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BLOG: भारत के हैं राम, ये हैं 12 प्रमाण

अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या. मतलब ईश्वर का नगर यानी राम का नगर...अयोध्य! सरयू तट पर 12 योजन लंबाई और तीन योजन की चौड़ाई में बसा वो शहर जो सूर्यवंश की सत्ता का प्रतीक रहा है.

वर्षों की लड़ाई के बाद भारत में रामलला को उनके जन्मस्थान पर कब्जा मिल सका. रामजन्मभूमि पर जब श्रीराम के भव्य मंदिर की तैयारियां जोरों पर हैं. ऐसे में भारत के सांस्कृतिक सहोदर रहे नेपाल के मतिभ्रष्ट प्रधानमंत्री ने नया प्रपंच खड़ा करने की व्यर्थ कोशिश की है.

नेपाल के चीन निर्देशित प्रधानमंत्री के पी ओली अपनी डूबती सत्ता को बचाने के क्रम में नीचे गिरते जा रहे हैं. चीनी हित साधने के चक्कर मे भारत पर निशाना साध रहे, ओली मतिभ्रम की पराकाष्ठा पार कर चुके हैं. सोमवार को नए दावे में उन्होंने भारत पर सांस्कृतिक अतिक्रमण के लिए नकली अयोध्या का निर्माण का आरोप जड़ दिया. उनके मुताबिक, असली अयोध्या नेपाल में है. ओली पहले कह चुके हैं कि भारत उनको सत्ता से हटाने की साजिश रच रहा है. ओली ने सवाल किया कि उस समय आधुनिक परिवहन के साधन और मोबाइल फोन (संचार) नहीं था तो राम जनकपुर तक कैसे आए?

हालांकि, इस मामले में वे अपने देश में ही घिर गए हैं.नेपाल की राष्ट्रीय प्रजातांत्री पार्टी के सह-अध्यक्ष कमल थापा ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस तरह के निराधार, अप्रमाणित बयानों से बचना चाहिए. थापा ने ट्वीट किया, "ऐसा लग रहा है कि पीएम तनावों को हल करने के बजाय नेपाल-भारत संबंधों को और खराब करना चाहते हैं."

खैर, ओली प्रवंचना से परे यदि हम ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो बाल्मीकि कृत रामायण जो ऐतिहासिक दृष्टिकोण से राम कथा के प्रारंभिक स्रोत में से एक है, और बाद में देश की विभिन्न भाषाओं में लिखी रामायण में भी राम के जन्म स्थान से लेकर उनकी सम्पूर्ण जीवन यात्रा का काल क्रम चिन्हित और वर्णित है. वह ओली के हवाई झूठ की हवा निकाल देता है.

अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या. मतलब ईश्वर का नगर यानी राम का नगर...अयोध्य! सरयू तट पर 12 योजन लंबाई और तीन योजन की चौड़ाई में बसा वो शहर जो सूर्यवंश की सत्ता का प्रतीक रहा है. हिंदुस्तान के इतिहास में कोशल प्रदेश की राजधानी के रुप में दर्ज अयोध्या अध्यात्मिक अवतारों की गवाह है. हिंदुओं के तमाम आराध्य देवी देवीताओं में से एक जिन्होंने मनुष्य रूप में पृथ्वी लोक पर अवतार लिया. उनमें से एक भगवान राम ने यहां जन्म लिया.

अयोध्या का इतिहास दर्ज है..अध्यात्म के दस्तावेजों में, जिसे महाकाव्य माना गया है. लिखने वाले भी युगपुरुष हैं.वाल्मिकी और गोस्वामी तुलसीदास सरीखे. जो कहते हैं प्रविश नगर कीजे सब काजा, हृदय राखि कौशलपुर राजा. ये समझना होगा कि अयोध्या और राम में कोई भेद नहीं. अयोध्या की विरासत है रामलला और राम जन्मभूमि जो युगों से स्वयं आस्था ने सहेज रखी है.

वास्तव में अयोध्या का इतिहास तो राम से भी पुराना है, क्योंकि सूर्यवंशियों का राजपाठ हिंदुस्तान के इतिहास में जिस कोशल प्रदेश से हुआ. उसकी राजधानी अयोध्या को बनाया गया और राम से पहले 50 से ज्यादा सूर्यवंशी राजाओं ने यहां राज किया. इतना ही नहीं राम राज्य के बाद भी 30 से ज्यादा रघुकुलवंशियों ने यहां शासन किया, जिसमें राम के पुत्रों लव कुश में से कुश उनके उत्तराधिकारी रहे.

सूर्यवंशियों की 100 पीढ़ियां बीते चार युगों में अयोध्या पर राज कर चुकी हैं. त्रेतायुग में जहां राम के बाद कुश आखिरी शासक थे तो वहीं द्वापर युग में वृहत्रछत्र आखिरी शासक थे. इसी के बाद कलियुग की शुरूआत मानी जाती है...भले ही राज खत्म हो गया हो...लेकिन वंश बेल अभी भी बाक़ी है.

दरअसल, अयोध्या अपने वजूद में आई भगवान राम से...और उसके बाद उनके उत्तराधिकारियों के नाम रही. राम, कुश, अतिथि, निषध, नल, नभ, पुण्डरीक, क्षेमधन्मा, देवानीक, अनीह, परियात्र, बल उक्थ, वज्रनाभ, खगण, व्युतिताष्व, विश्वसह, हिरण्याभ, पुष्य, ध्रुवसंधि, सुदर्शन, अग्निवर्ण शीघ्र, मरु, प्रश्रुत, सुसंधि, अमर्ष, महस्वान, विश्वबाहु, प्रसेनजित, तक्षक.

त्रेता के बाद द्वापर युग का इतिहास इन्हीं वंशजो में है और इसी दौर में कृष्ण का भी, लेकिन राम के वंशजों का इतिहास त्रेता युग से पहले का भी है. जो इक्ष्वाकु और उससे पहले भी सूर्यवंश तक जाता है. माना जाता है जिसकी स्थापना वैवस्वत मनु ने की, लेकिन यहां उनसे भी पहले ब्रह्मा के पुत्र मरीची ने राज किया. और उसके बाद तकरीबन साठ से ज्यादा पीढ़ियों में जिनके जरिए कुल स्थापित हुए...परम्पराए स्थापति हुईं...और इतिहास गढ़ता चला गया....

ये कुल इस तरह है. मरीचि, कश्यप, विवस्वान, वैवस्वत मनु, नभग, नाभाग, अम्बरीष, विरुप, पृषदश्व, रथीतर, इक्ष्वाकु, कुक्षि विकुक्षि, पुरन्जय, अनरण्य प्रथम, पृथु, विश्वरन्धि, चंद्र, युवनाश्व, वृहदश्व, धुन्धमार, दृढाश्व, हर्यश्व, निकुम्भ, वर्हणाश्व, कृशाष्व, सेनजित, युवनाश्व द्वितीय, मान्धाता, पुरुकुत्स, त्रसदस्यु, अनरण्य, हर्यश्व अरुण, निबंधन, सत्यवृत, सत्यवादी हरिश्चंद्र, रोहिताश, चम्प, वसुदेव, विजय, भसक, वृक, बाहुक, सगर अमंजस, अंशुमान, दिलीप प्रथम, भगीरथ, श्रुत, नाभ, सिन्धुदीप, अयुतायुष, ऋतुपर्ण, सर्वकाम, सुदास सौदास, अश्मक, मूलक, सतरथ, अदविद, विश्वसह, खटवांग, दिलीप, रघु, अज, दशरथ.

सूर्यवंशियों और इक्ष्वाकु के साथ बड़ा नाम रघुकुल का रहा...और इस वंश के इतिहास में नाम कमाने वाले राजाओं में राम के अलावा कुश, हरिश्चंद्र और भगीरथ जैसे नाम रहे....हरिश्चंद्र जहां अपने सत्य और दान के लिए चर्चित हुए...तो वहीं राजा भगीरथ का नाम पृथ्वी पर गंगा को उतारने के लिए रहा...दोनों राजाओं की ऐतिहासिकता आज भी किवदंतियों के साथ लोकोक्तियों की शक्ल में जिंदा है...लेकिन राम तो हृदय में हैं...और आत्मिक आनंद में....

पूरा भारत जानता है कि सरयू की ठंडक को भंग कर सूरज की किरणें जब अयोध्या को जगाती हैं...तो गूंजती है राम धुन. वो रामधुन...जो यहां की फिजाओं में घुल कर आह्वान करती हैं अपने आराध्य का. अयोध्या की सुबह में भक्ति की महक है. घंटियों के शोर में प्रार्थना के स्वरों में पुकार है...रामलला के उनके स्थान पर विराजमान होने की.

अब बात करें नेपाल से अयोध्या के संबंध की, तो भगवान राम का विवाह नेपाल स्थित जनकपुर में विदेहराज राजा जनक की पुत्री सीता से हुआ था.

जनकपुर मंदिर

वाल्मीकि रामायण के अनुसार माता सीता का जन्म जनकपुर में हुआ था. यहां माता सीता का मंदिर बना हुआ है. ये मंदिर क़रीब 4860 वर्ग फ़ीट में फैला हुआ है.मन्दिर के विशाल परिसर के आसपास लगभग 115 सरोवर हैं. इसके अलावा कई कुण्ड भी हैं.इस मंदिर में मां सीता की प्राचीनमूर्ति है जो 1657 के आसपास की बताई जाती है. यहां के लोगों के अनुसारएक संत यहां साधना-तपस्या के लिए आए. इस दौरान उन्हें माता सीता की एक मूर्ति मिली, जो सोने की थी. उन्होंने ही इसे वहां स्थापित किया था. इसके बाद टीकमगढ़ की महारानी कुमारी वृषभानु वहां दर्शन के लिए गईं. उन्हें कोई संतान नहीं थी. वहां पूजा के दौरान उन्होंने यह मन्नत मांगी थी कि उन्हें कोई संतान होती है तो वो वहां मंदिर बनवाएंगी. संतान प्राप्ति के बाद वो फिर आईं और करीब 1895 के आसपास मंदिर का निर्माण शुरू हुआ. 16 साल में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ.जनकपुर का प्राचीन नाम मिथिला तथा विदेहनगरी था. भगवान श्रीराम से विवाह के पहले सीता ने ज़्यादातर समय यहीं व्यतीत किया था. यहीं माता सीता का विवाह भी हुआ.

रंगभूमि

वाल्मीकि रामायण में जनक के यज्ञ स्थल यानि वर्तमान जनकपुर के जानकी मंदिर के निकट एक मैदान है, जो रंगभूमि कहलाता है. लोक मान्यता के अनुसार इसी मैदान में देश विदेश के बलशाली राजाओं के बीच शंकर जी का पिनाक धनुष तोड़कर श्रीराम ने सीता जी से विवाह की शर्त पूर्ण की थी. रामचरित मानस में भी इसे रंगभूमि कहा है. ये नेपाल का अत्यंत प्रसिद्ध मैदान है . सालों भर यहां तरह तरह के आयोजन होते रहते हैं . डॉ रामावतार के शोध के अनुसार ये वो स्थान है जहां सीता-राम का विवाह हुआ था.

धनुषा मंदिर धनुषा धाम नेपाल

धनुषा नेपाल का प्रमुख जिला है. इस जिले में धनुषाधाम स्थित है जो कि जनकपुर से करीब 18 किमी दूर है. धनुषा धाम में आज भी शिवजी के पिनाक धनुष के अवशेष पत्थर के रूप में मौजूद हैं. वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब पिनाक धनुष टूटा तो भयंकर विस्फोट हुआ था. धनुष के टुकड़े चारों ओर फैल गए थे. उनमें से कुछ टुकड़े यहां भी गिरे थे. मंदिर में अब भी धनुष के अवशेष पत्थर के रूप में माने जाते हैं. त्रेतायुग में धनुष के टुकड़े विशाल भू भाग में गिरे और उनके अवशेष को धनुषा धाम के निवासियों ने सुरक्षित रखा. भगवान शंकर के पिनाक धनुष के अवशेष की पूजा त्रेता युग से अब तक अनवरत यहां चल रही है जबकि अन्य स्थान पर पड़े अवशेष लुप्त हो गए.

मणी मंडप, रानी बाजार जनकपुर

त्रेतायुग में मिथिला नरेश सीरध्वज जनक के दरबार में रामजी द्वारा धनुर्भंग के बाद अयोध्याजी से बारात आई. श्री राम सहित चारों भाइयों का विवाह हुआ. जिस स्थान पर जनकपुर में मणियों से सुसज्जित वेदी और यज्ञ मंडप निर्मित हुआ वह समकाल में रानी बाजार के निकट है . यह स्थल मणि मण्डप के नाम से प्रसिद्ध है, लेकिन आसपास कहीं कोई मणि निर्मित परिसर नहीं है. बस नाम ही शेष है. पास में वही पोखर है जहां चारों भाईयों के चरण पखारे गए थे, तथा विवाह की यज्ञ वेदी भी बनी हैं.

इतने प्रमाणों के अतिरिक्त, राम वनगमन के प्रसंग में उनकी अयोध्या से श्रीलंका स्थिति रावण की राजधानी तक जाने का मार्ग इतना स्पष्ट है कि कही कोई संशय उठने का प्रश्न ही नही है.

रामगमन मार्ग प्रसंगों के साथ

राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है. इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था. यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था.

'सिंगरौर' : इलाहाबाद से 22 मील (लगभग 35.2 किमी) उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित 'सिंगरौर' नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था. रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है. यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था. महाभारत में इसे 'तीर्थस्थल' कहा गया है.

पहला पड़ावः ’कुरई' : इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है. गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई. सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे.

दूसरा पड़ाव....चित्रकूट के घाट पर 

कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे. यहां गंगा-यमुना का संगम स्थल है. हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है. प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट. यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि.

चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं. तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है. भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं.

तीसरा पड़ाव; अत्रि ऋषि का आश्रम 

चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था. महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे. वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया. अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं. अत्रि ऋषि की पत्नी का नाम है अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी. चित्रकूट की मंदाकिनी, गुप्त गोदावरी, छोटी पहाड़ियां, कंदराओं आदि से निकलकर भगवान राम पहुंच गए घने जंगलों में.

चौथा पड़ाव, दंडकारण्य

अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया. यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य. 'अत्रि-आश्रम' से 'दंडकारण्य' आरंभ हो जाता है. छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था. यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है. यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था. दंडक राक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा. यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है. यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है. इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम. गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है. कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे.

स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे. ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है.

पांचवा पड़ाव; पंचवटी में राम

दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए. मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था. त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया.

छठा पड़ाव.. सीताहरण का स्थान 'सर्वतीर्थ'

नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में 'सर्वतीर्थ' नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है.

सातवां पड़ाव;सीता की खोज

सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था. उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए. तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए.

आठवां पड़ाव...शबरी का आश्रम

तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्मण चले सीता की खोज में. जटायु और कबंध से मिलने के पश्चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे. रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है. शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा. केरल का प्रसिद्ध 'सबरिमलय मंदिर' तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है.

नवम पड़ाव; हनुमान से भेंट

मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े. यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया. ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है.

कोडीकरई : हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े. मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया. श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया.

सुग्रीव गुफा

सुग्रीव अपने भाई बाली से डरकर जिस कंदरा में रहता था, उसे सुग्रीव गुफा के नाम से जाना जाता है. यह ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित थी.

ग्यारहवां पड़ाव... रामेश्वरम

रामेश्वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है. रामेश्वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है. महाकाव्य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी. रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है.

बारहवां पड़ाव... धनुषकोडी

वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो. उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया. धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है. धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है. धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्नार से करीब 18 मील पश्चिम में है.

रामसेतु

रामसेतु जिसे अंग्रेजी में एडम्स ब्रिज भी कहा जाता है, भारत (तमिलनाडु) के दक्षिण पूर्वी तट के किनारे रामेश्वरम द्वीप तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी तट पर मन्नार द्वीप के मध्य चूना पत्थर से बनी एक श्रृंखला है. भौगोलिक प्रमाणों से पता चलता है कि किसी समय यह सेतु भारत तथा श्रीलंका को भू-मार्ग से आपस में जोड़ता था. यह पुल करीब 18 मील (30 किलोमीटर) लंबा है.

इतने प्रमाणों के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री का बड़बोला पन उनके उपहास के कारण बनने के अलावा कुछ और सिद्ध कर पाने में अक्षम है. यह न केवल सांस्कृतिक रूप से भारत नेपाल के रिश्तों को झकझोरने का कुत्सित प्रयास है, बल्कि खुद उनके पतन के राह में उठाया अंतिम कदम.

(उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)

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