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मोदी सरकार के 9 साल: 45 करोड़ लोगों का जनधन एकाउंट, 10 सरकारी बैंकों का विलय... जानें किस तरह बदला बैंकिंग सेक्टर

बैंक हमारी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. व्यक्ति, समाज और देश से जुड़े सारे आर्थिक हित अपने वित्तीय लेनदेन के लिए बैंकों का इस्तेमाल करते हैं. यह दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक माना जाता है. आज 26 मई को मोदी सरकार के जब 9 साल पूरे हो रहे हैं, तो इसका लेखा-जोखा भी होना चाहिए कि देश के विकास के लिए बैंकिंग सेक्टर में किस तरह के सुधार किए गए हैं?  पिछले कुछ वर्षों में बैंकिग क्षेत्र में ढांचागत बदलाव किया गया है. 2014 ईस्वी में प्रधानमंत्री के प्रयास से लगभग 45 करोड़ लोगों ने प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत अपने अकाउंट खोले. 2018 में सरकार ने पोस्ट ऑफिस नेटवर्क का इस्तेमाल कर हरेक गांव में पहुंचने का लक्ष्य लेकर इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक की शुरुआत की. 

2020 में सरकार ने 10 सरकारी बैंकों को बड़े बैंकों में मिला दिया. इस मिलन से भारतीय बैंकों को पर्याप्त पूंजी और आकार मिला जो अधिकांश विदेशी बैंकों के पास है. रीकैपिटलाइजेशन, सुधार, इनसॉल्वेन्सी एंड बैंकरप्सी कोड भी इस क्षेत्र के लिए लागू किए गए. प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता के 75 वर्षे पूरे होने पर 75 जिलों में 75 डीबीयू (डिजिटल बैंकिंग यूनिट) का भी उद्घाटन किया. कोर बैंकिंग सिस्टम के साथ ही 35 करोड़ पोस्ट ऑफिस जमाखातों को भी जोड़ा गया. 

2020 में ह्वाट्सएप ने भारत में यूपीआई पेमेंट सर्विस को लांच किया. नियो बैंक को ही अब बैंकिंग का भविष्य बोला गया. आरपीए (रोबोटिक प्रॉसेस ऑटोमेशन),एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) मशीन इंटेलिजेंस वगैरह का इस्तेमाल भी बैंकों ने शुरू किया. भारत ने बजट में डिजिटल करेंसी के लिए योजना का बजट में प्रावधान किया. एचडीएफसी बैंक इसके पैरेंट संगठन हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनांस कॉरपोरेशन के साथ विलय के बाद दुनिया के 10 सबसे मूल्यवान बैंकों में से एक हो गया है. यह दुनिया के शीर्ष 10 बैंकों में पहुंचनेवाला पहला बैंक है.  

चुनौतियां भी हैं बेशुमार

डेलॉइट रिसर्च एजेंसी के एक शोध के मुताबिक, अभी 110 करोड लोग मोबाइल का इस्तेमाल भारत में करते हैं, जिसमें से 72 करोड़ लोग स्मार्टफोन रखते हैं और 2026 तक यह संख्या 100 करोड़ हो जाएगी. हालांकि, ऑनलाइन फ्रॉड की वजह से केवल 4 करोड़ लोग ही मोबाइल बैंकिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि पिछले 3 वर्षों में लोगों से 473 करोड़ रुपए की ऑनलाइन ठगी हुई है.  

इसी अवधि में देश ने कई सारे बैंकिंग घोटाले भी देखे हैं, जिसमें डीएचएफएल (35 हजार करोड़), एबीजी शिपयार्ड (23 हजार करोड़), नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के बैंक घोटाले (10 हजार करोड़) और विजय माल्या (9 हजार करोड़) के बैंक घोटाले शामिल हैं. पिछले कुछ वर्षों में बैंकों के एनपीए कम हुए हैं, लेकिन सके पीछे का काला अध्याय मिटा दिया गया है. बैंकों ने पिछले पांच साल में जितना लोन की रकम वापस पायी है, उससे दोगुनी राइट ऑफ की गयी है. वित्तीय वर्ष 2021-22 में कमर्शियल बैंकों (शेड्यूल्ड बैंक) ने कुल 1,74,996 करोड़ के लोन को राइट ऑफ किया है, जबकि केवल 33,534 करोड़ की रिकवरी हुई है और पिछले पांच वर्षों में 10 लाख करोड़ का लोन राइट ऑफ किया गया है. 

रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रपट ने 29 दिसंबर 2022 को कहा कि हम अब भी संकट में हैं और पब्लिक सेक्टर बैंकों का एनपीए बढ़कर सितंबर 2023 में 9.4 फीसदी हो सकता है. निजी बैंकों का सकल एनपीए भी बढ़कर 5.8 फीसदी हो सकता है. अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मुताबिक अमेरिका और ब्रिटेन में खराब लोन का प्रतिशत 1 फीसदी है. कनाडा में यह 0.4 फीसदी है, दक्षिण कोरिया में 0.2 फीसदी (2020) और स्विटजरलैंड में 0.7 प्रतिशत है. चीन जो वित्तीय घोटालों पर कड़ी नजर रखता है, उसका एनपीए 1.7 फीसदी है और मलेशिया-इंडोनेशिया का भी 2.6 प्रतिशत जो काफी अच्छा है.  

आगे की राह

बड़े कॉरपोरेट्स के खराब कर्जों को राइट-ऑफ करने की जगह भारत को कर्ज वसूलने की प्रक्रिया सुधारनी चाहिए. सरकार को बैंकों को निजीकृत करने की होड़ में नहीं पड़ना चाहिए, बल्कि समग्र प्रशासनिक सुधार पर जोर देना चाहिए, क्योंकि अगर प्राइवेट बैंक स्वाधीन बोर्ड के साथ चल सकते हैं तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भी ऐसा कर सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय एजेंसी पीडब्ल्यूसी के मुताबिक भारत 2040 तक दुनिया का तीसरा बड़ा बैंकिंग हब बन सकता है. डिजिटल बैंकिंग निकट भविष्य में सबसे बड़ी होगी और यह इंडियन बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था के शीर्ष पर होगी. इसे बस सुरक्षित और आरामदेह बनाने की जरूरत है. 

गरीब से गरीब आदमी के लिए भी बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाने की जरूरत है, ताकि जब अर्थव्यवस्था बढ़े तो यह अमीर और गरीब दोनों की सहायता कर सके. अभी की जरूरत है कि ग्रहाकों, कॉरपोरेट, छोटे और मध्यम उद्योगों की जरूरत को बैंक विश्लेषित करें और पूंजी निर्माता की भूमिका से निकलकर रोजगार प्रदाता और निर्माता की सहायक भूमिका में आएं और बैंकों के साथ ही देश के बैलेंस शीट को भी मजबूत करें.

[ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है.]

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