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क्या राहुल गांधी के संसद से अयोग्यता को चुनावी मुद्दा बनाएगी कांग्रेस...?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मानहानि केस में सूरत सेशन कोर्ट की तरफ से दोषी करार दिए जाने के एक दिन बार उन्हें संसद की सदस्यता से अयोग्य करार दिया गया. ऐसी स्थिति में मेरे ख्याल में ये तो मुद्दा बन ही गया है. मेरे ख्याल में कांग्रेस को अब अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं है. उसको ये जरूर करना है कि अभी जो स्थिति बन गई है उसका वो लाभ कैसे ले सकते हैं. लेकिन ये कहना कि कांग्रेस इसको भुनाने की कोशिश करेगी नहीं वह तो इसे पूरी तरह से कर रही है. मेरे ख्याल में जो राजनीतिक स्थितियां बन रही हैं उसमें किसी भी राजनीतिक दल को उसका फायदा लेना चाहिए. लेकिन मुझे लगता है कि वो किस तरह से लोगों को और अन्य राजनीतिक पार्टियों को अपने साथ जोड़ेगी या नही जोड़ेगी ये देखने वाली बात है.

चूंकि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में इसे लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं लेकिन विपक्ष के जितने भी दल हैं वो अभी तक कोई एक मोर्चा बनाने की बात पर सामने नहीं आए हैं. ये जरूर है कि कुछ नेताओं ने ये बयान दिया है कि अब समय आ गया है कि हम सबको मिलकर एक मोर्चा बनाना चाहिए लेकिन जब तक वो एक साथ नहीं तो उसे नहीं ही माना जाएगा. कांग्रेस चाहे अन्य पार्टियां कब एक साथ आएंगी क्या वे आखिरी वक्त में साथ आएंगे ये तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन जब वे एक साथ आ कर मुद्दों को रखेंगे तभी उन्हें कोई फायदा होगा. हां ये बात जरूर है कि ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल ने भी एक साथ आने की जरूरत जताई है लेकिन ये वास्तविकता में होता हुआ दिख नहीं रहा है.

अयोग्यता बनेगा चुनावी मुद्दा

सबसे पहले तो हमें इस मुद्दे को समझना होगा. चूंकि इस मुद्दे पर केरल से एक सोशल एक्टिविस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली है. जिसमें ये कहा है कि मानहानि के जिस मुकदमे में राहुल गांधी की सदस्यता को खत्म किया गया है उसमें पहले की तरह कार्रवाई हो जिसमें की राष्ट्रपित और राज्यपाल की जब तक इच्छा होती थी तब तक किसी भी सदस्यता को रद्द नहीं किया जा सकता था और तब तक कई प्रकार के विचार-विमर्श कर लिया जाता था. उस याचिका एक चीज ये भी जोड़ी गई है कि इसके साथ बोलने की स्वतंत्रता का भी मुद्दा है चूंकि जिस तरह से आज राजनीतिक घटनाक्रम घट रही है. उसमें अगर कोई किसी भी तरह का बयान देगा तो क्या उसे सुप्रीम कोर्ट में घसीटा जाएगा और क्या इसी प्रकार से उसकी सदस्याता ले ली जाएगी. बंगाल के एक लॉयर ने कहा है कि जिस तरह से ये निर्णय आया है सामान्य रूप से मानहानि के केस में आर्थिक दंड देकर शॉर्ट आउट किया गया है, लेकिन किसी को इस प्रकार से दो साल का दंड दिया जाएगा ये तो नहीं हुआ है. दूसरी बात ये है कि मानहानि का जो मामला है क्या व क्रिमिनल डिफमेशन होना चाहिए इस पर भी एक सवाल उठ रहा है. चूंकि लिली थॉमस का जो केस था 2013 में उसमें जो कोर्ट ने राय दी थी उसमें ये हुआ कि किसी का भी तुरंत से सदस्यता रद्द कर दिया जाएगा. अब आज के परिप्रेक्ष्य में वो जो निर्णय कोर्ट ने लिया था वो सही है या नहीं है उसे लेकर भी जो पीआईएल फाइल की गई है उससे उस निर्णय पर भी चर्चा होगी. चूंकि अगर इसे ऐसे ही छोड़ दिया जाएगा तो आज एक दल को नुकसान हो रहा है तो कल किसी दूसरे दल के सांसद को इसका नुकसान होगा.

मुद्दा ये है कि अगर कोई चुना गया एमपी है और उस पर मर्डर का चार्ज है तो उसमें क्रिमिनलीटी का मुद्दा समझ में आता है लेकिन अगर किसी ने राजनीतिक बयानबाजी की है और चूंकि राजनीतिक बयानों के कई आयाम होते हैं जैसे वो तंज भी होता है, सटायर भी होता है या वो बातें मजाक के रूप में भी कही जाती हैं तो क्या वो सारी चीजें मानहानि के दायरे में क्रिमीनल ऑफेंस माना जाएगा. इसलिए मुझे लगता है कि कोर्ट को भी इसके लिए एक रास्ता निकालना पडे़गा क्योंकि उन्होंने अगर रास्ते को बंद किया है तो उन्हें इससे बचाव का रास्ता भी देने की जरूरत है. हो सकता है कि कोर्ट इन सारी चीजों को संज्ञान में लेते हुए एक नया विकल्प दे दे और लोगों का भी ये आम मत है कि ये मामला सिविल होना चाहिए. चूंकि सामान्य रूप से ये मामला क्रिमिनल नहीं है. मेरे ख्याल में कांग्रेस अपनी चुनावी रणनीति बना रही है या राहुल गांधी ने भी जो कल प्रेस कॉन्फ्रेंस किया है उसे भी अगर आप देखें तो उसमें भी ये सारी चीजें ही निहित हैं कि क्या उनको डिस्क्वालीफाई करने के लिए इतनी जल्दी करनी चाहिए थी. लेकिन 2013 के निर्णय के मुताबिक तो ये सही है इसमें कोई गलत तो नहीं है...तो इसका फायदा तो कोई भी राजनीतिक दल लेना चाहेगा और कांग्रेस और विपक्ष के पास अगर ऐसा मौका आता है और अगर वे इसका लाभ लेते हैं तो कौन रोक सकता है.

एक चीज हमें और समझने की जरूरत है. हमारे यहां जो चुनाव के कानून हैं उसमें कहीं ये कोई बाध्यता नहीं है कि किसी को प्रधानमंत्री के रूप में सामने रखकर ही चुनाव लड़ा जाना चाहिए. 1977 का चुनवा जब लड़ा गया था उसमें बहुत सारे नेता थे और कोई भी व्यक्ति विपक्ष के प्रधानमंत्री के रूप में सामने नहीं था. लेकिन वे सारे दल एक साथ चुनाव लड़े बिना किसी का नाम लिए और जो नाम लिया गया था वो बाद में ही लिया गया था. 1989 के चुनाव में भी ऐसे ही चुनाव हुए थे. मुझे लगात है कि जब हम डेमोक्रेटिक ट्रेडिशन में चुनाव लड़ते हैं तो उसमें किसी भी राजनीतिक दल को किसी भी प्रत्याशी का नाम नहीं लेकर सीधे तौर पर पार्ट के मुद्दे हैं और देश के लिए वो जो कुछ करना चाहते हैं उसे समाने रखकर चुनाव लड़ना चाहिए. मेरे ख्याल में तो सबसे अच्छा यही है कि नए चुनाव में नए-नए चेहरे उभर कर आए और इससे नए-नए दृष्टिकोण भी सामने आते हैं तो विपक्ष को ऐसा करना है तो वो कर सकते हैं.


देश को ये कभी नहीं सोचना चाहिए कि हम नेतृत्व विहीन


हमारे यहां जो राजनीतिक व्यवस्था बनी हैं उसमें ये है चुनाव के बाद जिस पार्टी को या फिर गठबंधन को जनता का समर्थन मिलेगा वो अपने से किसी एक व्यक्ति का चुनाव करके राष्ट्रपति के समक्ष रखेगी. वर्तमान में इन सारी चीजों को देखते हुए ये जरूरी नहीं है कि कोई एक नाम लेकर वो आएं और उसी के साथ चुनाव लड़ें. मुद्दे देश के लिए होते हैं और उसके लिए आपस में साथ बैठकर वो लड़ सकते हैं और ये हम देख चुके हैं 1996, 1997 और 1998 में कि राजनीति पार्टियों ने किस तरह देवगौड़ा का चुनाव किया, आईके गुजराल का चुनाव किया या फिर वाजपेयी जी का चुनाव किया. एक चीज हमें ये भी समझना होगी की हमारे देश का जो ढांचा है उसमें तमाम तरह के सामाजिक लोग, तमाम तरह के राजनीतिक व व्यवासायिक लोग सभी मिलकर एक व्यवस्था को बनाते हैं. ये देखा गया गया है कि चुनाव के बाद जिसका भी चयन किया गया है वो देश के नेता के रूप में उभर कर सामने आए हैं और अगर वो काम नहीं करते हैं तो जनता उन्हें हटा भी देती है. पूर्व में कई बार ऐसा हो चुका है और ये सारी चीजें हमारे देश की राजनीतिक परिपक्वता को दिखाती है. उदाहरण हमारे सामने हैं चंद्रशेखर जी की सरकार का देखिये, चौधरी चरण सिंह जी के समय को देख लीजिए और जो भी सामने आए उन्होंने देश के विकास के बारे में सोंचा है. देश को ये कभी नहीं सोचना चाहिए कि हम नेतृत्व विहिन हैं. इस देश में नेतृत्व तो हर कोने पर है और कौन कहां से सामने आएगा ये देखने की बात होती है.

जब कोई भी राजनीतिक दल बहुत ज्यादा दिनों तक कार्य करती है तो उसमें कुछ समस्याएं अपने आप पैदा हो जाती है. क्योंकि वो फिर अपने आप में परिवर्तन नहीं कर पाती है. अगर हम देश की प्रगति चाहते हैं तो उसमें अगर परिवर्तन होता है तो ये स्वाभाविक है. अब सवाल है कि राहुल गांदी पीएम पद के उम्मीदवार होंगे कि नहीं होंगे तो देखिये, आज की तारीख में विपक्ष ने ये नहीं कहा है कि कौन उनका कैंडिडेट होगा और मेरे ख्याल में उनको इस प्रकार का काम करना भी नहीं चाहिए. मान लीजिए कि राहुल गांधी की जो आज की स्थिति है वो आगे भी बरकरार रहे तो फिर क्या होगा? मान लीजिए की सारे विपक्षी दल मिलकर चुनाव लड़ते हैं और उनको बहुमत भी मिल जाती है, तब वे किसी ऐसे व्यक्ति के नाम को भी आगे बढ़ा सकते हैं जिसके खिलाफ कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है. उसको भी वे प्रधानमंत्री बना सकते हैं. तो मुझे लगता है कि ये कहना कि किसी को टेक्निकली हम अगर इलेक्शन से बार कर देते हैं तो वो इस देश का प्रधानमंत्री नहीं हो सकता है या कोई और मंत्रालय या कोई जिम्मेवारी नहीं ले सकता है तो ये कानूनी रूप से पूरा-पूरा सही नहीं है. 

(ये निजी विचार पर आधारित आर्टिकल है.)

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