एकबार छत्रपति शिवाजी महाराज मुगल शासक औरंगजेब से मिलने आगरा गए और औरंगजेब ने षडयंत्र में फंसाकर उन्हें कैद कर लिया.



शिवाजी महाराज ने कैद से निकलने की ऐसी तरकीब लगाई कि औरंगजेब को कानों-कान खबर न हो सकी और शिवाजी वहां से निकलने में कामयाब हो गए. आइए जानते हैं ये पूरी कहानी



जदुनाथ सरकार अपनी किताब शिवाजी एंड हिज टाइम्स में लिखते हैं कि 19 अगस्त 1666 को औरंगजेब के सैनिकों को बताया गया कि शिवाजी बहुत बीमार हैं, वह बिस्तर पर लेटे हैं इसलिए कोई अंदर न आए. शिवाजी अपनी तंदुरुस्ती के लिए हर शाम साधु और ब्राह्मणों को मिठाईयां और फल भिजवाने लगे.



एक रोज शिवाजी ने सौतेले भाई हीरोजी फरजांद को अपने कपड़े और मोतियों का हार पहना दिया. इसके बाद हीरोजी शिवाजी के पलंग पर लेट गए और अपने शरीर को कंबल से ढ़क लिया. अब उनका सिर्फ एक हाथ दिखाई दे रहा था.



शिवाजी महाराज और उनके बेटे संभाजी फलों की टोकरी में छिप गए, जिसे मजदूर शहर से दूर एकांत जगह ले गए. वहां से मजदूरों को वापस भेज दिया गया.



सैनिकों को गुमराह करने के लिए हीरोजी शिवाजी के पलंग पर ही लेटे रहे. अगले दिन दोपहर 3 बजे हीरोजी चुपके से एक नौकर के साथ घर के बाहर निकल गए. हीरोजी ने पहरेदारों को कहा कि वह शोर न करें क्योंकि शिवाजी बीमार हैं और उनका इलाज चल रहा है.



जब शिवाजी के कमरे से कोई आवाज नहीं आई तब कुछ सैनिकों ने अंदर जाकर देखा. वहां पर कोई नहीं था. ये खबर जब औरंगजेब तक पहुंची, तो वह सुनते ही हक्का-बक्का रह गया.



औरंगजेब ने अपने सैनिकों को शिवाजी की तलाश करने के लिए भेजा, लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा.



औरंगजेब की कैद से छूटने के 6 घंटे बाद शिवाजी मथुरा पहुचे. वहां उन्होंने अपने बाल, दाढ़ी और मूंछ मुंडवा दीं और संन्यासी का रूप धारण कर लिया.



मथुरा से निलकर वो जल्द ही अपने किले संत के वेश में पहुंचे और जाते ही सबसे पहले अपनी मां जीजा बाई से मिले.