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'सोनी' के डायरेक्टर ने कहा- मैंने महिला या पुरुष नहीं, एक इंसान की कहानी लिखी, पढे़ं- इवान आयर का खास Interview

नेटफ्लिक्स फिल्म 'सोनी' में दिल्ली पुलिस में काम करने वाली दो महिलाओं की कहानी है, फिल्म के डायरेक्टर इवान आयर हैं. एबीपी न्यूज़ ने इवान ने उनकी इस फिल्म को लेकर खास बातचीत की है.

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नई दिल्ली: नेटफ्लिक्स फिल्म 'सोनी' रिलीज के बाद से ही चर्चा में है. इस फिल्म में दिल्ली पुलिस में काम करने वाली दो महिलाओं की कहानी है, फिल्म के डायरेक्टर इवान आयर हैं. निर्भया गैंगरेप के बाद लगातार टीवी और अखबार में आ रही खबरों ने उन्हें ये फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया. इवान का कहना है कि उस समय दिल्ली पुलिस (Male) से लगातार सवाल पूछे जा रहे थे. उस दौरान उन्हें लगा कि इसमें महिला पुलिस का नज़रिया मिसिंग है और तभी उन्हें ये फिल्म बनाने का ख्याल आया. इवान की इस डेब्यू फिल्म को वेनिस सहित कई फिल्म फेस्टिवल्स में सराहा जा चुका है. सोशल मीडिया पर भी लगातार फिल्म को लेकर सकारात्मक फीडबैक मिल रहा है. एबीपी न्यूज़ ने इवान ने उनकी इस फिल्म को लेकर खास बातचीत की है. यहां पढे़ं-

सवाल- 'सोनी' का कैरेक्टर आपने कैसे गढ़ा? जो आप दिखाना चाहते थे वैसा बनाने में आपको कितना समय लगा?

इवान आयर का जवाब- ये आइडिया मुझे 2014 में आया. मैंने टीवी और अखबारों में दिल्ली पुलिस के बहुत सारे इंटरव्यू देखे थे जिसमें मेल पुलिस ऑफिसर्स से पूछा जा रहा था कि वो दिल्ली की सुरक्षा के लिए क्या कर रहे हैं. मुझे लगा कि इसमें एक महिला पुलिस ऑफिसर का नजरिया मिसिंग है. महिला पुलिस इस तरह की क्राइसिस को किस नजरिए से देखती हैं. मुझे लगा कि ऐसी महिला जिसके पास पावर है, लेकिन फिर भी महिला होने के कारण उसे भी उन्हीं क्राइम का शिकार है जो आम लड़की के साथ हो रहा है. ऐसी महिला पुलिस का नजरिया बिल्कुल अलग होगा.  जब मैं कहानी लिख रहा था मेरी प्रोड्यूसर भी उसमें स्क्रिप्ट कंसल्टेंट भी रहीं. मैं उनसे डिस्कर करता था कि मैं कहीं ऐसा ना लिख दूं जो वन साइडेड लगे.

सवाल- जब पुलिस की बात होती है तो हिंदी सिनेमा में 'दबंग', 'सिंघम' जैसे कैरेक्टर्स सामने आते हैं. क्या आपको कभी 'सोनी' के कैरेक्टर को ग्लोरिफाई करने का ख्याल नहीं आया? 

इवान आयर का जवाब-  मैंने पहले से ही ये सोच रखा था कि जो किरदार हम दिखा रहे हैं वो एक इंसान हैं. उसमें कमियां भी हैं और खूबियां भी हैं. मैंने सोचा था कि मैं ये दिखाउंगा कि उनसे गलतियां भी हो सकती हैं और वो ईमानदारी से अपना काम भी कर रहे हैं. मुझे लगा ऐसा दिखाउंगा तो दर्शक उन किरदारों से गहरा कनेक्शन बना पाएंगे. इनकी कहानी ऑडियंस को प्रभावित करेगी तभी उनका ह्यूमन कनेक्शन बन पाएगा. जब हम किरदारों को सुपर ह्यूमन दिखाते हैं कि उनके पास वर्दी है और पावर है तो वो रियलिस्टिक नहीं होता. हमें समझना चाहिए कि जिन्हें भी ये जिम्मेदारी दी गई है कि उन्हें कानून का पालन और रक्षा करनी है और वो भी इसांन ही हैं. उनके इमोशन्स हैं. ये अलग बात है कि उन्हें अपने इमोशनल को अपने तक रखना होता है.

Netflix Film Soni's Director Ivan Ayer Interview

कितना आसान या मुश्किल होता है कैरेक्टर की कॉम्प्लेक्सिटी को दर्शकों के सामने दर्शाना?

इवान आयर का जवाब- लिखना तो मुश्किल नहीं है लेकिन दिखान बहुत अलग चीज है. ये निर्भर करता है कि आपने जो लिखा है उसमें कितनी गहराई है. मैं इसे लिखते वक्त बिल्कुल भूल गया था कि मैं महिला के बारे में लिख रहा हूं या फिर पुरुष के बारे में लिख रहा हूं. मुझे सबसे पहले ये दिखाना जरुरी लगा कि एक इंसान कि जो गरिमा है अगर वो उसे नहीं मिल पा रही है तो उसे गुस्सा आएगा. उस सिचुएशन में वो जैसे रिएक्ट करता है, मुझे लगता था कि पुरुष भी ऐसे ही रिएक्ट करेगा. मैंने एक इंसान के तौर पर एक इंसान की कहानी लिखी. ये उस तरह से नहीं समझा जाएगा कि इससे महिला या पुरुष रिलेट कर पाएगा या नहीं. मैं दर्शकों का जो रिएक्शन देख रहा हूं उससे लगा कि मेरा फैसला सही था. इससे महिला और पुरुष दोनों ही इससे रिलेट कर पा रहे हैं. हम इस तरह की सोच में लग जाते हैं कि पुरुष कुछ अलग सोचेगा जबकि सच्चाई ये है कि दोनों में कोई अंतर नहीं है.

इस फिल्म के हर एक सीन को एक बार में फिल्माया गया है. इसके पीछे आपकी क्या सोच थी? 

इवान आयर का जवाब- ये बात मेरे दिमाग में पहले से थी. मैं जिन फिल्मों से मैं प्रेरित हूं, जिन फिल्ममेकर्स को गुरु मानता हूं उनकी फिल्मों में ऐसा होता है. ऑर्ट फिल्मों में ऐसा होता है. ये कोई नई बात नहीं है. रिजनल सिनेमा में कॉमन है. हिंदी सिनेमा में ये ज्यादा कॉमन नहीं है. मेरा नजरिया था कि अगर आप पुलिस स्टेशन में हैं तो कैमरा किरदार के साथ रहेगा. मेन स्टोरी का फोकस किरदार है, कैरेक्टर है. उस कैरेक्टर के साथ जुड़ने के लिए ये जरुरी है कि दर्शक वही देखें जो किरदार देख रहा है. अगर किरदार अकेला है तो उसके भाव दिखें. जब मैं रिसर्च कर रहा था तो मैंने दिल्ली पुलिस के साथ भी समय बिताया. जिस तरह मैं उन्हें ऑब्जर्ब किया मुझे उसे ही दर्शकों के साथ शेयर करना था. कट करके मैं दर्शकों को मैनिपुलेट नहीं करना चाहता था. हालांकि फिल्म के कुछ सीन्स का हमने रिटेक भी किया.

फिल्म की पब्लिसिटी नहीं हुई है. लोगों को इसके बारे में रिलीज के बाद पता चला. इसे आप दूर-दराज की महिलाओं तक कैसे पहुंचाएंगे? 

इवान आयर का जवाब- हमारे पास बजट नहीं था. ये फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई गई है. हर संभव हमने सोशल मीडिया के जरिए इसका प्रमोशन किया था. आजकल मार्केटिंग का बहुत बड़ा बजट होना चाहिए. लेकिन अब इस पर मैं ज्यादा कमेंट नहीं कर सकता. मेरा काम सिर्फ फिल्म बनाना है. छोटे शहरों में जो लोग रहते हैं उनके पास अभी इंटरनेट ना हो लेकिन आज नहीं तो कल उनके पास ये सुविधा होगी. ये मेनस्ट्रीम जैसा नहीं है कि फिल्म आज थियेटर में लगी और कुछ दिनों बाद हट गई. ये फिल्म काफी समय तक रहेगी. मैं उस तरह की फिल्में बनाने में विश्वास रखात हूं जिसे 10 साल  बाद देखकर उतना ही अच्छा लगे.

इस फिल्म के जरिए आप क्या संदेश देना चाहते हैं? कोई भी सिनेमाप्रेमी आपकी इस फिल्म को क्यों देखे?

इवान आयर का जवाब- मेरा काम है कि जो मैं समाज में देख रहा हूं कि उसे सामने लेकर आऊं. हम खबरों में किसी घटना के बारे में पढ़ते-देखते हैं. उसके पीछे जो प्रॉब्लम है वो कितनी छोटी छोटी चीजों से शुरु होती है, फैमिली से शुरु होती है. ये सब दिखाना हमारा काम है. जो सिनेमा लवर्स हैं वो इस फिल्म को इसलिए देखें क्योंकि ऐसा सिनेमा भारत में देखन को नहीं मिलता. अगर वो उसे देखकर अपने दोस्तों और फैमिली के साथ शेयर करेंगे तो अवेयरनेस बढ़ेगी और फिर बाकी फिल्म मेकर्स को प्रोत्साहन मिलेगा कि ऐसी फिल्में और भी बन सके.

SONI REVIEW: आपको बता दें कि सोनी फिल्म को इवान ने इतना रीयल बनाया है कि ऐसा लगता है कि हर घटना हमारे सामने घट रही है. ना झन्नाटेदार म्यूजिक, ना ही सीटीमार डायलॉग.. ना ही एक्शन सीक्वेंस. बॉलीवुड में ऐसी फिल्में बनती नहीं हैं. ऐसा सब्जेक्ट पर जो फिल्में बनती हैं उसे हिट बनाने के चक्कर में इतना कुछ डाल दिया जाता है कि फिल्म मसालेदार बनकर रह जाती है. सोनी अपनी कहानी और अभिनय से आपका दिल जीत लेगी. इसे जरुर देखें.

Published at : 26 Jan 2019 02:35 PM (IST) Tags: interview Netflix
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