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(Source: ECI/ABP News)

चीन के 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' के मुकाबले भारत का 'डायमंड नेकलेस'

चीन ने बीते एक दशक में भारत को दक्षिण एशिया तक सीमित करने और उसकी घेराबंदी के लिए रणनीतिक ठिकाने बनाए तो वहीं नई दिल्ली ने भी बीते कुछ दिनों में मुकाबले के लिए अपनी एक्ट-ईस्ट नीति में सामिरक समझौतों के सहारे लामबंदी चुस्त की है.

नई दिल्लीः बेल्ट और रोड के बहाने अपनी आर्थिक दादागिरी और रणनीतिक मोर्चेबंदी के चीनी खेल की कलई अब खुलने लगी है. एक-एक कर बंदरगाह और ठिकाने बनाने के ड्रैगन के दांव के खिलाफ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चुनौती भी मजबूत हो रही है. चीन ने बीते एक दशक में भारत को दक्षिण एशिया तक सीमित करने और उसकी घेराबंदी के लिए रणनीतिक ठिकाने बनाए तो वहीं नई दिल्ली ने भी बीते कुछ दिनों में मुकाबले के लिए अपनी एक्ट-ईस्ट नीति में सामिरक समझौतों के सहारे लामबंदी चुस्त की है. यानी चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स से मुकाबले को भारत ने भी बीजिंग के गले के लिए डायमंड नेकलेस तैयार कर लिया है.

स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स क्या है और आखिर किस तरह इसकी काट के लिए भारत ने डायमंड नेकलैस तैयार किया?

क्या है चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स

एशिया के अखाड़े में अपने सबसे प्रतिस्पर्धी भारत को घेरने के लिए चीन ने बीते कुछ सालों में अपने हिंद महासागर क्षेत्र में अपने रणनीतिक ठिकानों की एक श्रृंखला खड़ी कर दी. इसमें पाकिस्तान के ग्वादर, म्यांमार में सिट्वे, श्रीलंका के हम्बन टोटा, बांग्लादेश में चिटगांव जैसे बंदरगाहों और द्वीप राष्ट्र मालदीव में अपने ठिकाने बनाए. इसके अलावा अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के सहारे चीन ढांचागत निर्माण के बहाने रणनीतिक पहुंच का नेटवर्क मध्य एशिया और अफ्रीका तक बढ़ा रहा है. कहने को चीन इन ठिकानों को हिंद महासागर से गुजरने वाले अपने समुद्री कारोबार की हिफाजत की जरूरत बताता है. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जिबूती जैसे अफ्रीकी मुल्क में बना उसका सैन्य ठिकाना हिंद महासागर में भारत के लिए फिक्र का सबब जरूर बढ़ाता है.

भारत का डायमंड नेकलेस चीन की इस अघोषित पर्ल्स ऑफ स्ट्रिंग घेराबंदी से मुकाबले को भारत भी पलटवार में नेकलेस ऑफ डायमंड की रणनीतिक पर काम तेज कर चुका है. इस कड़ी में चीन के पड़ोसी मुल्कों के साथ रणनीतिक साझेदारी और सैन्य सहयोग समझौतों की श्रृंखला खड़ी कर भारत ने भी जवाबी मोर्चाबंदी मजबूत की है. इसमें इंडोनेशिया के सबांग द्वीप, सिंगापुर को चांगी बंदरगाह, ओमान के दाकाम, ईरान के चाबहार, वियतमान के साथ रक्षा सहयोग और मंगोलिया के लैंड पोर्ट पर साझेदारी के समझौतों को मुकर्रर किया है.

1. हिंद महासागर के छोटे मगर अहम देश सिंगापुर के साथ समझौते के बाद भारतीय नौसेना के युद्धपोत चांगी बंदरगाह पर न केवल ईंधन हासिल कर सकेंगे बल्कि जरूरत पड़ने पर सामरिक मदद भी हासिल कर सकेंगे.

2. ओमान औऱ भारत के बीच फरवरी 2018 में हुए समझौते के बाद दकम बंदरगाह पर सैन्य युद्धपोतों को रसद हासिल करने और अन्य ठिकानों पर भारतीय वायुसेना के विमानों को ईंधन की सुविधा मिलना शुरु हो चुकी है.

3. जून 2018 में पीएम नरेंद्र मोदी की सेशल्स यात्रा के दौरान हुए करार के मुताबिक असम्पशन द्वीप को एक नौसैनिक अड्डे के तौर पर विकसित करने में भारत हिंद महासागर के इस पड़ोसी मुल्क की मदद करेगा.

4. इंडोनेशिया भी भारत के साथ नौसैनिक सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए है. इस कड़ी में इंडोनेशिया के सबांग द्वीप पर भारतीय नौसैनिक युद्धपोत मदद हासिल कर सकेंगे.

5. चीन के पड़ोसी मंगोलिया, जिसके पास कोई समुद्री सीमा नहीं है, के साथ एअर कॉरिडोर शुरु करने की भी भारत तैयारी कर रहा है.

6. चीन के एक अन्य पड़ोसी ताजिकिस्तान के अयनि में भारत पहले ही युद्धक विमान संचालन में सैन्य मदद दे रहा है.

जानकारों के मुताबिक एक्ट ईस्ट नीति में भारत की तरफ से किए गए रणनीतिक समझौते एक व्यापक ढांचा तैयार करते हैं जो चीन के विस्तारवादी मंसूबों पर ब्रेक लगाने के साथ ही कई मुल्कों को विकास का वैकल्पिक मॉडल भी मुहैया कराता है. विदेश मंत्रालय में एक्ट-ईस्ट नीति को लंबे समय तक संभाल चुके वरिष्ठ राजनयिक अनिल वाधवा कहते हैं कि भारत ने बीते कुछ समय में ओमान, इंडोनेशिया, सिंगापुर समेत कई मुल्कों में जो रणनीतिक समझौते किए हैं उनसे भारतीय नौसेना की पहुंच बढ़ती है. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान भी दोनों देशों के बीच जहां रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी वहीं दोनों देशों ने 2+2 वार्ता और एक-दूसरे की नौसेनाओं को अपने बंदरगाहों पर लॉजिस्टिक सुविधाएं मुहैया कराने वाले समझौते पर बातचीत की कवायद शुरु की है. हालांकि अब जरूरत है कि एक व्यापक रणनीति के तौर पर इस सहमति को आपसी कारोबार को बढ़ाकर मदद दी जाए.

भारतीय नौसेना में रह चुके सी उदयभास्कर जैसे रणनीतिक विशेषज्ञ भी भारत की ओर से एक्ट ईस्ट नीति की कड़ी में हुई साझेदारियों को सही दिशा में उठाया कदम करार देते हैं. इससे भारत को एक रणनीतिक आश्वासन हासिल होता है. हालांकि उनका कहना है कि हिंद महासागर से गुजरने वाले अपने कारोबारी जहाजों की हिफाजत के लिए चीन के पास जिबूती, सित्वे, ग्वादर जैसे बंदरगाहों पर मौजूदगी बनाने की वजह भी है और साधन भी. जबकि भारत के पास सुदूर इलाकों में जाने की फिलहाल ऐसी कोई ठोस वजह नहीं है. ऐसा में देखना होगा कि भारत अपनी भूमिका के विस्तार को किस सीमा तक ले जाना चाहता है.

हिंद-प्रशांत की चतुर-चौकड़ी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में डैने फैला रहे चीनी ड्रैगन को रोकने के लिए भारत के साथ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की भी चौकड़ी बनाई है. ये सभी वो देश हैं जिन्हें चीन के विस्तारवादी मंसूबों से परेशानी है. वहीं इस चौकड़ी की छाया में इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम समेत दस दक्षिण पूर्व एशियाई मुल्कों का आसियान कुनबा भी ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहा है.

जापान और भारत की साझेदारी एशिया से लेकर अफ्रीका तक अपने पैर पसारने में लगे चीन की रफ्तार पर ब्रेक लगाने में भारत और जापान की दोस्ती एक मजबूत मोर्चा बनकर उभरी है. बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की मुलाकात के दौरान दोनों देशों ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए साझा रणनीति के कई अहम फैसलों पर मुहर लगाई. इस कड़ी में जापान जहां भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में कई बड़ी सड़क परियोजनाओं में साझेदार होगा वहीं दोनों मुल्क श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और अफ्रीका के कई देशों में साझा योजनाओं पर मिलकर काम करेंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी पीएम शिंजो आबे की शिखर वार्ता के बाद दोनों नेताओं ने मुक्त और अबाध हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए मिलकर काम करने का संकल्प जताया. मोदी और आबे ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझेदारी की ठोस परियोजना के लिए अमेरिका समेत अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर काम करने का भी फैसला किया. महत्वपूर्ण है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन के लिए ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ मिलकर भारत व जापान क्वॉ़ड का गठन पहले ही कर चुके हैं.

पीएम मोदी की जापान यात्रा के दौरान भारत और जापान ने नौसैनिक सहयोग बढ़ाने के समझौते पर दस्तखत भी किए. इसके तहत भारतीय नौसेना और जापान की मेरिटाइम सेल्फ डिफेंस फोर्स समुद्री सूचनाएं अधिक सक्रियता से साझा करेंगे. रणनीतिक संवाद बढ़ाने के लिए भारत और जापान 2+2 वार्ता भी करेंगे. यह एशिया के किसी देश के साथ भारत की विदेश व रक्षा मंत्री स्तर संयुक्त संवाद की पहली कवायद होगी. महत्वपूर्ण है कि इससे पहले भारत और अमेरिका 2+2 फॉर्मेट पर पहले ही आगे बढ़ चुके हैं.

सैन्य और रणनीतिक सहयोग के लिए भारत और जापान एक्वीजिशन एंड क्रॉस सर्विसिंग एग्रिमेंट के लिए भी वार्ता प्रक्रिया शुरु करेंगे. दोनों प्रधानमंत्रियों की वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में भारत और जापान ने इसका ऐलान किया. इस समझौते के सहारे भारत को जपानी सैन्य ठिकानों पर अपने विमानों व युद्धपोतों के लिए भोजना, सामाग्री आपूर्ति के साथ ही जरूरत पड़ने पर गोला-बारूद की आपूर्ति भी सुनिश्चत हो सकेगी. अगस्त 2018 में भारत आए जापानी रक्षा मंत्री ने अपनी भारतीय समकक्ष के साथ इस समझौते के बाबत प्रारंभिक वार्ता भी की थी.

द्विपक्षीय सहयोग के साथ ही भारत और जापान ने अपनी साझेदारी को अन्य देशों में ले जाने का भी ऐलान किया. इताना ही नहीं दोनों मुल्कों ने अपने इस सहयोग मॉडल को विवादों से घिरे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से अलग बताते हुए कहा कि इसमें मुक्त, पारदर्शी तरीके से और राष्ट्रीय संप्रभुताओं का सम्मान करते हुए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ढांचागत परियोजनाओं का निर्माण किया जाएगा. इसके लिए भारत की एक्ट ईस्ट नीति और अफ्रीका के लिए 10 सूत्रीय सहयोग सिद्धांत और जापान के सतत सहयोग कार्यक्रम के बीच भी तालमेल बैठाया जाएगा.

एशिया से लेकर अफ्रीका तक साझेदारी इस कड़ी में भारत और जापान ने श्रीलंका में एलएनजी संबंधी ढांचागत विकास के लिए साझेदारी करने का ऐलान किया. साथ ही दोनों देश रोहिंग्या शरणार्थी समस्या से जूझ रहे राखाइन प्रांत में घरों के निर्माण, शिक्षा व विद्युतिकरण के लिए भी मिलकर काम करेंगे. बांग्लादेश में दोनों देश मिलकर रामगढ़-बराईयारहत के बीच पुलों का पुनर्निर्माण व जमुना नदी के ऊपर पुल के निर्माण में साझा सहयोग देंगे. वहीं अफ्रीकी देश कीनिया में भारत और जापान मिलकर कैंसर अस्पताल के निर्माण व छोटे व मझौले उद्योग क्षेत्र को बढ़ाने की योजना पर साथ काम करेंगे.

सरकारी स्तर पर ही नहीं बल्कि दोनों देशों के उद्योगों के बीच भी साझेदारी आगे बढ़े इसके लिए भारत और जापान संयुक्त उद्योग प्लेटफॉर्म विकसित करेंगे ताकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र व अफ्रीका में औद्योगिक गलियारे और नेटवर्क विकसित किए जा सकें.

पूर्वोत्तर विकास परियोजनाओं में जापानी मदद दक्षिण पूर्व एशिया के साथ साझेदारी का गलियारा मजबूत करने की कवायद में भारत की पूर्वोत्तर विकास परियोजनाओं में भी जापान ने मदद की घोषणा की है. इस सिलसिले में जापान पूर्वोत्तर भारत के मेघालय में तुरा-ढालू ( NH-51) शिलांग-दावकी (NH-40) राजमार्ग परियोजनाओं के विकास में मदद करेगा. इसके अलावा आईजॉल-तुईपांग (NH-54) के निर्माण में सहायता के साथ ही जापान असम में धुबरी / फुलबा़ड़ी सेतु परियोजना में भी सहयोग करेगा जो पूरा होने पर भात की सबसे बड़ा पुल होगा. महत्वपूर्ण है कि यह सभी वो परियोजनाएं हैं जो न केवल सीमा क्षेत्र में भारत को ढांचागत मजबूती देने वाली हैं बल्कि चीन के खिलाफ नाकेबंदी को ताकत देने वाली हैं. पूर्वोत्तर भारत में अपने पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी जापान की मौजूदगी को लेकर चीन अपनी नाखुशी का इजहार भी कर चुका है. हालांकि जापान के साथ यह साझेदारी पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में भारतीय ऐतराज के बावजूद बेल्ट एंड रोड परियोजान में चीन की ढिठाई का रणनीतिक जवाब भी है.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत और जापान की इस व्यापक साझेदारी को जहां अमेरिका का समर्थन हासिल है वहीं क्षेत्रीय स्तर पर भी कई मुल्क इसे चीनी दबंगाई से मुकाबले का कारगर तरीका मान रहे हैं. खासतौर पर दक्षिण पूर्व एशिया के कई मुल्कों से लेकर मध्य एशिया तक कई देशों में ढांचागत विकास के नाम पर बढ़ाई जा रही बेल्ट एंड रोड परियोजना पर सवाल उठ रहे हैं. हाल ही में मलेशिया, बांग्लादेश, नेपाल समेत कई मुल्कों ने चीनी कंपनियों को दिए ठेकों को अनियमितता के चलते रद्द कर दिया था. यहां तक कि चीन के हर मौसम दोस्त और एहसानों तले दबे पाकिस्तान में भी बेल्ट एंड रोड परियोजना में चीनी दादागिरी को लेकर परेशानी बढ़ती जा रही है. इस तनाव का अक्सर निर्माण परियोजनाओं पर काम कर रहे चीनी इंजीनियरों को पाकिस्तान में हमलों की शक्ल में झेलना पड़ता है.

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