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BLOG: महाराष्ट्र में सूखे को दावत कौन देता है- अल्पवर्षा या सरकारें?

इस बार महाराष्ट्र का सूखा इन मायनों में ज्यादा भयंकर है कि पहले मराठवाड़ा और विदर्भ के इलाके ही प्रभावित होते थे, लेकिन इस बात उत्तरी महाराष्ट्र और पुणे भी इसकी चपेट में आ चुका है.

“अकाल जब आता है/ अपने साथ लाता है अड़ियल बैल-से बुरे दिन/ अकाल भेद नहीं करता खेत, पेड़, पशु और आदमी में/ बाज की तरह आकाश से उतरता है/ हरे-भरे खेतों की छाती पर/ फसल को जकड़ता है पंजों में/ खेत से खलिहान तक सरकता है...“- यह कविता वरिष्ठ कवि अनिल जनविजय की है, जो भारत की व्यथा बयान कर रही है.

पश्चिम भारत पर नजर डालें तो महाराष्ट्र में अकाल और सूखे से त्राहिमाम मचा हुआ है. राज्य के बांधों में न के बराबर पानी बचा है, मानसून लेट है और जून के दूसरे हफ्ते में धरती रुई की तरह जल रही है. चूंकि लोकसभा चुनाव के बाद कुछ ही महीनों में यहां विधानसभा चुनावों की बारी है, इसलिए सूखे को लेकर सियासी करतब भी खूब देखने को मिल रहे हैं. सत्तारूढ़ बीजेपी का दावा है कि उसने पूरे महाराष्ट्र में सूखे से निबटने के समुचित इंतजाम किए हुए हैं, जबकि विपक्षी गठबंधन कांग्रेस-राकांपा का आरोप है कि फडणवीस सरकार जबानी जमाखर्च ही कर रही है और लगभग 28000 गांवों के लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं.

राज्य सरकार का मंत्रिमंडल कहता है कि मार्च में आचार संहिता लगने से पूर्व ही कुल 151 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया था और अब पालक मंत्रियों से कहा गया है कि वे अपने जिलों में जाकर हालात का जायजा लें. पूरे महाराष्ट्र में 1500 से भी अधिक पशु कैम्प खोले गए हैं, जिनमें से प्रत्येक पशु कैम्प में एक हजार शेड्स बने हुए हैं. जगह-जगह 12064 चारा छावनियां खोल दी गई हैं, जहां लाखों छोटे-बड़े जानवर लाभान्वित हो रहे हैं. साथ ही 3699 गांवों और 8417 बस्तियों में 4774 टैंकरों से पीने का पानी पहुंचाया जा रहा है.

जबकि मंजर यह देखने को मिल रहे हैं कि अमरावती जिले के अंबाड़ा गांव में 15-15 दिन के बाद टैंकर दिख जाए तो गनीमत है. उत्तर महाराष्ट्र के नासिक में 18.36% पानी बचा है, जो पिछले साल इन्हीं दिनों 34.26% उपलब्ध था. सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित औरंगाबाद के जलाशयों में पिछले हफ्ते सिर्फ 4.75% पानी बचा था, जो इन्हीं दिनों पिछले साल 30.46% था. आज की स्थिति निश्चित ही और भी भयावह होगी. बुलढाणा के 210 गांवों में हाहाकार है. लोग टैंकरों को या तो लूट ले रहे हैं या उन पर ताला लगा दे रहे हैं. पानी की कमी से ग्रस्त अहमदनगर के पाथर्डी तालुका के अकोला गांव में किसान पशुओं के लिए बनाए गए तबेले में रह रहे हैं. कम पानी पीने की वजह से लोगों में यूरिनरी ट्रैक इंफेक्शन, पथरी और कब्ज जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं.

इस बार महाराष्ट्र का सूखा इन मायनों में ज्यादा भयंकर है कि पहले मराठवाड़ा और विदर्भ के इलाके ही प्रभावित होते थे, लेकिन इस बात उत्तरी महाराष्ट्र और पुणे भी इसकी चपेट में आ चुका है. मराठवाड़ा और नासिक क्षेत्रों के बांधों में राज्य का क्रमशः 27 और 65 फीसदी जल भंडारण होता है. लेकिन इस बार ये बांध लगभग सूख चुके हैं. 2019 का सूखा 1972 के सूखे से भी अधिक भयावह माना जा रहा है क्योंकि इस बार रबी और खरीफ दोनों फसलों पर अनावृष्टि की मार पड़ चुकी है. किसानों ने दो-दो बार बीज बोए लेकिन वर्षा न होने के चलते पूरी फसल बरबाद हो गई और उन्हें पानी व रोजगार की तलाश में गांव से पलायन करके मुंबई और पुणे की ओर भागना पड़ा है, जहां पहले ही जल-संकट मुंह बाए खड़ा है.

महाराष्ट्र में सूखे की विकराल स्थिति को सिर्फ जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग या कम बारिश को जिम्मेदार ठहराकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता. इसमें पांच सितारा होटल, वाटर पार्क, गोल्फ कोर्स, क्रिकेट स्टेडियम, बंगलों, निजी बगीचों आदि में पानी बरबाद करने वाले कम दोषी नहीं हैं. यह सूखा सरकारी नीतियों की नाकामी की कहानी भी कहता है. देवेंद्र फडणवीस सरकार की जलयुक्त शिवार योजना पर सवाल उठ रहे हैं. महाराष्ट्र सरकार इसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि बताती फिर रही थी. 2016 में शुरू हुए इस अभियान के तहत 8000 करोड़ खर्च होने और 24 लाख टीएमसी पानी के भंडारण की सुविधा विकसित करने का दावा किया जा रहा था.

लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नासिक में यह दावा किया था कि इस योजना के जरिए 16,000 गांवों को सूखामुक्त बना दिया गया है. सवाल उठता है कि अगर जलयुक्त शिवार योजना से भूजल स्तर सुधरा है तो फिर महाराष्ट्र सरकार को 151 तालुकाओं को सूखाग्रस्त घोषित क्यों करना पड़ा? ग्राउंडवाटर सर्वे ऐंड डेवलपमेंट एजेंसी के आंकड़ों से यह पता चलता है कि सूखी पड़ी इस योजना के बाद महाराष्ट्र के 11,487 गांवों का भूजल स्तर एक से डेढ़ मीटर और नीचे चला गया है और 5,556 गांवों में तो यह गिरावट दो मीटर तक की है. कई विशेषज्ञ इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर पहले ही चिंता जता चुके हैं और शिवार खोदने वाली जेसीबी-ठेकदार लॉबी की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, जो मोटी कमाई के लिए गहरे नाले बनाने की पैरवी कर रहे थे. कई गांव वालों ने कैमरे पर कहा है कि जलयुक्त शिवार बनाने के लिए अधिकारी और नेताओं के प्रतिनिधि आए, लेकिन मुरम-मिट्टी खोद कर कहां ले गए आज तक किसी को नहीं मालूम है. प्रस्ताव पास करने के लिए ग्रामसभाएं तक नहीं बुलाई गईं.

आज जो कांग्रेस-राकांपा जलयुक्त शिवार योजना में घोटाले के आरोप लगाते नहीं थक रही है, उसे याद होना चाहिए कि उसके कार्यकाल में 5600 करोड़ रुपए का सिंचाई घोटाला सामने आया था, जिसके तहत 2007 से 2013 के बीच कोई एकीकृत प्रारूप तैयार किए बिना ही 189 जल सिंचाई परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई थी, जिनमें बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुई थीं. कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में इस पर सवाल उठाया था और बाम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने इसकी जांच के आदेश दिए थे. महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने पूर्व उप मुख्यमंत्री और राकांपा नेता अजीत पवार के बारे में बांबे हाई कोर्ट में हलफनामा दाखिल करके इस चूक के लिए उन्हें जिम्मेदार बताया है.

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