकबर को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और सबसे बड़े पुत्र का नाम सलीम रखा गया, जिन्हें बाद में जहांगीर के नाम से भी जाना गया.



पार्वती शर्मा लिखती हैं, अकबर ने एक बार पूछा, 'आप कब तक इस दुनिया में रहेंगे?' चिश्ती ने जवाब दिया, 'जब सलीम पहली बार कोई चीज़ याद करके दोहराएंगे'.



यह भविष्यवाणी सच हुई, और जैसे ही सलीम ने पहली बार कोई चीज़ दोहराई, शेख सलीम चिश्ती की तबीयत बिगड़ने लगी और उनका देहांत गया.