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जी20 घोषणापत्र और जलवायु संकट:  कोयले से छुटकारा अब भी नहीं 

विकसित देशों की ढुलमुल नीति के बावजूद दिल्ली पहुंचे संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंतोनियो गुतारेस आशान्वित थे कि कम से कम विकसित देश नेट शून्य उत्सर्जन की सीमा में कमी पर सहमत हो पाएंगे

हाल के वर्षों में मौसम परिवर्तन की घटनाओं  में आयी बेतहाशा वृद्धि, जिसकी धमक यूरोप और उत्तरी अमेरिका सहित विकसित देशों तक पहुंच रही है, इस कारण जलवायु संकट से जुड़े मुद्दे मुखर रूप से  से भू-राजनीति के केंद्र में है. भारत की अध्यक्षता में हुए जी-20 शिखर सम्मलेन में लिए गए निर्णय भी इस मुद्दे से अछूते नहीं रहे. एक महत्वपूर्ण कदम के तहत, G20 नई दिल्ली घोषणापत्र में सामूहिक नेतृत्व ने पहली बार 2030 तक नवीकरणीय उर्जा क्षमता विकास  के लक्ष्यों को तिगुना करने और एक बार फिर वादे के मुताबिक जलवायु कोष को मूर्त रूप देने पर सहमति दी. 

सम्मलेन के पहले दिन ही घोषणा पत्र जारी करते हुए भारत के प्रधानमंत्री तमाम देशों के बीच अपने बीच वक्तव्य जिसमें उन्होंने अशोक स्तम्भ पर ढाई हज़ार साल पहले उकेरित ‘मानव का कल्याण और सुख सुनिश्चित किया जाये’ के अनुरूप आम सहमति से उत्साहित दिखे. 

विश्व के तमाम ज्वलंत मुद्दों के साथ पर्यावरण और जलवायु संकट के मुद्दों को भी घोषणापत्र में मुख्य रूप से स्थान मिला. कुछ स्पष्ट लक्ष्यों के साथ विकराल हो रहे वैश्विक मुद्दों पर चिंता स्पष्ट रूप रेखांकित की गयी. घोषणापत्र में मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन के लिए पूरी तैयारी, जीवाश्म ईंधन से इतर हरित उर्जा क्षमता का विकास, समुद्री संसाधनों का सम्यक दोहन और लैंगिक समानता आधारित जलवायु संकट का समाधान शामिल किया गया है.

हरित ऊर्जा बढ़ाने का प्रयास
 
नई दिल्ली घोषणापत्र में पहली बार समय-सीमा निर्धारित करते हुए साफ और हरित नवीकरणीय उर्जा उत्पादन 3 गुणा बढ़ाने और उर्जा तीव्रता को दो गुणा बढ़ाने की सामूहिक इच्छा व्यक्त की गयी, जिसे 2030 तक हासिल करना है. ऊर्जा तीव्रता की गणना प्रति इकाई जीडीपी या सकल घरेलू उत्पाद में खर्च हुई ऊर्जा  से की जाती है. ऊर्जा तीव्रता बढ़ने से कम ऊर्जा खपत में ज्यादा से ज्यादा आर्थिक गतिविधि को बल मिलता है. इन दो लक्ष्यों को हासिल करने की सामूहिक सहमति को साफ और हरित ऊर्जा के बढ़ोतरी की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है. 

ये दोनों प्रयास जलवायु संकट से बचाव और वैश्विक आर्थिक विकास में होगा, अगर इसके लिए आवश्यक तकनीक के आदान-प्रदान और जरुरी आर्थिक संसाधन जुटा लिए जाएं. 2030 तक साफ ऊर्जा सहित सतत् विकास के सभी लक्ष्यों को मूर्त रूप देने के लिए घोषणापत्र के मुताबिक कम से कम 3 ट्रिलियन डॉलर सालाना विनिवेश की जरूरत होगी. हालांकि, आर्थिक संसाधन के न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए इसी घोषणापत्र में बहुपक्षीय विकास बैंक (MDB) में पर्याप्त सुधार की जरुरतों पर बल दिया गया है; जिसमें विकासशील देशों के लिए $100 बिलियन का स्पेशल कर्ज सहित कई अन्य उपाय भी शामिल हैं. ताकि कम विकसित और विकासशील देशों की गरीबी, आर्थिक विकास और जलवायु सम्बन्धी आर्थिक जरूरतों को पूर्ण किया जा सके. 

लेकिन, वैश्विक स्तर पर ये सुधार प्रक्रियायें इतनी सुस्त और जटिल हैं कि इसे धरातल पर उतरने में काफी समय लगेगा. वहीं वर्तमान जरुरत त्वरित कार्यान्वयन की है. यहां तक की यूएनएफसीसीसी ने जी-20 शिखर सम्मलेन के समय जारी किये पहले ‘ग्लोबल स्टॉकटेक’ में विकासशील देशों मे जलवायु संकट से बचाव में मुख्य रूप से आर्थिक सहयोग की कमी को इंगित किया है. जहां अग्रणी विकसित देश ना सिर्फ अपने उत्सर्जन में जरुरी कमी करने में विफल हुए है, बल्कि विकासशील देशों के हरित पहलों के साथ ऊर्जा जरूरतों में वादे के मुताबिक वित्तीय सहयोग नहीं कर पा रहे हैं.

जी7 और ग्लोबल साउथ के बीच पुल का काम

भारत की अगुवाई में पिछले एक साल में विकसित देश खास कर ‘जी7 देश’ और ग्लोबल साउथ के देशों के बीच प्रमुख वैश्विक मुद्दों के बीच एक पुल बनाने का काम हुआ है. इसी कड़ी में पहली बार उत्सर्जन तीव्रता और नवीकरणीय उर्जा पर आर्थिक और तकनीकी सहयोग के आधार पर 2030 तक सामूहिक रूप से एक निश्चित लक्ष्य निर्धारण पर सहमति बनी है. लेकिन, जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता में कमी करने पर कोई समय-सीमा तय नहीं की जा सकी है. घोषणापत्र में केवल कोयले सहित अन्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता ख़त्म करने की बात की गयी है, जबकि मौजूदा घोषणापत्र में विकासशील देशों की विकास प्रक्रिया, जीवाश्म  ईंधन का इस्तेमाल और विकसित देशों की तरफ से बहुपक्षीय विकास बैंक पर नियंत्रण के दुष्चक्र पर निर्णायक पहल की अपेक्षा की जा रही थी. 

आज भी दो-तिहाई से अधिक उर्जा की जरुरत जीवाश्म ईंधन, जिसे मुख्य रूप कोयला से पूरी की जाती है और पेरिस समझौते सहित कई अन्य जलवायु सम्बन्धी रिपोर्ट में कोयला के उपयोग को लेकर चेतावनी जारी की जा चुकी है. हाल के वर्षो में जिसे मौजूदा साल भी शामिल है, वैश्विक गर्मी में बेतहाशा वृद्धि से ये स्पष्ट है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य पूरा करने की समय अवधि पहले के अनुमान से कहीं तेजी से नजदीक आ रही है. यही लक्ष्य अब एक कठिन स्वरुप ले चुका है. अब हमें साल 2009 के उत्सर्जन के मुकाबले 2030 तक ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को आधा करना होगा जो मौजूदा जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता ख़त्म किये बिना हासिल करना संभव प्रतीत नहीं होता. 

विकसित देशों की ढुलमुल नीति के बावजूद दिल्ली पहुंचे संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंतोनियो गुतारेस आशान्वित थे कि कम से कम विकसित देश नेट शून्य उत्सर्जन की सीमा में कमी पर सहमत हो पाएंगे. घोषणापत्र में नेट शून्य उत्सर्जन के 2050 तक के लक्ष्य में कोई कमी पर सहमति नहीं बन पाई. कार्बन उत्सर्जन के लिहाज से ईंधन तीन प्रकार के होते हैं, एक जिसमें कार्बन का उत्सर्जन नहीं होता, दूसरा कार्बन न्यूट्रल जैव ईंधन जो जिसमें कार्बन उत्सर्जन पुनः पेड़ पौधों द्वारा फिक्स कर दिया जाता है और तीसरा कार्बन पोजेटिव जो लाखों साल से कार्बन चक्र से बाहर रहे जीवाश्म ईंधन, जो जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण है. नेट शून्य उत्सर्जन लक्ष्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता ख़त्म कर जीरो कार्बन जैसे सौर उर्जा, हाइड्रोजन आदि और कार्बन न्यूट्रल जैसे जैव ईंधन उर्जा स्रोत का विकास करना है. 

भारत ने अपनी मौजूदा नेतृत्व का शून्य कार्बन और कार्बन न्यूट्रल ईंधन के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का वातावरण बनाने में बेहतरीन प्रयास किया है, जिसकी बानगी इन्टरनेशनल सोलर अलायंस के तर्ज पर ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस का गठन है. जलवायु विमर्श का मुख्य मुद्दा अब तक विकसित और विकासशील देशों के बीच भिन्न दृष्टिकोण के बीच सहमति बनाना रहा है, जो यूएनएफसीसीसी बैठकों सहित हर प्रमुख वैश्विक संगठन में मुखर होती रही है. 

इसी कड़ी में भारत की तरफ से नवीकरणीय उर्जा, बहुपक्षीय विकास बैंक में विकासशील देशों के अपेक्षित सुधार के लिए पहली बार आम सहमति बना पाना और अफ्रीकी संघ को सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक आर्थिक समूह में शामिल करा लेना वैश्विक लोकतंत्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान माना जाना चाहिए. मौजूदा जी-20 शिखर बैठक में भले ही जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता समाप्त करने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की जा सकी, फिर भी जलवायु संकट से जुड़े मुद्दे पर बनी आम सहमति अगले कुछ महीनों में दुबई में होने वाली कॉप28 (कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टी) के लिए एक दिशा-निर्देश जैसा काम करेगी. वर्तमान परिदृश्य में भारत की अध्यक्षता में आम सहमति से जारी किया गया घोषणापत्र भारत के ‘एक धरती’ ‘एक परिवार’ और ‘एक भविष्य’ के लिहाज से सफल दस्तावेज है.   

कुशाग्र राजेंद्र, एमिटी यूनिवर्सिटी हरियाणा में पर्यावरण विभागाध्यक्ष हैं. वे पर्यावरण के मुद्दे पर लगातार अलग-अलग मंचों पर लिखते रहते हैं. कुशाग्र राजेंद्र ने अपनी पढ़ाई जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन संस्थान यानी स्कूल ऑफ इनवॉयरनमेंटल स्टडीज से की है. वह वर्तमान में एमिटी यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम में पर्यावरण अध्ययन विभाग में पढ़ाते हैं. अपने खाली समय में कुशाग्र फोटोग्राफी और घूमने का शौक रखते हैं और उनके संग्रह में प्रकृति की बहुत अच्छी तस्वीरें हैं. कुशाग्र मूलतः बिहार के रहने वाले हैं.
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