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भीतरघात खत्म करने में माहिर भूपेंद्र, माथुर की मुहर को मोदी भी नहीं मिटाते; कहानी बीजेपी के चुनावी रणनीतिकारों की

भूपेंद्र यादव की छवि मूक रणनीतिकार की है. माथुर गुजरात में मोदी के लिए रणनीति बना चुके हैं. वहीं जोशी को कर्नाटक में काम का ईनाम दिया गया है. जावड़ेकर सहयोगियों को साधने में माहिर हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी मोर्चे पर छत्तीसगढ़ में ओम माथुर, मध्य प्रदेश में भूपेंद्र यादव, राजस्थान में प्रह्लाद जोशी और तेलंगाना में प्रकाश जावड़ेकर को तैनात किया है. यादव और जोशी मोदी कैबिनेट में मंत्री, जबकि जावड़ेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं. ओम माथुर राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं.

साल के अंत में होने वाले इन चारों राज्यों के चुनाव को लोकसभा का सेमीफाइनल माना जा रहा है. वर्तमान में बीजेपी के पास सिर्फ मध्य प्रदेश की सत्ता है. यहां वापसी के साथ-साथ पार्टी राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दक्षिण के तेलंगाना में भी सरकार बनाने की दावेदारी में जुटी हुई है. 

लोकसभा के लिहाज से भी चारों राज्य महत्वपूर्ण है. इन राज्यों में कुल 543 में से 82 सीटें हैं, जो समीकरण को उलट-पुलट करने के लिए काफी है. हिंदी बेल्ट के छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी को 2018 में बुरी तरह हार मिली थी. तेलंगाना में बीजेपी तीसरे नंबर की पार्टी है.

ऐसे में सियासी गलियारों में चर्चा है कि इतने महत्वपूर्ण चुनावों में बीजेपी ने इन्हीं चारों नेताओं को कमान क्यों दी है?

बात पहले बीजेपी के मजबूत गढ़ मध्य प्रदेश की
2018-2020 के साल को छोड़ दिया जाए तो बीजेपी यहां पिछले 20 साल से सत्ता में है. जनसंघ के समय से ही मध्य प्रदेश बीजेपी का मजबूत गढ़ रहा है. 1977 में पहली बार जनसंघ का मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश में ही बना था. 

2018 में बीजेपी करीबी मुकाबले में कांग्रेस से हार गई, लेकिन 2020 एक राजनीतिक घटनाक्रम के बाद फिर सत्ता में वापस लौटी पर इस बार राजनीतिक समीकरण बदला हुआ था. मुख्यमंत्री भले बीजेपी के खांटी नेता शिवराज बने, लेकिन सत्ता में दलबदलुओं का दबदबा बना रहा.


भीतरघात खत्म करने में माहिर भूपेंद्र, माथुर की मुहर को मोदी भी नहीं मिटाते; कहानी बीजेपी के चुनावी रणनीतिकारों की

नतीजन, संगठन पर गुटबाजी हावी हो गई. पहली बार बीजेपी के भीतर की गुटबाजी की खबरें मीडिया में भी खूब छपी. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि बीजेपी में 3 गुट है, 1. शिवराज गुट 2. महाराज गुट (ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट) और 3. नाराज गुट

गुटबाजी की वजह से बीजेपी का जनाधार भी खिसकने की बात सामने आई है. हालिया सर्वे में पार्टी कांग्रेस से पिछड़ती नजर आ रही है. सी-वोटर ओपिनियन पोल के मुताबिक मध्य प्रदेश की 230 में से बीजेपी को 106-118 और कांग्रेस को 108-120 सीटें मिल सकती है. 

दिसंबर 2022 में बीजेपी ने इंटरनल सर्वे कराया था, जिसमें 40 प्रतिशत विधायकों का परफॉर्मेंस खराब बताया गया था. कई विधायकों ने गुटबाजी की शिकायत हाईकमान से की थी. ऐसे में बीजेपी के लिए मध्य प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती एंटी इनकंबेंसी के साथ-साथ गुटबाजी है.

भूपेंद्र यादव को ही क्यों मिली एमपी की कमान?
मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र यादव की गिनती बीजेपी के भीतर साइलेंट स्ट्रैटेजिस्ट (मूक रणनीतिकार) के रूप में होती है. 2014 में अमित शाह के पावरफुल होने के बाद भूपेंद्र का कद भी बढ़ता गया. यादव भीतरघात खत्म करने और विरोधियों को चित करने में माहिर माने जाते हैं.

2014 में यादव को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर झारखंड की कमान सौंपी गई. यादव ने झारखंड में बूथ सम्मेलन कराकर अर्जुन मुंडा, रघुबर दास, लक्ष्मण गिलुआ जैसे नेताओं को एक मंच पर लाया. साथ ही आजसू जैसी छोटी पार्टियों से गठबंधन किया. 

यादव का फॉर्मूला हिट रहा और बीजेपी ने झारखंड में यूपीए के मजबूत आदिवासी, यादव और मुस्लिम समीकरण को ध्वस्त कर दिया. गुटबाजी पर कंट्रोल कर यादव ने महाराष्ट्र चुनाव में भी बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी बनाने में बड़ी भूमिका निभाई.


भीतरघात खत्म करने में माहिर भूपेंद्र, माथुर की मुहर को मोदी भी नहीं मिटाते; कहानी बीजेपी के चुनावी रणनीतिकारों की

2017 में यादव को उत्तर प्रदेश की कमान मिली थी, जहां पहली बार बीजेपी ने रिकॉर्ड जीत हासिल की. उत्तर प्रदेश में भी पार्टी कई गुटों में बंटी हुई थी. यादव को 2020 में बीजेपी ने ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम की कमान सौंपी. उन्होंने यहां भी अपनी रणनीति से कांग्रेस और बीआरएस को बेदम कर दिया.

बीजेपी ग्रेटर हैदराबाद निगम में 44 सीटें जीतकर दूसरे नंबर की पार्टी बन गई. 2020 के चुनाव में बीजेपी को जेडीयू से बड़ी पार्टी बनाने में यादव ने ही बड़ी भूमिका निभाई थी. 2022 में बीजेपी से अलग होने के बाद जेडीयू अध्यक्ष ललन सिंह ने यादव के प्लान का खुलासा किया था.

ललन सिंह के मुताबिक बीजेपी को आगे करने के लिए यादव ने पहले चिराग मॉडल चला और फिर उसके बाद आरसीपी सिंह से तालमेल कर जेडीयू के सिंबल पर कमजोर उम्मीदवार उतार दिए. 2020 के चुनाव में बीजेपी 74 और जेडीयू 43 सीटों पर जीत हासिल की थी. 

राजस्थान: बिना लोकल चेहरे के चुनाव लड़ने की चुनौती
हिंदी पट्टी राजस्थान बीजेपी का मजबूत किला रहा है, लेकिन 2018 में यहां पार्टी हार गई. बीजेपी इस बार यहां वापसी की कोशिशों में जुटी हुई है. हालांकि, पार्टी ने अब तक लोकल चेहरा नहीं घोषित किया है. राजस्थान में वसुंधरा राजे, सतीश पूनिया, ओम बिरला और गजेंद्र शेखावत मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं.


भीतरघात खत्म करने में माहिर भूपेंद्र, माथुर की मुहर को मोदी भी नहीं मिटाते; कहानी बीजेपी के चुनावी रणनीतिकारों की

1990 के बाद यह पहली बार है, जब बिना चेहरे के बीजेपी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है. 2002 तक भैरो सिंह शेखावत बीजेपी का मुख्यमंत्री का चेहरा हुआ करते थे, उनके उपराष्ट्रपति बनने के बाद वसुंधरा को बीजेपी ने आगे किया, लेकिन इस बार पार्टी ने चुप्पी साध ली है. 

दूसरी ओर कांग्रेस ने सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच जारी सियासी झगड़े को रोक लिया है. दोनों नेताओं ने मिल कर चुनाव लड़ने की बात कही है.

वसुंधरा के अलग-थलग होने की वजह से पार्टी के पास पूरे राज्य में पकड़ रखने वाले एक भी नेता नहीं है. राजस्थान में 6 उपचुनाव अब तक बीजेपी हार चुकी है. ऐसे में लोकल चेहरा और गुटबाजी बीजेपी के लिए चुनौती बना हुआ है.

प्रह्लाद जोशी को क्यों मिली राजस्थान की कमान?
जोशी लो प्रोफाइल में रहकर काम करने के लिए जाने जाते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुड बुक में नाम होने की वजह से उन्हें सीधे राजस्थान की कमान सौंपी गई है. 2013-2017 तक वे कर्नाटक बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. 

हाल के कर्नाटक चुनाव में जोशी ने धारवाड़ (मध्य) में बीजेपी की एकतरफा जीत दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई. जोशी की रणनीति की वजह से वरिष्ठ नेता जगदीश शेट्टार चुनाव हार गए. जानकारों के मुताबिक जोशी के कर्नाटक में कमान मिलने की अटकलें लगाई जा रही थी, लेकिन येदियुरप्पा कैंप ने सहमति नहीं दी.


भीतरघात खत्म करने में माहिर भूपेंद्र, माथुर की मुहर को मोदी भी नहीं मिटाते; कहानी बीजेपी के चुनावी रणनीतिकारों की

(Photo- PTI)

प्रह्लाद जोशी 2022 के चुनाव में उत्तराखंड के चुनाव प्रभारी थे, जहां बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की थी. जोशी ने चेहरा को छोड़कर कमल सिंबल के प्रचार पर जोर दिया, जो हिट रहा. उन्होंने हिंदुत्व के मुद्दे को चुनाव में उठाकर अंत समय में जीती बाजी कांग्रेस से छीन ली. 

छत्तीसगढ़: यहां बघेल-सिंहदेव की जोड़ी का तोड़ निकालना आसान नहीं
2018 में बीजेपी की 15 साल की सत्ता को कांग्रेस ने भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के नेतृत्व में उखाड़ दिया. बीजेपी इसके बाद से ही यहां मजबूत संगठन नहीं बना पाई है. 2023 के शुरुआत में बीजेपी ने ओम माथुर को संगठन की कमान सौंपी थी.

माथुर को अब चुनाव का प्रभारी बनाया गया है. यानी अब माथुर यहां फुल पावर में होंगे. हाल ही में छत्तीसगढ़ बीजेपी के वरिष्ठ आदिवासी नेता नंद कुमार साय ने पार्टी छोड़ दी थी. कई और नेताओं के छोड़ने की अटकलें लग रही है. 

90 सीटों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा में जीत के लिए 46 विधायकों की जरूरत होती है. जानकार बीजेपी को छत्तीसगढ़ में 46 के जादुई आंकड़ों से काफी दूर बता रहे है. वजह- बघेल और सिंहदेव की मजबूत जोड़ी है.

कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पिछले साढ़े चार साल में अपनी जमीनी नेता की छवि को और मजबूत किया है. बघेल ने आदिवासियों को साधने के लिए कई तरह की योजनाएं भी छत्तीसगढ़ में लागू की है. हाल ही में कांग्रेस हाईकमान ने सिंहदेव-बघेल के बीच सियासी अदावत को खत्म कर दिया है. 

प्राकृतिक संसाधन से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ किसी भी पार्टी के लिए काफी अहम है. 

माथुर को क्यों मिली कांग्रेस के मजबूत किले को ढहाने की कमान?
राजस्थान से आने वाले ओम माथुर की गिनती बीजेपी के बड़े रणनीतिकारों में होती है. 2012 के गुजरात चुनाव में माथुर ही प्रभारी थे, जिसमें जीत के बाद नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय चेहरा बने. माथुर गुजरात, यूपी, हरियाणा और महाराष्ट्र के प्रभारी रह चुके हैं. 

बीजेपी के भीतर 'बूथ मजबूत' का फॉर्मूला गुजरात में माथुर ने ही दिया था, जिसे पार्टी ने बाद में पूरे देश में लागू किया. माथुर के मजबूती का अंदाजा उनके एक बयान से भी लगाया जा सकता है.

राजस्थान में एक रैली के दौरान माथुर ने बड़ा बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि मैंने जो खूंटा गाड़ दिया, उसे नरेंद्र मोदी भी नहीं उखाड़ सकते हैं. बकौल माथुर मेरे दिए टिकट को कोई भी नहीं खारिज कर सकता है.


भीतरघात खत्म करने में माहिर भूपेंद्र, माथुर की मुहर को मोदी भी नहीं मिटाते; कहानी बीजेपी के चुनावी रणनीतिकारों की

(Photo- OM Mathur)

आरएसएस के प्रचारक रह चुके माथुर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का करीबी माना जाता है. माथुर राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं. उन्होंने हमेशा सरकार बदले संगठन के काम को ही तरजीह दी. 

जानकारों के मुताबिक विधानसभा चुनाव में भी मोदी चेहरे को आगे करने की तरकीब भी माथुर का ही था, जिसके फायदा पार्टी को यूपी, हिमाचल, हरियाणा जैसे राज्यों में मिला. 

तेलंगाना: अकेले फतह करना आसान नहीं दक्षिण का यह किला
कर्नाटक में हार के बाद दक्षिण की सियासत से बीजेपी आउट हो चुकी है. पार्टी को तेलंगाना से उम्मीद है, लेकिन यहां अकेले दम पर फतह करना पार्टी के लिए आसान नहीं है. तेलंगाना में विधानसभा की 119 सीटें हैं. 2018 में बीजेपी को सिर्फ 1 सीट पर जीत मिली थी. 

तेलंगाना में क्षेत्रीय पार्टी बीआरएस काफी मजबूत है और लगातार 2 टर्म से के चंद्रशेखर राव की सरकार है. कर्नाटक जीत के बाद कांग्रेस ने भी तेलंगाना का समीकरण उलझा दिया है. जानकारों के मुताबिक कांग्रेस यहां बीजेपी के मुकाबले मजबूत स्थिति में है. 

बीजेपी तेलंगाना में आंतरिक लड़ाई में उलझ गई. पार्टी ने हाल ही में अध्यक्ष बंदी संजय कुमार को हटाकर जी किशन रेड्डी को प्रदेश की कमान सौंपी है. तेलंगाना में बीजेपी के बीआरएस से गठबंधन की भी चर्चा तेज है. 

जावड़ेकर को क्यों सौंपी तेलंगाना की कमान?
2018 के चुनाव में कर्नाटक में बीजेपी को बड़ी पार्टी बनाने में जावड़ेकर ने बड़ी भूमिका निभाई. जावेड़कर सहयोगियों को जोड़ने में माहिर माने जाते हैं. तमिलनाडु में प्रभारी रहते कई दलों को बीजेपी के साथ जोड़ा. 


भीतरघात खत्म करने में माहिर भूपेंद्र, माथुर की मुहर को मोदी भी नहीं मिटाते; कहानी बीजेपी के चुनावी रणनीतिकारों की

(Photo- Getty)

राजस्थान के प्रभारी रहते हुए प्रकाश जावड़ेकर ने हनुमान बेनीवाल को एनडीए के साथ लाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. तेलंगाना में भी जावड़ेकर के आने से बीआरएस से गठबंधन की बात बन सकती है. 

कांग्रेस विरोध की वजह से माना जा रहा है कि चंद्रशेखर राव बीजेपी के साथ आ सकते हैं. उनकी बेटी के खिलाफ ईडी में केस भी दर्ज है.

2006-2014 तक बीजेपी में प्रवक्ता की भूमिका निभाने वाले जावड़ेकर मोदी सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं.

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