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मेंस्ट्रुअल हाइजीन और फ्री सैनिटरी पैड के लिए राष्ट्रीय नीति, सुप्रीम कोर्ट की पहल से होगा बड़ा बदलाव लेकिन सोच भी होगी बदलनी

माहवारी के दौरान लड़कियों को होने वाली परेशानी और दर्द के बारे में हम सब अच्छे से वाकिफ है. जब लड़कियां 12 से 17 साल के बीच होती हैं, तो वे इस दौरान स्कूली शिक्षा ले रही होती हैं. आम तौर पर कक्षा 6 में पढ़ने वाली लड़कियां उस उम्र में पहुंच जाती हैं, जब उनमें माहवारी या मेंस्ट्रुअल साइकिल की शुरुआत हो जाती है. जब इसकी शुरुआत होती है, तो लड़कियों को साफ-सफाई या स्वच्छता के लिए कुछ ख़ास चीजों की जरूरत पड़ती है. उन्हीं में से एक चीज़ है सैनिटरी पैड.

आज भी हमारे देश में एक बहुत बड़ी आबादी ऐसे वर्ग की हैं, जिनके पास स्वास्थ्य के नजरिए से माहवारी के दौरान जरूरी चीजें खरीदने के लिए पैसे नहीं है. इनमें सैनिटरी पैड भी शामिल है. लंबे वक्त से देश में ये मांग चल रही थी कि स्कूली लड़कियों को मुफ्त में सैनिटरी पैड सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जाए.

इस दिशा में 10  अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की ओर से बेहद ही सकारात्मक निर्देश जारी किया गया है. सुप्रीम कोर्ट में देशभर के सरकारी स्कूलों में छठी से 12वीं कक्षा में पढ़ रही लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड मुहैया कराने से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही थी. इस पर सुनवाई करने वाले में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला शामिल थे.

सुप्रीम कोर्ट ने इसे बहुत ही गंभीर मुद्दा माना है. इसके साथ ही केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वो सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए मेंस्ट्रुअल हाइजीन पर एक एसओपी यानी मानक संचालन प्रक्रिया के साथ ही राष्ट्रीय मॉडल तैयार करे, जिसे हर राज्य अपना सकें.

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि स्कूली लड़कियों में माहवारी के दौरान स्वच्छता का मुद्दा इतना गंभीर है कि केंद्र सरकार को इसके लिए राष्ट्रीय नीति बनाने में इससे जुड़े सभी हितधारकों से भी राय लेनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्यों के साथ तालमेल और राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए जरूरी आंकड़े जमा करने के नजरिए से स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है. इन सबके साथ शीर्ष अदालत ने 4 हफ्ते के भीतर इसकी रिपोर्ट पेश करने को भी कहा है.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों से हर आवासीय और गैर-आवासीय स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालयों की व्यवस्था पर भी जानकारी मांगी है. सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 28 नवंबर को केंद्र के साथ ही हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों से इस मुद्दे पर जवाब मांगा था. 

माहवारी के दौरान स्वच्छता का मुद्दा दो चीजों से ख़ास तौर से जुड़ा है. एक स्वास्थ्य से जुड़ा पहलू और दूसरा आर्थिक पहलू है. छठी से 12वीं कक्षा के बीच स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियां माहवारी के दौरान साफ-सफाई को लेकर उतनी जागरूक नहीं होती हैं. न तो उन्हें इस बारे में स्कूली शिक्षा के तहत सही तरीके से बताया जाता है और न ही घर परिवार समाज में खुलकर इस मुद्दे पर उन्हें समझाया जाता है. ऐसे में इस दौरान लड़कियां एक तो शारीरिक दर्द का सामना करती ही हैं, साथ ही मानसिक तौर से भी पूरी तरह से परिपक्व नहीं होने की वजह से कुछ ऐसे उपाय अपनाती हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है.

भारत में 11 से 18 साल की गरीब लड़कियों की बहुत बड़ी संख्या है, जो सरकारी स्कूलों में पढ़ रही हैं. ये लड़कियां मेंस्ट्रुअल हाइजीन के बारे में उतनी जागरूक नहीं हैं. हमारा संविधान अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को जीवन और सम्मान के अधिकार की गारंटी देता है. उस नजरिए से देखें तो इन गरीब लड़कियों को भी स्कूली शिक्षा के दौरान मेंस्ट्रुअल हाइजीन के लिए जरूरी हर सामान मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है.

अगर इस मुद्दे पर कोई राष्ट्रीय नीति होगी और उसका पालन हर राज्य में अनिवार्य होगा, तो फिर स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों को माहवारी के दौरान क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, इसकी बेहतर जानकारी होगी. इससे उन्हें बेहतर साफ-सफाई रखने में मदद मिलेगी. इस नजरिए से सरकार को और कदम उठाने की जरूरत है.

माहवारी के दौरान स्वच्छता के मुद्दे का आर्थिक पहलू भी है. आजादी के 75 साल बाद भी हमारे देश की हर लड़कियों या उनके परिवार की आर्थिक हैसियत वैसी नहीं बन पाई है कि वे सैनिटरी पैड या इस दौरान जरूरी दूसरी चीजों को बाजार से खरीद सकें.

ये पूरा मुद्दा दरअसल पीरियड पोवर्टी (Period Poverty) से गंभीर तौर से जुड़ा हुआ है. पीरियड पोवर्टी दयनीय आर्थिक स्थिति का सूचक है. इसके तहत कम आय वाली या गरीब लड़कियां पीरियड प्रोडक्ट्स जैसे सैनिटरी पैड, टेम्पॉन जैसी चीजों का खर्च वहन नहीं पाती हैं. ऐसे में वे दूसरे असुरक्षित विकल्पों को अपनाती हैं. पीरियड्स के दौरान गंदे कपड़े इस्तेमाल करना महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है. संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. पीरियड्स के दौरान साफ-सफाई और स्वच्छता को लेकर सतर्कता की कमी भारत में महिलाओं की मौत का पांचवां सबसे बड़ा कारण है.

कई बार इसकी वजह से उस दौरान लड़किया स्कूल-कॉलेज नहीं जा पाती हैं. कई लड़कियां इस वजह से स्कूल जाना ही बंद कर देती है. उनके अटेंडेंस पर भी असर पड़ता है. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि हमारे देश में पांच में से एक लड़की हर साल अच्छी गुणवत्ता वाले पीरियड प्रोडक्ट उपलब्ध नहीं होने की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं. ये और भी चौंकाने वाला तथ्य है कि करीब 40 फीसदी लड़कियां माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जाना पसंद करती हैं क्योंकि उनके पास बेहतर क्वालिटी के सैनिटरी पैड नहीं होते या फिर स्कूल में उनको इस दौरान वो प्राइवेसी नहीं मिल पाती है, जिसकी जरूरत होती है.

ये बहुत ही चिंतनीय मुद्दा है कि अभी भी पर्याप्त मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन सुविधाओं की कमी की वजह से हर साल दो करोड़ से ज्यादा लड़कियां स्कूल ड्रॉप आउट हो जाती हैं.  नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे  के आंकड़ों को मानें तो 15 से 24 साल के बीच देश में जितनी भी लड़कियां हैं, उनमें से 30 फीसदी मासिक धर्म के दौरान सुरक्षा के स्वच्छ तरीकों का प्रयोग नहीं करती हैं. इसके पीछे का कारण या तो जानकारी का अभाव है या फिर जरूरी सामानों की उपलब्धता का नहीं होना है.

ये सच है कि पिछले कुछ सालों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ी है और हाइजीन मेथड के इस्तेमाल को बढ़ावा मिल रहा है, लेकिन अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

शहरों और गांवों के बीच तो इस मुद्दे पर जमीन आसमान का फर्क है, जिस खाई को पाटने में राष्ट्रीय स्तर पर समान नीति बहुत कारगर साबित होगी. गांव या छोटे-छोटे कस्बों के सरकारी स्कूलों में लड़कियों को सरकार की ओर मुफ्त सैनिटरी पैड मुहैया करवाना बेहद जरूरी है.

इसके साथ ही समाज और परिवार में इस मुद्दे पर सोच भी बदलने की जरूरत है. इस ओर भी केंद्र सरकार की ओर तैयार की जाने वाली राष्ट्रीय नीति में ध्यान दिए जाने की जरूरत है. अभी भी हम इस मसले पर परिवार के भीतर ही चर्चा करने से कतराते हैं. ये ऐसा मुद्दा है, जिस पर कम उम्र की लड़कियों को घर के हर बड़े लोगों से जानकारी मिलनी चाहिए, लेकिन होता बिल्कुल उल्टा है. पुरुष से तो बात करना छोड़ ही दें, कई महिलाएं भी अपनी बेटियों से इस मसले पर बात करने से कतराती हैं.

सैनिटरी पैड खरीदने से जुड़ा मुद्दा भी ऐसा है, जिसको लेकर सोच बदलने की जरूरत है. जैसे हम किसी दुकान से खाने-पीने या दवा की खरीदारी करते हैं, वैसे ही सैनिटरी पैड स्वास्थ्य से जुड़ी हुई जरूरत है और इसको लेकर जो भी  टैबू समाज में रहा है, उसको दूर करने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.

कुछ सवाल हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है. क्या हम वैसा माहौल नहीं बना सकते अपने समाज में कि एक पिता या भाई इसे खरीद कर ला सके या फिर इससे जुड़ी स्वच्छता की जानकारी कम उम्र की लड़कियों को क्या एक पिता या बड़ा भाई नहीं दे सकता है. इन सब मुद्दों पर विचार किए बिना या इन हालातों को बदले बिना मेंस्ट्रुअल हाइजीन को सुनिश्चित करना आसान नहीं है.

अशिक्षित लोगों की बात छोड़ दें, तो अभी भी हमारे देश में पढ़े-लिखे समझदार और संसाधन संपन्न पुरुषों की संख्या बेहद कम है, जो मेंस्ट्रुअल हाइजीन के मसले पर अपनी बेटियों से बात कर सकें. ये हमें समझना होगा कि मेंस्ट्रुअल हाइजीन का मुद्दा नैतिकता या संस्कार से नहीं जुड़ा है, बल्कि ये जीवन अस्तित्व या फिर कहें मानव अस्तित्व और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है. स्वास्थ्य से जुड़े अन्य मुद्दों के साथ ही ये भी ऐसा ही मुद्दा है जिस पर खुलकर जब तक घर परिवार और समाज में बातचीत नहीं होगी, तब तक कोई भी नीति उतनी कारगर साबित नहीं हो सकती है. इन सारे पहलुओं पर समग्रता से सोचने की जरूरत है.

सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्देश दिया है वो बेहद जरूरी है,  जिस पर केंद्र के साथ ही हर राज्य को गंभीरता से पहल करने की जरूरत है. लेकिन मेंस्ट्रुअल हाइजीन सिर्फ़ इससे सुनिश्चित नहीं हो सकता है. सरकारी पहल से शायद आर्थिक पहलू का निवारण निकल सकता है, लेकिन मेंस्ट्रुअल हाइजीन  सिर्फ इससे नहीं जुड़ा हुआ है. इसके लिए मेंस्ट्रुअल हाइजीन से जुड़े पूर्वाग्रह और दकियानूसी सोच को भी बदलने की जरूरत है.

(ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है)

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