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कहानी उस दिव्य राजवंश की जहां जन्मे प्रभु श्रीराम, क्यों इसका नाम पड़ा 'इक्ष्वाकु कुल’, ’सूर्य वंश’ और ‘रघुकुल’

’इक्ष्वाकु’ और ‘रघुकुल’ वंश (वह दिव्य राजवंश जहां भगवान राम ने अवतार लिया था). लेकिन क्यों इस वंश को ’इक्ष्वाकु कुल’, ’सूर्य वंश’ और ‘रघुकुल’ के नाम से संबोधित किया जाने लगा? आइये जानते हैं

जिस कुल में श्रीराम का जन्म हुआ, उसकी शुरुआत होती है ब्रह्मा जी से, उनके पुत्र मरीचि, उसके पश्चात मरीचि के पुत्र कश्यप, उसके पश्चात कश्यप के पुत्र सूर्य देव (इसी कारण इसे सूर्य वंश कहते हैं). उसके पश्चात सूर्य के पुत्र मनु हुए.

इक्ष्वाकु कुल का जन्म

मनु की छींक से राजा इक्ष्वाकु का जन्म हुआ. एक बार राजा मनु को छींक आ गयी थी और उस छींक से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम ‘इक्ष्वाकु' रखा गया था. इस पूरे राजवंश का इतिहास बहुत ही रोचक है. उनके वंशजों में युवनाश्व नामक राजा हुए. महाभारत वन पर्व, अध्याय क्रमांक 126 अनुसार, इक्ष्वाकु वंश में युवनाश्व नाम से प्रसिद्ध एक राजा थे.

युवनाश्व ने प्रचुर दक्षिणा वाले बहुत सारे यज्ञ–अनुष्ठान किए थे. वे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ थे. उन्होंने एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करके बहुत दक्षिणा के साथ दूसरे श्रेष्ठ यज्ञों-द्वारा भी भगवान की आराधना की. वे महामना राजर्षि महान व्रत का पालन करने वाले थे, तो भी उनके कोई संतान नहीं हुई. तब वे मनस्वी नरेश राज्य का भार मन्त्रियों पर रखकर शास्त्रीय विधि के अनुसार अपने आपको परमात्म-चिन्तन में लगाकर सदा वन में ही रहने लगे.

एक दिन की बात है राजा युवनाश्व उपवास के कारण दुखित हो गए. प्यास से उनका हृदय सूखने लगा. उन्होंने जल पीने की इच्छा से रात के समय महर्षि भृगु के आश्रम में प्रवेश किया. उसी रात में महात्मा भृगुनन्दन महर्षि च्यवन ने सुद्युम्नकुमार युवनाश्व को पुत्र की प्राप्ति कराने के लिए एक इष्टि की थी. उस इष्टि के समय महर्षि ने मन्त्रपूत जल से एक बहुत बड़े कलश को भरकर रख दिया था. वह कलश का जल पहले से ही आश्रम के भीतर इस उद्देश्य से रखा गया था कि उसे पीकर राजा युवनाश्व की रानी इन्द्र के समान शक्तिशाली पुत्र को जन्म दे सके. उस कलश को वेदी पर रखकर सभी महर्षि सो गये थे.

रात में देर तक जागने के कारण वे सब-के-सब थके हुए थे. युवनाश्व उन्हें लांधकर आगे बढ़ गए. उनका कण्ठ सूख गया था. पानी पीने की अत्यन्त अभिलाषा से वे उस आश्रम के भीतर गए और शान्त भाव से जल के लिए याचना करने लगे. राजा थक कर सूखे कण्ठ से पानी के लिए चिल्ला रहे थे, परंतु उस समय चैं-चें करनेवाले पक्षी की भांति उनकी चीख-पुकार कोई भी न सुन सका. तदनन्तर जल से भरे हुए पूर्वोक्त कलश पर उनकी दृष्टि पड़ी. देखते ही वे बड़े वेग से उसकी ओर दौड़े और इच्छानुसार जल पीकर उन्होंने बचे हुए जल को वहीं गिरा दिया. राजा युवनाश्व प्यास से बड़ा कष्ट पा रहे थे. वह शीतल जल पीकर उन्हें बड़ी शान्ति मिली.

वे बुद्धिमान नरेश उस समय जल पीने से बहुत सुखी हुए. तत्पश्चात् तपोधन च्यवन मुनि के सहित सब मुनि जाग उठे. उन सबने उस कलश को जल से शून्य देखा. फिर तो वे सब एकत्र हो गए और एक दूसरे से पूछने लगे “यह किसका काम है” युवनाश्व ने सामने आकर कहा-”यह मेरा ही कर्म हैं”. इस प्रकार उन्होंने सत्य को स्वीकार कर लिया.

तब च्यवन जी ने कहा- 'महान बल और पराक्रम से सम्पन्न राजर्षि युवनाश्व! यह तुमने ठीक नहीं किया. इस कलश में मैंने तुम्हें ही पुत्र प्रदान करने के लिये तपस्या से संस्कारयुक्त किया हुआ जल रखा था. राजन! उक्त विधि से इस जल को मैंने ऐसा शक्ति सम्पन्न कर दिया था कि इसको पीने से एक महाबली, महा-पराक्रम पुत्र उत्पन्न हो, जो अपने बल पराक्रम से देवराज इन्द्र को भी पराजित कर सके. उसी जल को तुमने आज पी लिया, यह अच्छा नहीं किया. अब हम लोग इसके प्रभाव को टालने या बदलने में असमर्थ हैं. तुमने जो ऐसा कार्य कर डाला है, इसमें निश्चय ही देव की प्रेरणा है.

महाराज! तुमने प्यास से व्याकुल होकर जो मेरे तपो बल से संचित तथा विधि–पूर्वक मन्त्र से अभिमन्त्रित जल को पी लिया है, उसके कारण तुम अपने ही पेट से तथा–कथित इन्द्र विजयी पुत्र को जन्म दोगे. इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए हम तुम्हारी इच्छा के अनुरूप अत्यन्त अद्भुत यश कराएंगे जिससे तुम स्वयं भी शक्तिशाली रहकर इन्द्र के समान पराक्रमी पुत्र उत्पन्न कर सकोगे और गर्भ–धारणजनित कष्ट का भी तुम्हें अनुभव न होगा'. तदनन्तर पूरे सौ वर्ष बीतने पर उन महात्मा राजा युवनाश्व की बायीं कोख फाड़कर एक सूर्य के समान महातेजस्वी बालक बाहर निकला तथा राजा की मृत्यु भी नहीं हुई. यह एक अद्भुत-सी बात हुई. तत्पश्चात महातेजस्वी इन्द्र उस बालक को देखने के लिए वहां आए.

उस समय देवताओं ने महेन्द्र से पूछा- 'यह बालक क्या पीयेगा?' तब इन्द्र ने अपनी तर्जनी अंगुली बालक के मुंह में डाल दी और कहा-'माम् अयं धाता’। अर्थात यह मुझे ही पीयेगा' वज्रधारी इन्द्र के ऐसा कहने पर इन्द्र आदि सब देवताओं ने मिलकर उस बालक का नाम मान्धाता' रख दिया. इन्द्र की दी हुई प्रदेशिनी (तर्जनी) अङ्गुलि- का रसास्वादन कर के वह महातेजस्वी शिशु तेरह बित्ता बढ़ गया.

उस समय शक्तिशाली मान्धाता के चिन्तन करने मात्र से ही धनुर्वेद सहित सम्पूर्ण वेद और दिव्य अस्त्र (ईश्वर की कृपा से) उपस्थित हो गए. आजगव नामक धनुष, सींग के बने हुए क्षण और अभेद्य कवच-सभी तत्काल उनकी सेवा में आ गए. साक्षात देवराज इन्द्र ने मान्धाता का राज्याभिषेक किया.

भगवान विष्णु ने जैसे तीन पदों द्वारा त्रिलोक को नाप लिया था, उसी प्रकार मान्धाता ने भी धर्म के द्वारा तीनों लोकों को जीत लिया. उन महात्मा नरेश का शासन चक्र सर्वत्र बेरोक-टोक चलने लगा. सारे रत्न राजर्षि मान्धाता के यहां स्वयं उपस्थित हो जाते थे. इस प्रकार उनके लिये यह सारी पृथ्वी धन से परिपूर्ण थी.

महातेजस्वी एवं परम कान्तिमान् राजा मान्धाता ने यज्ञ मण्डलों का निर्माण करके पर्याप्त धर्म का सम्पादन किया और उसी के फल से स्वर्ग लोक में इन्द्र का आधा सिंहासन प्राप्त कर लिया. उन धर्मपरायण बुद्धिमान नरेश ने केवल शासनमात्र से एक ही दिन में समुद्र, खान और नगरों सहित सारी पृथ्वी-पर विजय प्राप्त कर ली (यही एक मात्र पृथ्वी पर राजा हैं जिन्होंने एक ही दिवस में सारी पृथ्वी को जीत लाया था). वृष्टि के समय वज्रधारी इन्द्र के देखते-देखते खेती की उन्नति के लिये स्वयं पानी की वर्षा की थी.

रघुकुल

राजा सगर भी इक्ष्वाकु वंश के थे. राजा सगर की उनके साठ हज़ार पुत्रों द्वारा अश्वमेध घोड़ों की खोज में धरती खोदने की कथा तो आप सभी जानते हैं. सगर के बाद इस वंश के कुछ उल्लेखनीय नाम असमंजस, भगीरथ, ऋषभ और खट्वांग थे. राजा दिलीप, खट्वांग के पुत्र थे. राजा दिलीप ने अपने गुरु की नंदिनी नामक गाय की बहुत अच्छे से सेवा की. इस पूजा से उन्हें रघु नामक पुत्र के रूप में वरदान मिला. राजा रघु ने कई यज्ञ किये थे और वह एक दयालु राजा थे, कहा जाता है कि रघु कुल अपने वचनों को बहुत महत्व देते थे.

"रघु कुल रीत सदा चली आई प्राण जाई पर वचन न जाई" अर्थात रघु कुल परंपरा के अनुसार हम अपने द्वारा किए गए वचन को पूरा करने के लिए अपने जीवन का बलिदान देने के लिए भी तैयार हैं.

  •  राजा रघु ने इंदुमती से विवाह किया और उन्हें एक पुत्र का आशीर्वाद मिला जिसका नाम अज था. दशरथ राजा अज के पुत्र थे. और हां! हम सभी जानते हैं कि राजा दशरथ के पुत्र हैं?
  • जी हां उनका नाम हैं "मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र". राम के दो पुत्र हुए उनका नाम लव और कुश था. वाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड 66.6–8 अनुसार, वाल्मिकि जी ने एक कुश का मुट्ठा और उनके लव लेकर उपदेश दिया कि जो बालक इनमें पहले पैदा हुआ उसका मंत्रों से मार्जन कुशों से करें और छोटे का मार्जन लव से करें तो उनका नाम कुश और लव होगा.
  • नरसिंह पुराण 21.13–15 अनुसार रामजी के पुत्र लव से पद्म की उत्पति हुई, बाद में पद्म से अनुपर्ण और अनुपर्ण से वस्त्रपाणि का जन्म हुआ. वस्त्रपाणि से शुद्धोदन और शुद्धोदन से बुध (बुद्ध) की उत्पत्ति हुई. भगवान बुद्ध के बाद से से सूर्यवंश समाप्त हो जाता हैं.

ये भी पढ़ें: Ayodhya Sarayu Nadi: श्रीराम के जन्म से वनगमन और बैकुंठ गमन की साक्षी है 'सरयू', जानिए इसका रोचक इतिहास और रहस्य

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

मुंबई के रहने वाले अंशुल पांडेय धार्मिक और अध्यात्मिक विषयों के जानकार हैं. 'द ऑथेंटिक कॉंसेप्ट ऑफ शिवा' के लेखक अंशुल के सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म और समाचार पत्रों में लिखते रहते हैं. सनातन धर्म पर इनका विशेष अध्ययन है. पौराणिक ग्रंथ, वेद, शास्त्रों में इनकी विशेष रूचि है, अपने लेखन के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रहें.
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