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लड़कियां हर जगह रास्ते खोल रही हैं- आसमान, समुद्र और अब जमीन पर भी

क्योंकि दुश्मन के दांत कोई भी खट्टे कर सकते हैं- हम भी, आप भी

अबकी बार खुश होने की बारी है. सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कहा कि वह जल्द से जल्द महिला आर्मी ऑफिसर्स को कॉम्बैट रोल्स में परमानेंट कमीशन देगी. ये अधिकारी फिलहाल शॉर्ट सर्विस कमीशन पर काम करती हैं. मतलब सिर्फ 5 साल की अस्थायी नौकरी करती हैं. इसे 14 साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है. लेकिन यह सब सिर्फ नॉन कॉम्बैट स्ट्रीम में होता है. कॉम्बैट स्ट्रीम यानी युद्ध के समय किए जाने वाले काम के लिए कर्मचारियों की भर्ती शॉर्ट सर्विस कमीशन से नहीं होती. इसलिए औरतों को इसमें कोई जगह नहीं मिलती. चूंकि औरतें शॉर्ट सर्विस कमीशन पर काम करती हैं इसलिए आर्मी छोड़ने पर उन्हें रिटायरमेंट बेनेफिट्स नहीं मिलते. तो, इस बार सुप्रीम कोर्ट ने ही केंद्र से पूछा है कि वह आर्मी की महिला अधिकारियों को कॉम्बैट रोल्स में परमानेंट कमीशन क्यों नहीं देता. औरतों के साथ यह भेदभाव क्यों बरता जा रहा है. इसके लिए कोर्ट ने केंद्र से एक एफिडेविड फाइल करने को कहा है और यह निर्देश भी दिया कि वह परमानेंट कमीशन के बारे में एक व्यापक नीति दो हफ्तों के भीतर बनाए.

दरअसल भारतीय सेना की दो दूसरी फोर्सेज़- नेवी और एयरफोर्स में महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन पहले से दिया जा रहा है. 2010 में दिल्ली हाई कोर्ट की फटकार के बाद एयरफोर्स ने तो यह भेदभाव खत्म कर दिया था लेकिन नेवी का रुख वहीं का वहीं था. फिर 2015 में अदालत के एक और फैसले के बाद नेवी में भी यह बदलाव आया. तब हाई कोर्ट ने कहा था कि भारतीय सेनाएं औरतों की तरक्की में रोड़े अटकाने वाला सेक्सिएस्ट बायस रखती हैं. इसके बाद नेवी ने भी औरतों को परमानेंट कमीशन देना शुरू कर दिया. इस समय इन दो सैन्य बलों में लगभग 350 महिलाएं परमानेंट कमीशंड ऑफिसर्स के तौर पर काम करती हैं.

हाल के मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वह भी शॉर्ट सर्विस कमीशन पर काम करने वाली महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन देने पर विचार कर रहा है. इस बारे में डिफेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमन ने तीनों सेना प्रमुखों से मीटिंग भी की है. चूंकि मंत्री भी महिला हैं, इसलिए यह माना जा सकता है कि महिलाओं के हक में फैसला होगा. औरतों को थलसेना यानी आर्मी में भी अपनी सही जगह मिलेगी. पहले की अधिकारियों की नौकरियां बहाल हों या न हों, नई लड़कियों के रास्ते खुलेंगे. इस समय भारतीय आर्मी में 1,561 महिला अधिकारी हैं. आर्मी के ऑर्डिनेंस कॉर्प्स में सबसे ज्यादा 292 महिलाएं हैं. इसके बाद आर्मी के सर्विस कॉर्प्स और इंजीनियरिंग कॉर्प्स की बारी आती है.

नई लड़कियों ने भारतीय वायुसेना में अपने रास्ते खोले हैं- आसमान में. 2016 से फाइटर प्लेन्स उड़ा रही हैं. पिछले 20 साल से वे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर में तो हवा से बातें कर ही रही थीं. अब जेट की कमान भी संभाली हुई है. ये तीन लड़कियां हैं- आने वाले समय में उनमें इजाफा होगा. यूं एयरफोर्स में लगभग 1500 औरतें काम करती हैं.

लड़कियों ने नौसेना में भी राह तलाशी है- सीधे सागर से. वहां फिलहाल 12 लड़कियां कॉम्बैट रोल्स के लिए एझिमाला, केरल में ट्रेनिंग ले रही हैं. 1200 आदमियों के साथ टफ ट्रेनिंग के दौर से गुजर रही हैं. पिछले साल नवंबर में एंटी सबमरीन वॉरफेयर एयरक्राफ्ट में कॉम्बैट एविएटर के रूप में 70 महिला अधिकारियों को तैनात किया गया है. इसके अलावा पिछले साल सितंबर में नविका सागर परिक्रमा प्रॉजेक्ट के साथ छह लड़कियां सात महीने के सागर भ्रमण को निकलीं. उनके जहाज का नाम आईएनएसवी तारिणी है. अभी कुछ ही दिनों में यह दल वापस आने वाला है. नेवी का यह अपनी तरह का अनोखा अभियान है जिसमें क्रू की सभी सदस्य लड़कियां हैं. एक दूसरे की सबसे बड़ी सपोर्ट हैं. उनके अधिकारी ने कहा था- प्रकृति औरत और आदमी में फर्क नहीं करती- इसीलिए फीमेल ऑफिसर्स को भी समुद्र में वही सब झेलना होगा, जो मेल ऑफिसर्स को झेलना होता है.

प्रकृति सचमुच भेदभाव नहीं करती. इसीलिए यह अंतर हमारी तरफ से होता है तो भला नहीं लगता. लड़कियां हर लाम पर मुस्तैद होने की काबलियत रखती हैं. दुनिया के हर कोने में अपने-अपने मोर्चे पर तैनात भी हैं. भले ही कुछ ही देशों में- जहां उन्हें आदमियों की बराबरी पर रखा जाता है. ये देश हैं- ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, नार्वे, डेनमार्क, स्वीडन, अमेरिका वगैरह. वैसे महिला सैन्यकर्मियों का अनुपात अलग-अलग है. जैसे भारत में यह 3% हैं, यूके में 10%, स्वीडन में 13%, यूएस मे 16% और दक्षिण अफ्रीका में 27%. बाकी ज्यादातर देशों में सैन्य बलों में औरतों को ग्राउंड क्लोज कॉम्बैट रोल्स यानी उन रोल्स में नहीं लिया जाता जिनमें उनसे करीब से किसी को मारने की अपेक्षा की जाए. वे सिर्फ लीगल, इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स, मेडिकल पदों पर ही काम करती हैं. इसके पीछे सबके अपने-अपने तर्क हैं. कोई औरतों की देह को इतना मजबूत नहीं मानता तो किसी को लगता है कि ऐसी जगहों पर काम करने से वे यौन हिंसा या मॉलेस्टेशन का शिकार हो सकती हैं. कोई उनकी पारिवारिक जिम्मेदारियों की दुहाई देता है. महिलावादियों में से बहुत लोग यह मानते हैं कि हिंसा और औरतों का आपस में कोई मेल नहीं है. सेना की निहित प्रकृति हिंसा है और हिंसा स्वयं औरतों को बुरी तरह प्रभावित करती है. इसीलिए ऐसे संगठनों में औरतों की मौजूदगी अपने आप में विवादास्पद है जो खुद पितृसत्ता का पोषण करते हैं.

लेकिन लड़कियां कई बार अपने लिए अपने मानदंड स्वयं बनाती हैं. चूंकि वे इस कटुसत्य से भली भांति वाकिफ हैं कि अक्सर नीति-निर्माता उन्हें बीच मंझधार में अकेला छोड़ देते हैं. इसीलिए वे चिल्ला पड़ती हैं कि किसी को यह कहने का अधिकार नहीं कि वे क्या पहनें, कौन सा पेशा चुनें, किससे संबंध रखें. किसी को उनकी तरफ से फैसला लेने का अधिकार नहीं है. वे सिर्फ बराबरी चाहती हैं- हर पेशे में. सेना में भी उन्हें यह बराबरी मिले, हमें सुनिश्चित करना होगा. क्योंकि दुश्मन के दांत खट्टे कोई भी कर सकता है- हम भी, आप भी.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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