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अंटार्कटिका में भी पर्यटन की संभावना और विकास की जुगल लगा रहा है भारत  

अंटार्कटिका में भी भारत पर्यटन की संभावना और विकास की जुगत लगा रहा है. इसको लेकर अंदरखाने काम भी हो रहा है . भारत अंटार्कटिक पर भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. 

अंटार्कटिका में भी भारत पर्यटन की संभावना और विकास के लिए जुगत लगा रहा है. इसको लेकर अंदरखाने काम भी हो रहा है. अभी हाल में ही भारत के कोच्चि में एक अंटार्कटिक संधि परामर्शदात्री बैठक भी हुई. जिसमें अंटार्कटिका में पर्यटन पर पहली बार केंद्रित कार्य समूह ने चर्चा की और सुविधा प्रदान करने की बात कही. यानी की भारत की अब दूसरे द्वीप पर भी नजर है. 20 से 30 मई के बीच केरल के कोच्चि में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत  राष्ट्रीय ध्रुवीय और समुद्री अनुसंधान केंद्र और गोवा और अंटार्कटिक संधि सचिवालय के बीच वार्ता होगी. विकास की संभावना और रास्तों को इसमें टटोला जाएगा. इसमें लगभग 40 राष्ट्र के 350 से अधिक प्रतिभागी शामिल होंगे.

अंटार्कटिका और पर्यटन

भारत 46वीं अंटार्कटिक संधि परामर्शदात्री बैठक यानी की एटीसीएम और पर्यावरण संरक्षण समिति  की 26वीं बैठक! इसमें अंटार्कटिका में पर्यटन को शुरू करने पर पहली बार केंद्रित चर्चा को सुविधाजनक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए भारत तैयार हुआ है. अंटार्कटिक संधि 1959 में हस्ताक्षरित 56 पक्षकारों का एक बहुपक्षीय समझौता है. इसके प्रावधानों के अनुसार एटीसीएम और सीईपी उच्च स्तरीय वैश्विक वार्षिक बैठकें आयोजित की जाती हैं. इन बैठकों में अंटार्कटिक संधि के सदस्य देश अंटार्कटिका के विज्ञान, नीति, शासन, प्रबंधन, संरक्षण और सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करते हैं. सीईपी यानी की पर्यावरण संरक्षण समिति की स्थापना 1991 में अंटार्कटिक संधि (मैड्रिड प्रोटोकॉल) के पर्यावरण संरक्षण पर प्रोटोकॉल के तहत हुई थी.

सीईपी अंटार्कटिका में पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा पर एटीसीएम को सलाह देता है. भारत साल 1983 से अंटार्कटिक संधि का सलाहकार पक्ष रहा है. भारत अंटार्कटिका के वैज्ञानिक अन्वेषण और पर्यावरण संरक्षण को अन्य 28 सलाहकार पक्षों के साथ, संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाता है. इसके पास एटीसीएम में प्रशासन, वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण और लॉजिस्टिकल सहयोग के मामलों में लिए गए निर्णयों और प्रस्तावों पर प्रस्ताव रखने और मतदान करने का भी अधिकार है. इसके अलावा भारत अनुसंधान केंद्र स्थापित कर सकता है. भारत वैज्ञानिक कार्यक्रम और लॉजिस्टिक संबंधी संचालन करने में भी पक्षधर है. पर्यावरण नियमों को भी भारत लागू कर सकता है और अंटार्कटिक संधि के सदस्यों द्वारा साझा किए गए वैज्ञानिक डेटा और शोध निष्कर्षों तक  भी पहुंच सकता है.

शांति के क्षेत्र के तौर पर अंटार्कटिका

अनुबंध करने वाले और सलाहकार पक्ष अंटार्कटिक संधि के अनुपालन, पर्यावरण प्रबंधन, वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने और अंटार्कटिका को सैन्य गतिविधि और क्षेत्रीय दावों से मुक्त, शांति के क्षेत्र के रूप में बनाए रखने के लिए उत्तरदायी भी हैं. एटीसीएम का प्रशासन अंटार्कटिक संधि सचिवालय के अर्जेंटीना मुख्यालय से किया जाता है. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव और भारतीय प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख डॉ. एम. रविचंद्रन के अनुसार अंटार्कटिका के जंगल और वैज्ञानिक खोज की अंतिम सीमाओं में से एक का भी प्रतिनिधित्व करता है.

इस असाधारण क्षेत्र के प्रबंधकों के रूप में ये सुनिश्चित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि इस क्षेत्र में अनुसंधान और पर्यटन सहित सभी गतिविधियां इस तरीके से संचालित की जाएं. जिससे भावी पीढ़ियों के लिए इसकी पारिस्थितिक अखंडता सुरक्षित रहे. अंटार्कटिक संधि प्रणाली के व्यापक ढांचे में शामिल करने के लिए कार्रवाई योग्य सिफारिशों की एक श्रृंखला लाने वाले 46वें एटीसीएम के इस महत्वपूर्ण पहल का नेतृत्व करने में भारत का सम्मान भी निहित है. भारत अंटार्कटिक संधि प्रणाली का एक सक्रिय प्रतिबद्ध सदस्य होने के नाते, अंटार्कटिका में बढ़ती पर्यटन गतिविधियों और महाद्वीप के पर्यावरण पर उनके प्रभाव से निपटने की तत्काल आवश्यकता महसूस करता है.

पिछले कुछ वर्षों में अंटार्कटिका आने वाले पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, पर्यटन एक प्रमुख मुद्दा बन गया है, जिससे ये महत्वपूर्ण हो गया है कि इस अनूठे और प्राचीन क्षेत्र में टिकाऊ व उत्तरदायित्वपूर्ण अनुसंधान सुनिश्चित करने के लिए व्यापक नियम बनाए जाएं. भारत ने एहतियाती सिद्धांतों पर आधारित एक व्यापक, सक्रिय और प्रभावी पर्यटन नीति की वकालत की है. 1966 से एटीसीएम में पर्यटन को शुरू करने पर चर्चा चल रही है, लेकिन ये एजेंडा सत्र, कागजात या संकल्प तक ही सीमित रह गए. भारत द्वारा आयोजित 46वें एटीसीएम में पहली बार अंटार्कटिका में पर्यटन को शुरू करने पर  एक समर्पित कार्य समूह तैयार किया गया है.  

भारत और अंटार्कटिका का भविष्य

भारत ने 2022 में पहली बार 'बदलती दुनिया में अंटार्कटिका' विषय पर 10वें एससीएआर यानी की अंटार्कटिक अनुसंधान पर वैज्ञानिक समिति सम्मेलन की मेजबानी की और अंतरराष्ट्रीय ध्रुवीय वर्ष समारोह में योगदान दिया. दक्षिणी महासागर में 11 भारतीय अभियान हुए हैं और वेडेल सागर और दक्षिणी ध्रुव में एक-एक अभियान आयोजित हुआ है. 2007 में भारत ने अंटार्कटिक संधि प्रणाली के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए, नई दिल्ली में 30वें एटीसीएम का आयोजन किया. भारत ने अंटार्कटिक बर्फ शेल्फ और बर्फ वृद्धि का अध्ययन करने और जलवायु अध्ययन के लिए बर्फ कोर ड्रिल करने के लिए नॉर्वे और यूके के साथ भी सहयोग किया .

एनसीपीओआर के निदेशक डॉ. थंबन मेलोथ के अनुसार  भारत के पास 2022 में लागू भारतीय अंटार्कटिक अधिनियम के द्वारा अंटार्कटिका में पर्यटन सहित भारत की गतिविधियों को विनियमित करने के लिए एक कानूनी ढांचा है. भारतीय अंटार्कटिक अधिनियम भारत के पर्यटन नियमों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ समन्वित करता है और सामान्य संरक्षण लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अन्य अंटार्कटिक संधि देशों के साथ सहयोग करता है.

एमओईएस के सलाहकार और मेजबान देश सचिवालय के प्रमुख डॉ. विजय कुमार के अनुसार पिछले चार दशकों में भारत ने अंटार्कटिक अनुसंधान, पर्यावरण प्रबंधन और अंटार्कटिक संधि के ढांचे के भीतर अंतरराष्ट्रीय सहयोग में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में खुद को स्थापित किया है. भारत अंटार्कटिक संधि प्रणाली में सलाहकार पक्षों के रूप में कनाडा और बेलारूस को शामिल करने की संभावना पर चर्चा करने के लिए एक मंच भी प्रदान करेगा. कनाडा और बेलारूस भी क्रमशः 1988 और 2006 से अंटार्कटिक संधि प्रणाली पर हस्ताक्षरकर्ता रह चुके  हैं.

चर्चा को सुविधाजनक बनाने में भारत की भागीदारी अंटार्कटिका में वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप नए सलाहकार पक्षों को शामिल करना है. 46वें एटीसीएम और 26वें सीईपी के अध्यक्ष के रूप में चुने गए राजदूत पंकज के अनुसार अंटार्कटिका संधि प्रणाली में देशों के सहयोगात्मक प्रयास, प्राचीन पर्यावरण को संरक्षित करने और अंटार्कटिका में वैज्ञानिक अनुसंधान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण हैं. अपने नेतृत्व और प्रतिबद्धता के माध्यम से, भारत अंटार्कटिक शासन के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. 

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