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भारत-फ़िजी संबंध, 36 साल पुराने तख्तापलट को लेकर प्रधानमंत्री सितिवेनी राबुका का माफीनामा, क्या हैं इसके मायने?

Fiji PM: सितिवेनी राबुका ने 14 मई, 1987 को सैनिकों के साथ फिजी की संसद पर धावा बोलते हुए पीएम टिमोसी बावद्र को गिरफ्तार कर लिया था. टिमोसी के साथ 27 लोगों को ट्रक में अज्ञात स्थान पर ले जाया गया था.

India Fiji Relations: दक्षिण प्रशान्त महासागर का द्वीपीय देश फ़िजी के साथ भारत का लंबे समय से घनिष्ठ संबंध रहा है. फ़िजी के प्रधानमंत्री सितिवेनी राबुका (Sitiveni Rabuka) के एक माफी के बाद से दोनों देशों के संबंध अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है.

दरअसल फ़िजी के प्रधानमंत्री सितिवेनी राबुका ने दशकों पुरानी एक घटना के लिए माफी मांगी है. मई 1987 की ये घटना भारतीय मूल के फ़िजी लोगों से जुड़ी हुई थी.  मई 1987 में सितिवेनी राबुका ने फ़िजी में भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ तख्तापलट का काम किया था. अब उस घटना के ठीक 36 साल बाद सितिवेनी राबुका ने माफी मांगी है.

फ़िजी पीएम सितिवेनी राबुका ने ट्विटर पर लिखा है:

"मैं अपने और उन सभी लोगों की ओर से से ये स्वीकार हूं, जिन्होंने 14 मई 1987 को सैन्य तख़्तापलट में मेरे साथ हिस्सेदार थे. हम अपने गलत कामों को स्वीकार करते हैं, और हम स्वीकार करते हैं कि हमने फ़िजी में बहुत से लोगों को आहत किया, ख़ासकर इंडो-फिजियन समुदाय के साथ."

सितिवेनी राबुका ने आगे लिखा:

"मैं हमारे गलत कामों को स्वीकार करता हूं, जिन संकटों से आप सब गुजरे हैं, उनके लिए आपको हमें दोष देने का पूरा अधिकार है. हम आपको हमसे नाराज होने या यहां तक कि हमसे नफरत करने के लिए दोषी नहीं ठहराते हैं, आप अपने गुस्से और अपनी नफरत  के लिए बिल्कुल सही हैं. मैं यहां कबूल करने और आपसे क्षमा मांगने के लिए खड़ा हूं.''

फ़िजी की राजधानी सुवा में एक कार्यक्रम के दौरान इंडो-फिजियन समुदाय की मौजूदगी में भी सितिवेनी राबुका ने इन बातों को कहा. उन्होंने सभी से गुजारिश की कि जो भी उस घटना में शामिल थे उन्हें माफ कर दिया जाए. उन्होंने लोगों से नफरत के बोझ को आगे नहीं ले जाने की भी गुजारिश की.

फ़िजी के प्रधानमंत्री ने क्यों मांगी माफी?

भारत-फ़िजी संबंधों को समझने से पहले ये जानना जरूरी है कि आखिर फ़िजी के मौजूदा प्रधानमंत्री सितिवेनी राबुका माफी क्यों मांग रहे हैं. आम शब्दों में कहे तो सितिवेनी राबुका ने 1987 में भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ तख्तापलट को अंजाम दिया था. 36 साल पहले उस तख्तापलट को अंजाम देते हुए राबुका ने दावा किया था कि फ़िजी में भारत से गन्ने की खेती के लिए काम करने आए लोगों की संख्या वहां के मूल निवासियों से ज्यादा हो गई है. इसी दलील को आधार बनाकर उन्होंने कहा था कि फ़िजी के लोगों का अपने देश पर नियंत्रण कमजोर हो गया है.

जब ये तख्तापलट हुआ था, उस वक्त सितिवेनी राबुका वहां लेफ्टिनेंट कर्नल थे. उनका मानना था कि भारत से आए इंडो-फिजियन के मुकाबले फ़िजी की राजनीति में यहां के मूल निवासियों का प्रभाव ज्यादा होना चाहिए. इसको आधार बनाकर ही उन्होंने वहां तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया था. उन्होंने निर्वाचित सरकार में प्रधानमंत्री टिमोसी बावद्र (Timoci Bavadra) जबरन सत्ता से बेदखल कर दिया था. टिमोसी बावद्र फ़िजी का नेतृत्व करने वाले ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्हें इंडो-फिजियन समुदाय के लोगों का भरपूर समर्थन हासिल था.

1987 में फ़िजी की संसद पर बोला था धावा

तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल सितिवेनी राबुका 14 मई, 1987 को अपने 10 नकाबपोश सैनिकों के साथ फ़िजी की संसद पर धावा बोलते हुए प्रधानमंत्री टिमोसी बावद्र को गिरफ्तार कर लिया था. टिमोसी के साथ ही सतारूढ़ गठबंधन के 27 सदस्यों को एक ट्रक में भरकर अज्ञात स्थान पर ले गए थे. इसके बाद सितिवेनी राबुका ने फ़िजी के संविधान को निलंबित करने का ऐलान कर दिया और खुद को केयरटेकर सरकार का प्रमुख घोषित कर दिया, जब तक कि वहां फिर से आम चुनाव नहीं हो जाए. फ़िजी की सत्ता संभालने के अगले दिन ही राबुका ने घोषणा की कि वे देश का नया संविधान ड्राफ्ट कर रहे हैं, जिससे ये सुनिश्चित हो सकेगा कि भविष्य में फ़िजी पर कभी भी भारत से आए लोगों के प्रभाव वाली सरकार नहीं बन सके.

भारतीय मूल के लोगों पर अत्याचार

इस पूरे घटनाक्रम के चंद दिनों के बाद ही 19 मई 1987 को फ़िजी में भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ दंगे भड़क गए. वहां के मूल निवासियों ने बड़े पैमाने पर भारतीय मूल के लोगों पर हमले किए, उनकी दुकानें तहस-नहस कर दी. इस बीच जुलाई में टिमोसी बावद्र और फ़िजी के मूल लोगों में प्रचलित पूर्व प्रधानमंत्री कामिसी मारा (Kamisese Mara) के बीच मिलकर अंतरिम सरकार बनाने और संविधान में सुधार करने को लेकर सहमति बनी. इसके प्रतिक्रिया स्वरूप सितिवेनी राबुका मे सितंबर में दूसरी बार तख्तापलट को अंजाम दिया. उन्होंने फ़िजी को गणराज्य घोषित करते हुए ब्रिटिश क्वीन की जगह खुद को देश का प्रमुख घोषित कर दिया.

सितिवेनी राबुका के इस कदम की दुनियाभर में निंदा हुई. भारत ने फ़िजी पर व्यापार प्रतिबंध भी लगा दिए. उसे कई देशों ने मान्यता देने से इनकार कर दिया. चौतरफा अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद सितिवेनी राबुका ने दिसंबर 1987 में फ़िजी गणराज्य के प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया और वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली के लिए बाद में 1990 में नए संविधान को लागू किया गया और दो साल बाद चुनाव कराए गए. तब तक कामिसी मारा वहां के प्रधानमंत्री रहे. 

बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोगों का हुआ पलायन

14 मई 1987 को सितिवेनी राबुका ने जो किया उसके बाद से कुछ महीने तक भारतीय मूल के फ़िजी लोगों पर काफी अत्याचर हुई. उसकी वजह से बड़ी संख्या में इंडो-फिजियन लोगों का पलायन भी हुआ. एक अनुमान के मुताबिक करीब 70 हजार भारतीय मूल के लोग वहां से पलायन कर गए थे. राबुका और उसके सहयोगियों ने इसके लिए ऐसा माहौल बनाया था, जिससे फ़िजी के मूल निवासियों में ये बात बैठ जाए कि देश पर उनका अब राजनीतिक नियंत्रण नहीं रह गया है और इंडो-फिजियन समुदाय हावी हो गई है. उस वक्त इंडो फिजियन समुदाय के लोग फ़िजी की अर्थव्यवस्था पर हावी थे. उस वक्त फ़िजी में करीब साढ़े तीन लाख लोग भारतीय मूल के लोगों की आबादी थी.

अब उस घटना के 36 साल बाद सितिवेनी राबुका में भारतीय मूल के लोगों पर हुए अत्याचार के लिए माफी मांगी है. सितिवेनी राबुका पिछले साल दिसंबर में दूसरी बार फ़िजी के प्रधानमंत्री बने हैं. इससे पहले वे जून 1992 से मई 1999 के बीच वहां के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. 

भारत-फ़िजी के रहे हैं ऐतिहासिक संबंध

सितिवेनी राबुका की इस कार्रवाई के बाद फ़िजी का दुनिया के देशों के साथ संबंधों पर दूरगामी असर पड़ा था. भारत के साथ संबंधों पर इस घटना से सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा था. ऐसे फ़िजी के साथ भारत का ऐतिहासिक संबंध रहा है. आजादी के पहले से ही भारत और फ़िजी के रिश्ते ब्रिटिश कॉलोनी होने की वजह से जुड़ गए थे. 1874 में फ़िजी, ब्रिटेन का उपनिवेश बन गया था. उसके बाद से भारत से बड़ी संख्या में लोग वहां गन्ने के खेतों में काम करने के लिए ले जाए गए. 1879 से 1916 के बीच भारत से करीब 61 हजार लोग फ़िजी ले जाए गए. उसके बाद ब्रिटिश शासन ने भारत से लोगों को फ़िजी ले जाना बंद कर दिया और 1920 में यहां के मजदूरों के साथ लेबर एग्रीमेंट को खत्म कर दिया.

भारतीय मूल के लोग बन गए प्रभावशाली

लेबर एग्रीमेंट खत्म होने के बाद भी ज्यादातर भारतीय वहीं रह गए और धीरे-धीरे वहां के समृद्ध लोगों की श्रेणी में आ गए. 1940 के दशक में इनकी संख्या फ़िजी के मूल लोगों की संख्या से ज्यादा हो गई. ऐसे तो वहां की ज्यादातर जमीन पर मूल लोगों का ही मालिकाना हक़ था, लेकिन अधिकांश जमीन पर भारतीय मूल के लोग 99 साल की लीज पर लेकर खेती करने लग गए थे.

1970 में फ़िजी, ब्रिटेन हुकूमत से आजाद हुआ और कामिसी मारा वहां के पहले प्रधानमंत्री चुने गए. 1879 से लेकर अगले सौ साल के बीच फ़िजी में भारतीय मूल के लोगों का अर्थव्यवस्था में प्रभाव काफी तेजी से बढ़ा. इसी का नतीजा था कि जब अप्रैल 1987 में टिमोसी बावद्र फ़िजी के दूसरे प्रधानमंत्री बने तो ये सरकार भारतीय मूल के प्रभुत्व वाली सरकार मानी जाने लगी क्योंकि टिमोसी की सरकार बनने में भारतीय मूल के लोगों का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण था. 1987 तक वहां भारतीय मूल के लोंगो की आबादी फ़िजी के मूल लोगों की आबादी से ज्यादा थी और इसी का बहाना बनाकर सितिवेनी राबुका ने टिमोसी बावद्र को हटाकर तख्तापलट किया था.

करीब एक तिहाई भारतीय मूल के लोग

फ़िजी कहने को एक छोटा देश है जिसकी आबादी 2017 की जनगणना के मुताबिक 8,84, 887 थी. 1977 में फ़िजी की जनसंख्या 6 लाख थी, जिसमें आधे भारतीय मूल के लोग थे और दो लाख 55 हजार के आसपास फ़िजी के मूल लोग थे, जबकि बाकी आबादी चाइनीज, यूरोपीय और दूसरे समुदाय से जुड़े लोग थे. हालांकि 2007 के आंकड़ों के मुताबिक फ़िजी के मूल लोगों की आबादी भारतीय मूल के लोगों से ज्यादा हो गई. मौटे तौर पर अभी 5 लाख से ज्यादा वहां फ़िजी मूल के लोग हैं, तो 3 लाख के आसपास भारतीय मूल के लोगों की संख्या है.

ये आंकड़ा अपने आप में जाहिर करता है कि भारतीय मूल के लोगों का फ़िजी में किस तरह का प्रभाव रहा है. भारतीय मूल के फ़िजी लोगों में अभी भी करीब 76 फीसदी लोग हिन्दू हैं. फ़िजी की कुल आबादी में बात करें तो वहां करीब 65% ईसाई हैं, तो करीब 28 फीसदी लोग हिन्दू और 6% के आसपास मुस्लिम हैं. भारतीय मूल के लोग वहां के शहरों और गन्ना के खेती से जुड़े इलाकों में बहुतायत में हैं. हिन्दी फ़िजी के आधिकारिक भाषाओं में से एक है. 

2014 के बाद आपसी संबंध हुए मजबूत

फ़िजी को मिली आजादी के बाद वहां के पहले प्रधानमंत्री कामिसी मारा ने 1971 में भारत की यात्रा की. उसके बाद 1981 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फ़िजी का दौरा किया. इसके 33 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने फ़िजी की यात्रा की. 19 नवंबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ़िजी का दौरा किया और सुवा में फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन समिट की पहली बैठक में हिस्सा लिया था. इसके बाद से द्विपक्षीय संबंध और भी मजबूत हुए.

भारत हमेशा करता है फ़िजी की मदद

भारत लगातार फ़िजी को बुनियादी ढांचे के विकास में मदद करते आया है. जब-जब फ़िजी आपदा से प्रभावित हुआ है, भारत ने उसकी मदद की है. ऐसा ही एक उदाहरण दिसंबर 2020 में देखने को मिला था जब फ़िजी चक्रवाती तूफान यासा की चपेट में था. उस वक्त भारत ने 6 टन की आपदा सामग्री फ़िजी भेजा था. बाद में भारत ने फ़िजी के 20 स्कूलों में रिनोवेशन के लिए राशि दी थी. साथ ही 5 टन सब्जियों के बीजों की सौगात भी भेजी थी और वहां के प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में 10 लाख डॉलर का योगदान भी किया था. उसके बाद से भारत किसी न किसी मद में लगातार फ़िजी की मदद कर रहा है.

दोनों देशों के बीच में आपसी व्यापार के तहत 2021-22 में भारत से करीब 58 लाख डॉलर का निर्यात फ़िजी को हुआ है. इस मोर्चे पर भारत, फ़िजी न के बराबर करता है, लेकिन फ़िजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुत सारी जरूरी चीजें निर्यात करता है.

फ़िजी के लिए भारत है बहुत महत्वपूर्ण

फ़िजी छोटा देश होने के बावजूद दक्षिण प्रशांत महासागर में अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से सामरिक तौर भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण हो जाता है. चीन और अमेरिका भी इसी वजह से फ़िजी से संबंध बढ़ाने में जुटे हैं. इंडो-पैसिफिक रीजन में चीन के विस्तारवादी रुख को देखते हुए भारत के लिए फ़िजी से संबंध और भी अहमियत रखता है. भारतीय मूल के लोगों की वजह से फ़िजी का भारत के साथ न सिर्फ कूटनीतिक संबंध है, बल्कि ये भावनात्मक और वैचारिक संबंध भी बन गया है. सितिवेनी राबुका के दिसंबर 2022 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से फ़िजी का चीन के साथ रिश्ते पहले जैसे नहीं रहे हैं. धीरे-धीरे प्रशांत महासागर के द्वीपीय देशों को ये एहसास होने लगा है कि चीन कर्ज जाल में फंसा कर अपने हितों को साधना चाहता है. 

फरवरी में एस जयशंकर ने किया था फ़िजी का दौरा

इस साल फरवरी में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 12वें विश्व हिंदी सम्मेलन में शामिल होने के लिए फ़िजी का दौरा किया था. उस वक्त सितिवेनी राबुका ने विदेश मंत्री जयशंकर से मुलाकात में भारत को पुराना दोस्त बताया था. उन्होंने कहा था कि फ़िजी भारत के साथ दोस्ती जारी रखेगा. वहीं एस जयशंकर ने कहा था कि फ़िजी सामूहिक प्राथमिकताओं के जरिए पैसिफिक रीजन के विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की सराहना करता है. उन्होंने भविष्य के नजरिए से भी फ़िजी और भारत के सहयोग को काफी जरूरी बताया था. साझा बयान में माना था कि लोगों से लोगों के जुड़ाव की वजह से दोनों देशों ने घनिष्ठ और दीर्घकालिक संबंध साझा किए हैं.

क्लाइमेट चेंज फंडिंग में भारत कर सकता है मदद

फ़िजी के विकास में भारतीय मूल के लोगों का तो प्रभाव रहा ही है, इसके साथ ही भारत ने सीधे तौर से उसके विकास में काफी योगदान दिया है. वहां की सेनाएं भारत में ट्रेनिंग लेती हैं. सबसे अहम मुद्दा क्लाइमेट फंडिंग से जुड़ा है. द्वीपीय देश होने के नाते क्लाइमेट चेंज से फ़िजी भी प्रभावित है और निकट भविष्य में एशियन डेवलपमेंट बैंक से जलवायु परिवर्तन से प्रभावित इन छोटे द्वीपीय देशों के लिए सौ अरब डॉलर के एक पैकेज का ऐलान होने की संभावना है. भारत संस्थापक सदस्य होने के साथ ही बैंक का चौथा सबसे बड़ा शेयरहोल्डर है. इस बैंक में अमेरिका और जापान का दबदबा है. इस सारे पहलुओं को देखते हुए फ़िजी के लिए भारत का महत्व काफी बढ़ जाता है. फ़िजी के प्रधानमंत्री सितिवेनी राबुका के 1987 की घटना पर बयान इस वजह से भी ज्यादा प्रासंगिक है.

फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन समिट

फ़िजी के प्रधानमंत्री सितिवेनी राबुका का 1987 की घटना को लेकर माफी मांगने का महत्व इसलिए भी ज्यादा हो जाता है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पापुआ न्यू गिनी का दौरा करने वाले हैं और वहां वे 22 मई को फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन समिट में हिस्सा लेंगे. इस फोरम में पैसिफिक ओशन में आने वाले 14 द्वीप देश भी शामिल हैं. पहले इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के भी हिस्सा लेने का कार्यक्रम था. हालांकि बाद में घरेलू कर्ज संकट की वजह से अमेरिकी राष्ट्रपति का ये दौरा रद्द कर दिया गया है.

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