'मेरी कब्र के ऊपर कोई मकबरा न बने और मेरे चेहरे को कफन से ढका ना जाए', ये मुगल शासक औरंगजेब की आखिरी ख्वाहिश थी.



औरंगजेब चाहता था कि उसे दफना कर उसकी कब्र पर एक चबूतरा बना दिया जाए, कोई कार्यक्रम न किया जाए और किसी भी तरह का समारोह न हो और शाही खजाने का इस्तेमाल न हो.



औरंगजेब ने अपने बेटे आजम को अंतिम समय में एक खत लिखा था जिसमें उसने अपनी आखिरी ख्वाहिशों के बारे में लिखा था. खत में उसने कहा, ‘मैने टोपियां सिलकर 4 रुपए 2 आना कमाए हैं. उससे ही मेरी मौत का सारा काम किया जाए.’



खत में औरंगजेब ने ये भी लिखा, ‘कुरान लिखकर उसकी प्रतियां बेचकर 305 रुपए मिले हैं, इन रुपयों को काजी और गरीबों में बांट दें.’



औरंगजेब की यह भी ख्वाहिश थी कि उसकी मौत पर संगीत या कोई कार्यक्रम न किया जाए, न ही उनकी कब्र के ऊपर कोई पक्की इमारत बनाई जाए.



औरंगजेब चाहता था कि उसकी मौत पर कोई शाही जनाजा नहीं निकाला जाए और बहुत सादगी से दफनाया जाए.



उसकी एक ख्वाहिश यह भी थी कि दफन करते वक्त उसके चेहरे को न ढका जाए क्योंकि वह चाहता था कि वो अपने अल्लाह का खुले चेहरे से सामना कर सके.



औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च, 1707 को दक्कन से दिल्ली लौटते वक्त रास्ते में ही हो गई थी. औरंगजेब के शरीर को दिल्ली न ले जाकर वापस महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में ले जाया गया क्योंकि औरंगजेब चाहता था कि उसके शरीर को वहीं दफन किया जाए जहां उसकी मौत हुई हो.



औरंगाबाद के खुल्दाबाद में शेख जैनुद्दीन साहब, जिन्हें औरंगजेब अपना गुरु मानता था, उनकी दरगाह के पास औरंगजेब को दफनाया गया.



औरंगजेब को दफनाने के बाद उसकी कब्र को लाल पत्थर से ढक दिया गया और उसके ऊपर मिट्टी डाल दी गई, जिस पर फूल खिल सके.