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‘खाकी’ की शान से ज्यादा क्यों प्यारी लग रही है ‘खादी’?

अपने जिले के जिस डीएम (कलेक्टर) या एसपी के खौफ़ से वहां का बड़ा से बड़ा बदमाश और माफिया भी थर्राता हो और वही अफसर चुनाव-तारीखों की घोषणा होते ही अचानक ये ऐलान कर दे कि अब तो मैं इस्तीफा देकर राजनीतिक पार्टी ज्वाइन कर रहा हूं तो कल्पना कीजिये कि वहां के अपराध-जगत में कितने जबरदस्त जश्न का माहौल होगा.  कानपुर में कल रात शायद कुछ ऐसा ही नजारा होगा.

सवाल ये नहीं है कि जब एक शख्स आईएएस या आईपीएस का तमगा हासिल करने से पहले देश के संविधान की शपथ लेते हुए बगैर किसी भेदभाव के जन-सेवा का संकल्प लेते हुए अपनी छाती चौड़ी कर लेता है,  बल्कि ये है कि फिर अक्सर ऐसा क्यों होता है कि चुनाव आते ही इनमें से कुछ उसे ऐसे दुत्कार देते हैं,  मानो वे दोयम दर्जे की नौकरी कर रहे थे या सरकार के मंत्रियों के गुलाम बने हुए थे? बड़ा सवाल ये है कि हमारे ब्यूरोक्रेट्स को राजनीति से इतना मोह आखिर क्यों होने लगा है? क्या इसलिये कि अपना हक जमाने वाली कामयाबी की मंजिल तक पहुंचने का ये रास्ता उन्हें अब सबसे आसान लगने लगा है?

हालांकि इस परंपरा की शुरुआत तो काफी पहले हो चुकी थी लेकिन पिछले एक दशक में इसमें जिस तरह का इजाफा हुआ है, वो आने वाले सालों में हमारे लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर भी रख सकता है. वह इसलिये कि आईएएस,  आईपीएस,  आईएफएस या इसी तरह की अन्य केंद्रीय सेवाओं में आने की तैयारी कर रही मौजूदा नौजवान पीढ़ी पर इसका यही असर पड़ेगा कि कुछ साल की चाकरी करने के बाद जब सत्ता में बैठी किसी ताकतवर पार्टी का हिस्सा ही बनना है तो फिर इतनी मग़ज़खपाई करने की बजाय उस पार्टी को ही क्यों न ज्वाइन कर लिया जाए. इसका एक बेहद गलत संदेश हमारी उस युवा पीढ़ी के बीच भी जाएगा, जो अपने परिवार की परवाह न करते हुए हमारी तीनों सेनाओं में अपनी सेवा देते हुए देश के लिए जान न्योछावर करने के इरादे से बेताब है. उन युवाओं के दिमाग में आने वाली इस धारणा को भला कौन दूर करेगा कि जब हर तरह की सहूलियत और ऐशो-आराम राजनीति में आने से ही मिलता है, तो क्या फिर हमें किसी पागल कुत्ते ने काटा है कि शरीर को झुलसाती गर्मी में या माइनस 40 डिग्री वाली ठंड में सरहदों पर मुस्तैद रहकर अपने देश की रक्षा की जाए. वे तो यही सोचेंगे कि इससे बेहतर है कि किसी ताकतवर पार्टी का परचम संभालकर ही अपने भविष्य को सुरक्षित बनाया जाए. स्वामी विवेकानंद ने वर्षों पहले कहा था- "आप आने वाली पीढ़ी को कैसा समाज देना चाहते हैं, ये उन लोगों के आचरण व संस्कार पर निर्भर करता है, जो उस वक़्त में समाज के सबसे बड़े ठेकेदार बने हुए हैं. विश्वास कीजिये कि यदि ठेकेदार की सोच ही संकुचित होगी, तो उसकी डाली गई नींव से एक मजबूत भवन बनने की उम्मीद आप कदापि नहीं कर सकते."

हम इससे इत्तिफाक नहीं रखते कि देश का कोई भी नौकरशाह अपनी नौकरी से स्वेच्छिक सेवानिवृत्त्ति यानी वीआरएस लेकर अचानक किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल होने का ऐलान कर दे. लेकिन सबसे बड़ी चिंता का विषय ये है कि अगर ये प्रचलन बढ़ता गया, तो वो दिन दूर नहीं जब लोकतंत्र का दूसरा स्तंभ कहलाने वाली कार्यपालिका से जनता का भरोसा पूरी तरह से टूट जाएगा और उसे यकीन होने लगेगा कि देश में कोई भी नौकरशाह निष्पक्ष होकर फैसला लेने की हैसियत में नहीं होता. किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ऐसी स्थिति एक बड़े खतरे का संकेत होती है, जिसे राजनीतिक दल अपने सियासी फायदे के लिए अक्सर नज़रंदाज़ कर देते हैं लेकिन दुनिया के कई मुल्कों का इतिहास बताता है कि इसके बेहद दूरगामी व बुरे परिणाम ही देखने को मिलते हैं.

चुनाव आयोग ने शनिवार को उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान किया, तो उसके फौरन बाद एक ऐसी खबर आई जिसने सबको चौंका दिया.  ख़बर ये थी कि कानपुर के  पुलिस कमिश्नर असीम अरुण ने विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए वीआरएस ले लिया है. ये फैसला लेते ही उन्होंने अपने सोशल मीडिया की पोस्ट में ये ऐलान भी कर दिया कि वे कन्नौज सदर से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे. उनके किसी पार्टी से जुड़ने या चुनाव लड़ने पर किसी को ऐतराज नहीं होगा और होना भी नही चाहिए क्योंकि ये उनका निजी फैसला है  लेकिन सवाल उठता है कि चुनाव तारीखों का ऐलान होते ही उन्होंने ये फैसला लेकर यूपी की जनता को आखिर क्या संदेश देना चाहा है? विरोधी दलों को ये बहुत सारे शक-शुबहे उठाने की गुंजाइश भी देता है.

केंद्रीय सेवाओं के तमाम सर्विस रुल्स को अगर दरकिनार भी कर दें, तो क्या असीम अरुण की अन्तरात्मा ने उन्हें झिंझोडा नहीं होगा कि जिस खाकी वर्दी को पाने, पहनने और समाज से इज्जत हासिल करने के लिए इतनी मशक्कत की थी, उसे एक झटके में यों उतारकर फेंक देने के बाद कौन सी महान देश-सेवा के लिए निकल पड़े हो?

क्या आप सोच सकते हैं कि देश के तमाम राज्यों में आईपीएस बनने की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के बीच इसका जो संदेश गया है, उसे समझने की जहमत हमारे नेता उठाएंगे.  बिल्कुल भी नहीं. इस एक असाधारण घटना के बाद उस युवा पीढ़ी का विश्वास तो अब और भी गहरा हो जाएगा कि हमारे देश में खाकी वर्दी से ज्यादा ताकत खादी के उस  कुर्ते-पाजामे-धोती में ही है, भले ही उसका रंग सफेद न भी हो. ये सीना चौड़ा करने वाली घटना नही है, बल्कि ये हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कुछ साल की नौकरी करने के बाद नये अफसर भी अगर अपने सीनियर के नक्शे-कदम पर चलने लगे, तब देश की  कार्यपालिका का क्या होगा. हालांकि इससे पहले भी कई आईएएस व आईपीएस अफ़सरों ने राजनीति को अपना नया ठिकाना बनाया है और उनमें से कुछ केंद्रीय मंत्रीपद पर भी हैं लेकिन अधिकांश ने रिटायर होने के बाद ही सियासी दामन थामा है. लेकिन राजनीतिक इतिहास में शायद ये पहली व अनूठी घटना है, जब चुनाव तारीखों का ऐलान होते ही एक पुलिस कमिश्नर वीआरएस लेकर किसी पार्टी में शामिल होने का ऐलान कर दे.

वैसे प्रकृति का नियम है कि हर क्रिया के बाद उसकी प्रतिक्रिया भी अवश्य होती है. कुछ दिन इंतज़ार कीजिये क्योंकि इस घटना के बाद अब ऐसा हो नहीं सकता कि केंद्रीय सेवाओं के सर्विस रूल को और ज्यादा सख्त बनाने की गुहार लेकर कोई शख्स या संगठन  देश की शीर्ष अदालत की चौखट तक न पहुंचे. उम्मीद करनी चाहिए कि तब सुप्रीम कोर्ट ही कोई ऐसा निर्देश देगा कि भविष्य में कार्यपालिका में आकर अपनी सेवाएं देने का हमारी युवा पीढ़ी का भरोसा हमेशा के लिए कायम रहे.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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