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BJP Foundation Day: चुनाव में जनता पार्टी की हार, RSS पर तकरार...जानिए किस तरह जनसंघ से BJP का हुआ जन्म

BJP Foundation Day History: बीजेपी की स्थापना 6 अप्रैल, 1980 को हुई थी. इसके संस्थापकों में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता शामिल थे.

BJP Foundation Day 2024: देश में 1980 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा. हार के बाद जनता पार्टी के दिग्गज नेताओं में से एक जगजीवन राम ने एक चिट्ठी लिखी, जिसमें हार के लिए जनसंघ को दोषी ठहराया गया. 'बाबूजी' के नाम से जाने जाने वाले जगजीवन की इस चिट्ठी की वजह से भारतीय राजनीति में एक ऐसी पार्टी का उदय हुआ, जिसने न सिर्फ चुनाव जीता, बल्कि आगे चलकर कई कीर्तिमान बनाए. 

दरअसल, हम जिस पार्टी की बात कर रहे हैं, वो है भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी, जिसकी स्थापना आज ही के दिन 6 अप्रैल, 1980 को हुई थी. बीजेपी आज अपना 44वां स्थापना दिवस बना रही है. 1984 के चुनाव में बीजेपी ने दो सीटों के साथ अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की और आज पार्टी 370 प्लस सीटें जीतने के दम भरते हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में उतर रही है. ऐसे में आइए जानते हैं कि किस तरह जनता पार्टी की हार के बाद बीजेपी का जन्म हुआ.

जनसंघ की स्थापना और चुनावी हार के बाद जगजीवन की चिट्ठी

बीजेपी की स्थापना को समझने के लिए आपको इतिहास में थोड़ा सा पीछे जाने की जरूरत है. तारीख थी-21 अक्टूबर, 1951, जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बलराज मधोक और दीनदयाल उपाध्याय ने जनसंघ की स्थापना की. आने वाले दो ढाई दशक तक पार्टी को चुनाव में ठीक-ठाक सफलता भी मिली. आम चुनाव में पार्टी के जरिए जीती जाने वाली सीटों की संख्या डबल डिजिट में रही. फिर 1975 में लागू हुई इमरजेंसी ने जनसंघ को पूरी तरह से बदलकर रख दिया. 

हुआ कुछ यूं कि इमरजेंसी के खत्म होने पर कांग्रेस से टूटकर निकले नेताओं ने जनता पार्टी बनाई और इसमें जनसंघ को भी साथ ले लिया गया. 1977 के चुनाव में कामयाबी भी मिली. हालांकि, जनता पार्टी की सरकार दो साल ही चल पाई और 1979 में गिर गई. एक साल बाद 1980 में लोकसभा चुनाव हुए और इसमें जनता पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा. चुनावी शिकस्त के बाद जगजीवन राम ने पत्र लिखकर हार के लिए जनसंघ को दोषी ठहराया. 

आरएसएस छोड़ने को लेकर हुआ टकराव

वहीं, जगजीवन राम के हार का दोष मढ़ने से आहत होकर जनसंघ के नेता लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी ने अब आगे के लिए अपनी अलग राह बनानी शुरू कर दी. जनसंघ पर जनता पार्टी ने अंतिम फैसले के लिए 4 अप्रैल, 1980 को बैठक बुलाई. दूसरी ओर आडवाणी और वाजपेयी ने घोषणा कर दी कि 5 और 6 अप्रैल को जनसंघ की एक रैली होगी. बैठक में वही हुआ, जिसकी उम्मीद वाजपेयी और आडवाणी ने लगाई थी. 

जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में निर्णय हुआ कि पार्टी का कोई सदस्य अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से नहीं हो सकता है. जनसंघ का लगभग हर बड़ा नेता आरएसएस से जुड़ा हुआ था. इस संदर्भ में जब वोटिंग हुई 14 के मुकाबले 17 वोट पड़े. अब जनसंघ ने आरएसएस छोड़ने की बजाय पार्टी को छोड़ने का फैसला कर लिया था. जनता पार्टी की बैठक में हुए फैसले को जनसंघ के खिलाफ 'सांकेतिक निष्कासन' माना जा रहा था. 

दिल्ली में हुआ नई पार्टी बनाने का ऐलान

वहीं, 5 अप्रैल 1980 का दिन था, दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में जनसंघ ने एक बैठक की. उस बैठक में करीब 1500 लोगों के आने की उम्मीद थी, लेकिन 3,683 प्रतिनिधि शामिल हुए. इस बैठक में सबसे खास और ध्यानाकर्षण का केंद्र मंच था, जहां महात्मा गांधी और जय प्रकाश नारायण के साथ दीनदयाल उपाध्याय की तस्वीर लगी हुई थी. 

फिरोजशाह कोटला के मंच पर जो लोग भी मौजूद थे, उनमें ऐसे लोग भी थे जो आरएसएस से संबंधित नहीं थे. इनमें वकील शांतिभूषण और राम जेठमलानी के साथ मुस्लिम नेता सिकंदर बख्त थे. इसी मंच पर लालकृष्ण आडवाणी ने एक नई पार्टी बनाने की घोषणा कर दी. 

RSS छोड़ने के बजाय पार्टी के गठन पर संघ ने जताया था आभार

दिल्ली में 6 अप्रैल, 1980 की शाम नई पार्टी के नाम की घोषणा कर दी गई. जनसंघ की जगह खुद को जनता पार्टी का उत्तराधिकारी बताने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए इस पार्टी को नाम दिया गया- भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा (बीजेपी). नई पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर वाजपेयी ने 6 अप्रैल को मंच से भाषण दिया और कहा, "लोगों ने जनता पार्टी के नेताओं के व्यवहार के खिलाफ वोट दिया था."

आरएसएस को छोड़ने की बजाय नई पार्टी के गठन पर संघ ने वाजपेयी और आडवाणी का आभार जताया. हालांकि दोनों ही मझे हुए नेता थे और अटल बिहारी वाजपेयी तो 1957 से ही चुनाव लड़ते आ रहे थे. तब उन्होंने उत्तर प्रदेश की बलरामपुर लोकसभा सीट से पहला चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज की थी. 13 अप्रैल 1980 को संघ से जुड़े ऑर्गेनाइजेर के संपादकीय में लिखा गया, "कई लोग इसे जनसंघ का नाम देना चाहेंगे, लेकिन नई पार्टी के लिए नया नाम ही उचित था."

(बीजेपी की स्थापना का ये किस्सा विनय सीतापति की किताब 'जुगलबंदी' से लिया गया है)

यह भी पढ़ें: कौन थे बीजेपी के इकलौते मुस्लिम फाउंडर सिकंदर बख्त? जानिए कैसे थामा पार्टी का साथ

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