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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती

ज्योतिष्पीठ के 46वें शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती वर्तमान में हिंदू धर्म के सबसे प्रभावशाली और मुखर आध्यात्मिक गुरुओं में से एक हैं. वे महान संत स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं और उनके ब्रह्मलीन होने के बाद ज्योतिष्पीठ (उत्तराखंड) के शंकराचार्य पद पर आसीन हुए. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी विद्वता के साथ-साथ 'धर्म रक्षक' की छवि के लिए जाने जाते हैं. वे सनातन परंपराओं, शास्त्रीय मर्यादाओं और हिंदू हितों से जुड़े मुद्दों पर बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपनी राय रखते हैं. हाल के वर्षों में वे राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शास्त्रीय नियमों (शास्त्र सम्मत विधि) के पालन को लेकर उठाए गए अपने सवालों के कारण राष्ट्रीय चर्चा में रहे. उनका मानना है कि धर्म की रक्षा शास्त्रों के पूर्ण पालन से ही संभव है. वे केवल आध्यात्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संरक्षण में भी सक्रिय रहते हैं. उन्होंने 'गौ माता' को 'राष्ट्रमाता' का दर्जा दिलाने के लिए व्यापक पदयात्राएं और आंदोलन किए हैं. इसके अलावा, काशी (वाराणसी) में प्राचीन मंदिरों के संरक्षण और धार्मिक मर्यादाओं को बनाए रखने के लिए उन्होंने कई बार कड़ा रुख अपनाया है. उनका व्यक्तित्व परंपरा और स्पष्टवादिता का अनूठा संगम है. वे अक्सर धर्म और राजनीति के घालमेल पर कटाक्ष करते हैं और हिंदू समाज को जागरूक करने का प्रयास करते हैं. एक प्रखर वक्ता के रूप में वे सनातन धर्म की दार्शनिक गहराई को सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं.

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