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क्या अहमद पटेल की कमी महसूस कर रही है कांग्रेस? बेटी मुमताज़ ने कहा- ‘सिर्फ नेता नहीं स्टेट्समैन थे पिता’

एबीपी न्यूज़ से कई नेताओं ने कहा कि अगर आज कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के पूर्व राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ज़िन्दा होते तो पंजाब समेत किसी भी राज्य में इस कदर संकट का सामना ना करना पड़ता.

नई दिल्ली:  पंजाब में गहरी समस्या से जूझ रही कांग्रेस को देख पार्टी के कई नेताओं को स्वर्गीय अहमद पटेल की कमी खलती रही है. एबीपी न्यूज़ से कई नेताओं ने कहा कि अगर आज कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के पूर्व राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ज़िन्दा होते तो पंजाब समेत किसी भी राज्य में इस कदर संकट का सामना ना करना पड़ता.

एबीपी न्यूज़ ने की अहमद पटेल की बेटी से खास बातचीत

एबीपी न्यूज़ ने अहमद पटेल की शख्सियत और उनके काम करने के अंदाज़ के बारे में उनकी बेटी मुमताज़ पटेल से बात की तो मुमताज़ ने कहा, "सरलता, सहजता, बड़ा दिल और सबके लिए हमेशा उपलब्ध रहना पिता अहमद पटेल के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताए थीं. वे बिना थके निस्वार्थ भाव से काम किया करते थे, यही वजह है कि उनकी बात सभी सुना करते थे." मुमताज़ ने आगे कहा, "अहमद पटेल कभी व्यक्तिगत फायदे के लिए कुछ नहीं किया करते थे और वो एक नेता से ज़्यादा एक स्टेट्समैन थे." मुमताज़ ने ये भी बताया कि उनके पिता अहमद पटेल हमेशा कहा करते थे कि आपको अपने आचरण में हमेशा ठहराव रखना चाहिए और बदले की भावना से कुछ नहीं करना चाहिए.

पिता अहमद पटेल के बारे में बात करते हुए उनकी बेटी मुमताज़ पटेल ने उनपर एक शेर भी पढ़ कर सुनाया "नज़र नज़र में उतरना कमाल होता है, नफ़स नफ़स में बिखरना कमाल होता है, बुलंदी पे पहुंचना कोई कमाल नहीं, पर बुलंदी पे ठहरना कमाल होता है."

जीवित होते तो पंजाब की स्थिति को संभाल लेते अहमद पटेल

कांग्रेस में कई नेताओं का मानना है कि जिस तरह से पंजाब में परिवर्तन का फैसला किया गया, कैप्टन अमरिन्दर सिंह को हटाया गया, नवजोत सिंह सिद्धू को राज्य इकाई की कमान दी गई और फिर जिस तरह सिद्धू ने अचानक इस्तीफा भेजकर पार्टी की किरकिरी कराई, अगर अहमद पटेल जीवित होते तो इस स्थिति को बेहतर तरीके से संभालते और इस कदर पार्टी का छीछा-लेदर नहीं हुआ होता.

अहमद पटेल के कार्यकाल में ऐसे कई मौके आए, जब उन्होंने मुश्किल से मुश्किल राजनीतिक परिस्थितियों को बहुत हीं सहजता से सुलझा दिया था. अहमद पटेल के लंबे राजनीतिक अनुभव और उनके सौम्य स्वभाव की वजह से केवल कांग्रेस हीं नहीं बल्कि सहयोगी दलों और विरोधी पार्टियों में भी उनकी खासी इज्ज़त थी. उनके प्रति इसी सम्मान के बनिसपत उन्होंने सोनिया गांधी और गांधी परिवार के लिए कई राजनीतिक महलों को सरलता से सुलझाया. सबसे हाल की बात करें तो राजस्थान में सचिन पायलट के बगावत के वक्त भी अहमद पटेल ने हीं पायलट और अशोक गहलोत दोनों से बातचीत कर सरकार पर गहरा रहे संकट को सुलझाया था. पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी भी अहमद पटेल के साथ मिलकर हीं पायलट को मना सकी थीं.

महाराष्ट्र में सरकार गठन पर निभाई अहम भूमिका

वहीं महाराष्ट्र में भी सरकार गठन को लेकर जब शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाने या ना बनाने का फैसला करने की नौबत आई, तब मुंबई में उद्धव ठाकरे से हुई उनकी अहम मुलाकात के बाद हीं कांग्रेस ने एनसीपी के स्तर मिलकर शिवसेना के नेतृत्व में सरकार में शामिल होने का मन बनाया था. जब सवाल विधायकों की संख्या को लेकर उठा था तब भी एनसीपी प्रमुख शरद पवार के साथ मिलकर अहमद पटेल ने हीं नइया पार्टी लगाई थी. पार्टी के वरिष्ठ नेता कमलनाथ के साथ सोनिया गांधी ने अहमद पटेल को हीं महाराष्ट्र भेजा था.

कहा जाता है कि यूपीए-लेफ्ट सरकार के वक्त भारत-अमेरिकी परमाणु करार को लेकर जब लेफ्ट फ्रंट ने सरकार से समर्थन वापस लिया था तो वो अहमद पटेल हीं थे, जिन्होंने समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और तत्कालीन प्रभावशाली महासचिव स्वर्गीय अमर सिंह से बात कर समाजवादी पार्टी को मनमोहन सरकार के समर्थन के लिए राज़ी किया था. ये अहमद पटेल हीं थे जिनकी पहल पर सपा-बसपा और लेफ्ट और ममता बनर्जी एक वक्त पर एक साथ यूपीए सरकार को सहयोग दे रहे थे.

बता दें कि देवेगौड़ा की सरकार बनाने के समय भी गठबंधन बनाने का सारा काम अहमद पटेल के दिल्ली स्थित तत्कालीन सरकारी निवास पर ही हुआ था. यही नहीं अहमद पटेल की भूमिका नरसिम्हा राव के समय में भी काफी अहम थी. सीताराम केसरी को हटा सोनिया गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने का भी बड़ा श्रेय अहमद पटेल को हीं जाता है. ज़रूरत पड़ने पर उस वक्त अहमद पटेल ने हीं एक नही बल्कि दो बार कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलवाई थी.

कांग्रेस कार्यसमिति में चुनाव लड़कर कर रिकार्ड वोटों से जीत कर सदस्य बने थे पटेल

कम लोगों को याद होगा कि अहमद पटेल पहली बार कांग्रेस कार्यसमिति में चुनाव लड़कर कर रिकार्ड वोटों से जीत कर सदस्य बनें थे. साल 2017 में गुजरात में हुए राज्य सभा चुनाव के वक्त भी अहमद पटेल ने अकेले दम पर अमित शाह को राजनीतिक तौर पर शिकस्त देकर अपना चुनाव आखिरकार जीत लिया था, जबकि कहा जाता है कि उस वक्त अहमद पटेल को वो राज्यसभा चुनाव हराने के लिए बीजेपी ने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया था.

पीएम मोदी की थी अहमद पटेल से दोस्ती

अहमद पटेल के बारे में आज कांग्रेस के भीतर बहुत से नेता कहते हैं कि वो बहुत हीं सूक्ष्म तरीके से काम किया करते थे और किसी भी विवाद के निपटारे में अगर एक के हक में कोई तात्कालिक कदम उठाते भी थे तो दूसरे को कुछ और महत्वपूर्ण देकर मसले को प्यार से सुलझा लिया करते थे. कई नेताओं का मानना है कि अहमद पटेल के लंबे राजनीतिक अनुभव और उनके स्वभाव की वजह से हीं तकरीबन सभी नेता उनकी बात मान लिया करते थे और अगर आज अहमद पटेल जीवित होते तो संभवतः वो कैप्टन अमरिन्दर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच भी सुलह करा लेते और पंजाब में पार्टी की किरकिरी होने से बचा लेते.

अहमद पटेल से अपनी दोस्ती के बारे में खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी सार्वजनिक बयान दे चुके हैं. ये बात और है कि अपनी पार्टी के भीतर हीं विवाद को दरकिनार करने के लिए अहमद पटेल ने प्रधानमंत्री मोदी के बयान का खंडन कर दिया था.

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