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Explained: कांगों फीवर किस बला का है नाम? जिससे चली जाती है जान, जानें सबकुछ

Crimean Congo Hemorrhagic Fever:वायरस से फैलने वाली बीमारियां दुनिया भर में दहशत ला रही है. इस हफ्ते ही स्पेन (Spain) में कांगो फीवर वायरस (Congo Fever) का एक मामला सामने आया है.

Crimean Congo Hemorrhagic Fever: स्पेन में बीते हफ्ते क्रीमियन कांगो हेमोरेजिक रक्तस्रावी फीवर (Crimean Congo Hemorrhagic Virus Fever-CCHF) का एक केस  सामने आया है. इससे दुनिया भर में इस बीमारी को लेकर दहशत फैलने लगी है. इस जानलेवा बीमारी में जान जाने में देर नहीं लगती. विश्व स्वास्थ्य संगठन-डब्ल्यूएचओ (World Health Organization-WHO) के मुताबिक इस बीमारी में मृत्यु दर 10 से 40 फीसदी के बीच है. साल 2011 में ये बीमारी भारत को भी अपनी चपेट में ले चुकी है. इसका वायरस बेहद खतरनाक होता है. आज इसी कांगो फीवर के बारे में जानने की यहां कोशिश करेंगे.

ताजा मामला स्पेन का

स्पेन के अधिकारियों के मुताबिक गुरुवार 21 जुलाई को एक अधेड़ शख्स के क्रीमियन-कांगो रक्तस्रावी बुखार (CCHF) से  पीड़ित होने के मामला सामने आया है. इस मरीज को पहले स्पेन के उत्तर-पश्चिमी शहर लियोन (Leon) के एक लोकल अस्पताल में भर्ती कराया गया था. इस शख्स में एक टिक (Tick) के काटे जाने के बाद बीमारी के लक्षण दिखाई पड़े थे. मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे सेना के विमान से दूसरे अस्पताल ले जाया गया. स्पेन में कांगो फीवर पहला केस साल 2011 में आया था और वहां 2016 में इस फीवर से  एक मौत दर्ज की गई.

ईराक में तेजी से रहा फैल

इराक (Iraq) में कांगों फीवर बेहद तेजी से फैला है. यहां मई 2022 तक इस फीवर के 111 से अधिक केस आ चुके हैं. यहां इस फीवर से 19 लोगों की मौत हो चुकी है. गौरतलब है कि यहां मरीजों की नाक से खून आ रहा है और उनकी मौत हो रही है. इराकी स्वास्थ्य मंत्रालय (Iraqi Ministry of Health) के मुताबिक यहां पहला मामला 1979 में कुर्दिस्तान के अरबील (Erbil) में आया था. तब यहां 17 साल का एक युवा कांगो फीवर का शिकार हुआ था.

भारत में भी आई थी ये बीमारी

भारत में पहली बार जनवरी 2011 में कांगो फीवर के केस आए थे. तब गुजरात में इस बीमारी से कम से कम तीन लोगों की मौत हुई थी. इससे पहले ये खतरनाक बीमारी भारत में कभी नहीं देखी गई थी. 

कहां से आया कांगो फीवर

पहली बार क्रीमिया (Crimea) में 1944 में कांगो हेमोरेजिक रक्तस्रावी फीवर का केस आया था. इसके बाद साल 1969 में कांगों में भी इसी तरह का संक्रमण फैला था. इसी वजह से इस वायरस को क्रिमियन कांगो वायरस का नाम दिया गया. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक यह अक्सर अफ्रीका (Africa), बाल्कन (Balkans),मध्य पूर्व (Middle East )और एशिया (Asia) में पाया जाता है, हालांकि यूरोप (Europe) में इसके केस कम देखने को मिलते हैं. साल 2001 में कोसोवो,अल्बानिया, ईरान, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका में कांगो वायरस का खतरनाक संक्रमण फैला था.

कैसे फैलता है

डब्ल्यूएचओ (WHO) का कहना है कि यह रक्त या शारीरिक तरल पदार्थों के निकट संपर्क से मानवों के बीच फैल सकता है. आमतौर पर यह जानवरों की बीमारी है और टिक्स यानी पिस्सू के काटने से उनमें होती है. स्पेन में आया हालिया मामला टिक्स के काटने से इंसानों के भी कांगो के चपेट में आने का है. एक बार कांगो फीवर के वायरस के चपेट में आने के बाद इसे पूरे शरीर में फैलने में तीन से नौ दिन लग सकते हैं. जानवरों के खून या ऊतक और टिक्स के काटने या संपर्क में आने से अक्सर यह बीमारी इंसान को अपना शिकार बनाती है. इस बीमारी में जान जाने की बहुत संभावना होती है. कांगो फीवर बीमारी से 30 से 80 फीसदी लोगों की मौत हो जाती है.

बीमारी के लक्षण

कांगो फीवर के मरीज में बीमारी की प्रारंभिक अवस्था में बुखार, मांसपेशियों में दर्द, चक्कर आना, आंखों में दर्द, हल्की संवेदनशीलता, उल्टी और गले में खराश जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं. इस वजह से शरीर में आंतरिक रक्तस्राव की संभावना होती है और गंभीर स्थिति में शरीर के सारे अंग काम करना बंद कर देते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ कुछ लोगों को पीठ में दर्द और मितली की शिकायत के साथ गला बैठने की परेशानी भी देखी गई है. बीमारी की गिरफ्त में आने के लगभग 2 से 4 दिन बाद लक्षणों में इजाफा होता जाता है. हार्ट रेट बढ़ने, गले, नाक या मुंह खून निकलने लगता है. कई बार मरीजों की किडनी और लीवर फेल हो जाता है.

कैसे करें काबू

मरीज के रिश्तेदारों और उनका इलाज करने वाले डॉक्टर्स को भी सावधानी बरतने की जरूरत है. इन्हें मरीज के शरीर से निकलने वाले तरल स्त्राव जैसे नाक,आंख मुंह से बहने वाले पानी, मुंह की लार से दूर रहना चाहिए. इसके साथ ही कांगो फीवर जैसे लक्षण दिखने पर तुरंत अस्पताल में संपर्क करना चाहिए. इस फीवर से बचाव के लिए अभी तक कोई वैक्सीन नहीं आई है. एंटीवायरल दवाओं को कांगो फीवर का कारगर ट्रीटमेंट माना जाता है. हालांकि इस बीमारी को पूरी तरह से काबू कर पाना मुश्किल है.

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