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BLOG: कांग्रेस का आखिरी दांव, मोदी या राहुल की होगी जीत ?

जाहिर है कि कांग्रेस के पास एसपी-बीएसपी और मोदी को टक्कर देने के लिए कोई विकल्प नहीं बचा था और प्रियंका से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता है. इससे पार्टी,कैडर और वोटरों में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार हो सकता है.

राजनीति में हमेशा वन प्लस वन टू नहीं होता है,कभी शून्य तो कभी ग्यारह भी होता है. राजनीति मैथमेटिक्स और कैमिस्ट्री ही नही बल्कि एक कला भी है. ऐसी कला जिससे पार्टी का नंबर भी बढ़ सकता है और वोटरों में पार्टी की केमिस्ट्री भी अच्छी हो सकती है. कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी को जिम्मेदारी देकर कलाबाजी करने की कोशिश की है लेकिन ये कलाबाजी या हवाबाजी है इसे उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर परखने की जरूरत है.

प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया और गुणा भाग शुरू हो गया कि नरेन्द्र मोदी की मिट्टी पलीत हो जाएगी और उत्तर प्रदेश में सिर्फ और सिर्फ प्रियंका गांधी का ही सिक्का चलेगा. किसका सिक्का चलेगा और किसका सिक्का नहीं चलेगा ये तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि प्रियंका गांधी को क्यों राजनीति में एंट्री मिली. जगजाहिर है कि देश के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता उत्तर प्रदेश की गलियों से गुजरता है. यही वजह है कि बीजेपी हो या कांग्रेस सबकी नजर उत्तर प्रदेश पर ही लगी रहती है.

प्रियंका गांधी को राजनीति में एंट्री क्यों मिली? कांग्रेस को भरोसा था कि नरेन्द्र मोदी को हराने के लिए अखिलेश यादव और मायावती कांग्रेस से गठबंधन करेंगे लेकिन बबुआ और बुआ ने कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया. अखिलेश और मायावती की चाल से कांग्रेस पार्टी के तोते उड़ गये. ऐसे में कांग्रेस को लगने लगा कि सिर्फ राहुल के भरोसे उत्तर प्रदेश का चुनाव नहीं जीता जा सकता है इसीलिए कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल करने का फैसला किया और प्रियंका गांधी को राष्ट्रीय महासचिव बनाने के साथ पूर्वी उत्तरप्रदेश का प्रभारी बना दिया गया. प्रियंका गांधी में ग्लैमर भी है, गांधी परिवार का आखिरी दांव भी है जिनका इस्तेमाल अभी तक सिर्फ और सिर्फ रायबरेली और अमेठी में किया गया था.

प्रियंका महिला भी हैं और युवा भी हैं, मिलनसार भी हैं और लोगो से कनेक्ट करने की क्षमता भी रखती है. यही नहीं प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी इसीलिए बनाया गया ताकि वाराणसी में नरेन्द्र मोदी को कड़ी चुनौती दी जा सके. वाराणसी में हाईवोल्टेड चुनाव प्रचार होगा तो इसके प्रभाव से पूरे उत्तर प्रदेश में असर होगा यानी कोशिश है कि ये लड़ाई बीजेपी बनाम कांग्रेस हो.

राहुल और प्रियंका के चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस के पारंपारिक वोट यानि मुस्लिम, दलित और अगड़ी जाति खासकर ब्राहमण वोटरों को फिर से जोड़ने की कोशिश भी है. युवा चेहरा होने की वजह से प्रियंका और राहुल युवा वोटरों और महिला वोटरों को भी प्रभावित कर सकते हैं. ऐसे में कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को राजनीति में एंट्री देकर मास्टरस्ट्रोक खेलने की कोशिश की है. जाहिर है कि कांग्रेस के पास एसपी-बीएसपी और मोदी को टक्कर देने के लिए कोई विकल्प नहीं बचा था और प्रियंका से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता है. इससे पार्टी,कैडर और वोटरों में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार हो सकता है.

बीजेपी या कांग्रेस की होगी जीत? जब बीजेपी ने दिल्ली के विधानसभा चुनाव में किरण बेदी को मुख्यमंत्री का चेहरा पेश किया गया तो 5 दिनों तक दिल्ली की राजनीति में सन्नाटा छा गया और कहा गया कि ये बीजेपी की मास्टरस्ट्रोक चाल है लेकिन क्या हश्र हुआ किसी से बात छिपी नहीं है. अब सवाल उठता है कि क्या प्रियंका गांधी भी कांग्रेस के लिए यूपी में किरण बेदी साबित होंगी ? प्रियंका गांधी को लांच करना बैकफायर भी कर सकता है क्योंकि बीजेपी नये तेवर में कांग्रेस की परिवारवाद की राजनीति पर हमला कर सकती है कि कांग्रेस की सोच परिवारवाद की राजनीति से ऊपर नहीं है. सारे नारे वायदे और सिद्धांत परिवारवाद की राजनीति के सामने दम तोड़ देते है. प्रियंका के प्रभारी बनाने के साथ बीजेपी से लेकर मोदी, कांग्रेस की परिवारवाद की राजनीति की बखिया उधड़ने में लग गए हैं.

ये मुद्दा सिर्फ उत्तरप्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में नये तेवर और नये जोश के साथ परोसा जा सकता है. दूसरी बात ये है कि राहुल राजनीति और देश को बदलने के लिए नये नये शिगूफे छोड़ते रहते हैं लेकिन प्रियंका की राजनीति में एंट्री के साथ ही ये भी साफ हो गया है कि सोनिया गांधी ही नहीं बल्कि राहुल गांधी भी परिवारवाद की राजनीति के पैरोकार हैं. तीसरी बात ये है कि रायबरेली और अमेठी में सोनिया गांधी और राहुल की जीत का सेहरा प्रियंका गांधी के सिर पर बांधा जाता है जबकि ये सीट गांधी परिवार की पुश्तैनी सीट है और इस सीट को जीतने के लिए मां-बेटे को समाजवादी पार्टी और बीएसपी की बैसाखी की जरूरत पड़ती है, ऐसे में प्रियंका को हीरोईन बनाने पर सवाल खड़े होते हैं.

चौथी बात ये है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की जीत की वजहों में से एक वजह प्रियंका गांधी को माना जाता है. नरेन्द्र मोदी ने प्रियंका गांधी के नीच वाले बयान को मुद्दा बनाकर पूरे देश में राजनीतिक मुद्दा बना दिया था. पांचवीं बात ये है कि उत्तर प्रदेश में जाति की राजनीति का बोलबाला है ऐसे में प्रियंका गांधी के आने से यादव वोटर और दलित वोटर कांग्रेस की तरफ रुख हो जाएंगे, ये बड़ी भूल है. जहां तक मुस्लिम और अगड़ी जाति के वोटर की बात है उसमें सेंध लग सकती है. छठी बात ये है कि प्रियंका गांधी राहुल गांधी की बहन है, सोनिया गांधी की बेटी है और साथ ही साथ रॉवर्ट वाड्रा की पत्नी भी है. रॉवर्ट वाड्रा पर भ्रष्ट्राचार का मामला है ऐसे में पति के भ्रष्ट्राचार का भूत प्रियंका के लिए भारी हो सकता है क्योंकि जीजाजी पर तंज कसने में बीजेपी बाज नहीं आएगी.

आखिरी सवाल ये है कि कांग्रेस ने प्रियंका गांधी पर आखिरी दांव चला है जबकि मोदी सरकार के पास ऐसे आखिरी दांव खेलने के लिए बहुत अवसर है. मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को नौकरी में 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है. अब किसानों के लिए पैकेज और इनकम टैक्स में छूट के अलावा कई विकल्प खुले हैं. खासकर उत्तरप्रदेश के बारे में कहा जाता है कि जो सोचा जाता है वो होता नहीं है और होता है वो कोई सोच नहीं सकता है. ऐसे में ये कहना कि प्रियंका गांधी को लांच करने से कांग्रेस की किस्मत खुल जाएगी जाएगा, ये कहना जल्दबाजी होगी.

धर्मेन्द्र कुमार सिंह राजनीतिक-चुनाव विश्लेषक हैं और 'ब्रांड मोदी का तिलिस्म' के लेखक हैं.

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(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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