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BLOG: ये देश एक बाग है, इस बाग की शाहीन हैं हम

शाहीन बाग से चंद बातें और. धरने में जो कामकाजी औरतें बैठी हैं, उनके लिए थोड़ा मुश्किल है. उन्हें घर के साथ-साथ बाहर के काम भी करने हैं और फिर यहां भी आना है. मेहमाननवाजी भी करनी होती है. मेहरुनिसा की ननद के ससुराली आ गए उस दिन तो उनकी खातिर करने के बाद उन्हें भी यहीं ले आई.

आपका नाम क्या है, जब शाहीन बाग की एक हिजाबपोश से पूछा तो वह बोली- मेरा नाम शाहीन बाग है. सामने पोस्टर लगा है, यह देश एक बाग है और इस बाग की शाहीन हैं हम. सैकड़ों की भीड़ में खुद तलाश कर बात करने लगी, शाहीन बाग. मैं भी शाहीन बाग- जवाब दिया. मुस्कुरा दी, वह शाहीन बाग. मुस्कुराहट के साथ ही करीब बीस दिन से विरोध में धरने पर बैठी है. बिना मुस्कुराए यह लंबा सफर कैसे तय किया जा सकता है.

शाहीन बाग का डेली रूटीन बड़ा अजब है. पालियों में बैठती हैं यहां औरतें. सुबह किसी की पाली है, दोपहर को किसी की और शाम से किसी की. दूर-दराज से आने वालियां रात होते घर को निकल जाती हैं और आस-पास की रात का मोर्चा संभाल लेती हैं. नजमा के छोटे बच्चे हैं, भूख लगती है ना... तो घर जाना ही पड़ता है. खाना वगैरह कौन बनाएगा वरना... औरतों को घर-बाहर दोनों संभालने पड़ते हैं. सुबह बच्चों का स्कूल होता है, इसलिए वह बच्चों-शौहर के लिए खाने की सारी तैयारी करके, बारह बजे तक आ पाती है. फिर कुछ घंटे बैठकर वापस जाती है. फिर शाम से देर रात तक बैठती है. फिरदौस के लिए देर रात रुकना मुश्किल नहीं- उसके घर पर सब बड़े हैं. वह रात भर रुक जाती है. ऐसी बहुत सी हैं जो रात भर बैठी रहती हैं. खाला, फूफी, बड़ी अम्मी... नाम क्या हैं, हम भूल जाते हैं. हमें याद रहते हैं उनके दमकते चेहरे- चेहरों की मुस्कान. उनकी खिलखिलाहट. हम देश छोड़कर क्यों जाएं? हमारे बाप-दादा, सब यहीं के बाशिंदे हैं.

हम सवाल नहीं करते. हमें तो डेली रूटीन जानना है इन विरोधिनों का. बातूनीपन राजनीति की खासियत है. जनता की खासियत तो मुस्कुराना और एक दूसरे का साथ देना है. साथ दे भी रही हैं- फातिमा बैठी-बैठी ऊबती है तो अपने साथ ऊन और सलाइयां ले आती है. फरहत अप्पी से गोलू के लिए नए स्वेटर का डिजाइन सीख लेगी. जीनत का रोजा है तो उसके लिए गोलू से अमरूद मंगवा दिए हैं. वैसे गोलू इस आयोजन में वॉलियंटिर है. अपने दोस्तों के साथ आने-जाने वालों को दरियों पर जूतों समेत चढ़ने से रोक रहा है. दोनों तरफ दरियां बिछी हैं. सामने एक माइक और कुछ खाली जगह है. बीच में एक पगडंडी छूटी हुई है. बस आपको पगडंडी पर चलना है. दरियों पर न चढ़ें प्लीज. गोलू कह रहा है.

स्वेटर तीन अंगुल बढ़ गया है, पर नजरें सामने बोलने वाले वक्ता पर गड़ी हैं- वक्ता फैज की नज्म पढ़ रहा है- रख्त-ए-दिल बांध लो दिलफिगारों चलो/फिर हमीं क़त्ल हो आयें यारों चलो/ आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो. वही फैज़ जिनके तख्त उछालने और ताज गिराने पर बहुतों को ऐतराज है. हम पूछ लेते हैं- आपने फैज पढ़ा है? नहीं… हम पढ़ना नहीं जानते, सिर्फ सुना भर है. सुना है, वह पाकिस्तान चले गए थे. हमें क्या... हमारा पाकिस्तान के किसी भी शख्स से क्या ताल्लुक. सलाइयां तेजी से चल रही हैं. आज मियां जी ने कहा है कि अच्छा कुछ खाने का मन है. अपनी पाली खत्म करके, मुझे सब्जी भी लेनी है. फातिमा बोल पड़ती है. कल रात दो बजे ही घर जाना पड़ा था- शिफा को सर्दी लग गई है.

हम फिर हिजाबपोश शाहीन बाग को तलाशते हैं- वह एक मेकअप आर्टिस्ट है. घर में शौहर और दो बच्चे हैं. कहती है, यहां 80 फीसद औरतें हाउसवाइव्स हैं. कैसे मैनेज करती होंगी सब कुछ आप बताइए- क्यों, वर्किंग वुमेन कैसे सब संभालती हैं. जब हमारी मौजूदगी ही दांव पर लगी हो तो सब कुछ मैनेज करना पड़ता है. बीस दिन की बच्ची लेकर बैठी औरत से पूछिए...वह जच्चा है, उसे खुद देखभाल की जरूरत है. बच्ची के बारे में भी नहीं सोचती... या उसी के बारे में सोचकर बैठी है. तीन तलाक के बारे में कानून बनाने वाली सरकार अब मुस्लिम औरतों की बात क्यों नहीं सुनना चाहती... शाहीन बाग पूछती है.

हमारे पास कोई जवाब नहीं. इधर नारे उठ रहे हैं और हवा पर तैर रहे हैं. एक धुन है, अपनी बात करने की. सामने माइक के सामने कुछ नौजवाब गा रहे हैं. मुस्कुराहटें हैं और गले की तनी हुई नाजुक नसें. आखिरकार कामयाब होने के यकीन का हमेशा ताज़ा रहने वाला गीत गा रहे है. दोनों ओर छोटे-छोटे पोस्टर हैं: हिंसा नहीं, वाद-विवाद और विचार की मांग करते हुए. कुछ सवाल करते हुए- कुछ जवाब देते हुए. एक जवाब है- हां, जुल्मतों के दौर में ही गीत गाए जाएंगे. कुछेक पोस्टर हिंदी में हैं, कुछेक अंग्रेजी और कुछ उर्दू में. यह भाषा की संस्कृति है, भाषा ही भाषा, यहां नफरत नहीं है, सब कुछ को समेट लेने की ख़ुशी है. निदा पेन लेकर कॉपी में कुछ लिख रही है- कॉलेज का काम मिला है, वह करना जरूरी है. ऐतराज जताने के साथ-साथ पढ़ाई भी तो जरूरी है. उसके होंठ एक निश्चय में भिंचे हुए हैं. बेशक, पढ़ाई ही तो आपको सवाल करने, और ऐतराज जताने की हिम्मत देती है. इस हुजूम में दहशतगर्दी की पनाहगार बताए जाने वाले जामिया की छात्राएं हैं. देशद्रोहियों का गढ़ बताए जाने वाले जेएनयू की छात्राएं भी. कुछेक के माता-पिता भी साथ हैं. बेशक, मुसलमानों की तरफ से बोलने के लिए मुसलमान होना ज़रूरी नहीं. यहां विरोध है, लेकिन नफरत नहीं. सब खुश हैं. यह साथ की खुशी है. सब अलग हैं, फिर भी सब साथ हैं.

शाहीन बाग से चंद बातें और. धरने में जो कामकाजी औरतें बैठी हैं, उनके लिए थोड़ा मुश्किल है. उन्हें घर के साथ-साथ बाहर के काम भी करने हैं और फिर यहां भी आना है. मेहमाननवाजी भी करनी होती है. मेहरुनिसा की ननद के ससुराली आ गए उस दिन तो उनकी खातिर करने के बाद उन्हें भी यहीं ले आई. पांच वक्त की नमाज कैसे हो रही है... वहां पिछली तरफ नमाज पढ़ लेते हैं. कई बार तीन बार की एक बार में पढ़कर यहां आ जाते हैं. इस प्रदर्शन को भी तो कामयाब बनाना है. कब तक बैठेंगे इस धरने में? यह तो खुदा ही जाने. अच्छा, आपका नाम असल में क्या है... शगुफ्ता- शाहीन बाग बोलती है.

शाम ढल गई है. लोग विदा हो रहे हैं. और लोग आ रहे हैं- आएंगे! अभी तो कई-कई बार आना होगा यहां. नए चेहरे गहराती शाम के बीच चमकते जाते हैं. हम कहना चाहते हैं, शुक्रिया साथिनों. इस लौ को जिंदा रखने के लिए.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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